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पीड़ पराई जाने ना : गाँधी जयंती, आर्टिकल १५ और हाथरस

याद है जब लड़कियों के कलपते बापों को धमका कर झूठ बोलने को कहा गया था, 'बोलो कि तुम्हारी लड़कियों के 'गलत' सम्बन्ध थे, बोलो।' वो कांपते बोल गए।

याद है जब लड़कियों के कलपते बापों को धमका कर झूठ बोलने को कहा गया था, ‘बोलो कि तुम्हारी लड़कियों के ‘गलत’ सम्बन्ध थे, बोलो।’ वो कांपते बोल गए।

आज आर्टिकल १५ की याद आयी। बेशक वो जात-पात के ज़हर को एक प्रिविलेज्ड लेंस से देखती है।  पर वो फिल्म जो कहती है ना, उसके लिए दिल चाहिए पत्थर का। उसका एक एक संवाद कान में सीसे की तरह पिघलता है – क्यूंकि अत्याचार करते हैं हम, जो रोज़ सूट पहन कर समझते हैं हमारे अंदर का कालापन धुल गया।

हम वही हैं जो ताज महल को अपने बाप की जागीर की तरह बेचते हैं, पर उसके आस पास की सच्चाई को ढक देते हैं। हम वही हैं जिन्हें नालियां साफ़ चाहिए, पर उसमें उतरने के लिए कोई और चाहिए, वो जो हमारे धिक्कार को सहे और हमारी गालियां सुने, ताकि हम अपने अहम् को सवार सकें। और अगर गलती से वो अपना सर उठा लें हमारे सामने, तो हम या तो वो सर काट दें या कटवा दें। कटवा ही देंगे क्यूंकि हमें अपने हाथों को उस खून से मैला नहीं करना, जो हमारा मैला ढोते ढोते स्याह पड़ चुका है।

याद है जब लड़कियों के कलपते बापों को धमका कर झूठ बोलने को कहा गया था, ‘बोलो कि तुम्हारी लड़कियों के ‘गलत’ सम्बन्ध थे, बोलो।’ वो कांपते बोल गए। क्या करते, लड़कियां खो चुके थे, पर ज़िंदा तो रहना था। और ज़िंदा रहने के लिए साहब की बात माननी थी। सच डावाडोल हो कर नंगा खड़ा था सामने। फिर भी कोई मानना नहीं चाहता था।

सच आज भी सामने खड़ा है, पर हमें देखना वही है जो हमारी सत्ता के पक्ष में हो। हमारे लिए जान और अस्मत की कीमत अब कुछ रही नहीं। हम सुन्न पड़ चुके हैं। हमें बस विकल्प चाहिए सच को देखने के, जिससे अपना अपराधबोध काम कर सकें, बोल सकें कि नहीं जी, ये इसलिए नहीं हुआ कि जात को औक़ात दिखानी थी।

क्या है ना, जिस दिन सच हमें समझ आ गया, उस दिन खुद के साथ जी नहीं पायेंगे हम। घिन आएगी। और मुँह छुपाने के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। क्यूंकि नाले साफ़ हो गए, पर अंदर की गंदगी रह गयी।

उस आग में भस्म हो गयी इज़्ज़त और धर्म और संस्कृति का झूठा नशा। चाहो तो सेंक लो राजनीती की रोटी। तुमसे सड़कों पर तो ना उतरा जाएगा अब।

वैष्णव जन तो तेने कहिये जे,
पीड़ परायी, जाने रे…

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हर गाँधी जयंती पर गा लेना झूठे मुँह, और भर लेना मुँह को सोच के खोखले लड्डू से।  हमें तो अब मिट्टी का स्वाद आता है उसमें से।

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