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बस मैं जॉब न करूँ, सब यही तो चाहते थे…

छोड़ो ये नौकरी करने का चक्कर, आराम से घर में रहने और सोने को मिलता है तो, मुझे समझ नहीं आता कि तुम औरतें नौकरी क्यूँ करना चाहती हो?

छोड़ो ये नौकरी करने का चक्कर, आराम से घर में रहने और सोने को मिलता है, तो मुझे समझ नहीं आता कि तुम औरतें नौकरी क्यूँ करना चाहती हो?

“जानती हो न कैसा ज़माना चल रहा है एक अकेली महिला भला कैसे रहेगी अंजान शहर में? वैसे ही समाज में अकेली रहने वाली महिला को लावारिश समझकर कर लोग सिम्पैथी जताने के चक्कर में करीब आते हैं, फिर गलत फायदा उठाते हैं। अपराध कितने बढ़ गए हैं अकेली रहने वाली महिला के साथ। पर तुम्हे तो बस रट लगी है नौकरी करने की”, पैर पटकते हुए अवि कमरे से निकल गया

रिया फैसला नहीं कर पा रही थी कि क्या करे? एक तरफ कैरियर था तो दूसरी तरफ अपनी सुरक्षा का प्रश्न था। मन में बार बार यही बात उभरती कि किस्मत एक बार ही दरवाज़ा खटखटाती है। जहाँ लोग छोटी छोटी नौकरी के लिए तरसते हैं, मैं इतनी अच्छी सरकारी नौकरी क्या बस इसलिए छोड़ दूँ कि मुझे अकेले रहना होगा?

आज लाखों महिलाएं घर से अकेली ही निकल कर, दुनिया की भीड़ में संघर्ष करके अपना मुकाम बना रही हैं। और मैं घबरा कर नौकरी करने का मौका छोड़ दूँ कि  अंजान शहर में मैं अकेली कैसे रह पाऊँगी? अगर इस बार फिर मैंने जॉब करने का अवसर गँवा दिया तो फिर जाने कभी मुझे जॉब करने का मौका मिले या न मिले? क्यूंकि माँ जी तो पहले ही नहीं चाहतीं कि मैं जॉब करूँ।

अवि के जाने के बाद भी रिया के मन में उलझन चलती ही रही, कभी उलझती तो कभी सुलझती। सुबह सुबह अवि ने खबर पढ़ के सुनाई, “देखो ट्रेन से घर लौट रही लड़की की लाश चार दिनों बाद शहर के बाहर झाड़ियों के पीछे मिली, दुष्कर्म करके मारने की आशंका!” रिया ने सुना अनसुना करके चाय अवी के सामने रख दी और बालकनी में रखे गमलों को देखने लगी।

अवि ने रिया को बाँहों में भरकर कहा, “कहाँ जाओगी मुझे छोड़कर, मैं यहाँ, तुम वहाँ और हमारी घर गृहस्थी का क्या होगा? सोचा है? छोड़ो ये नौकरी करने  का चक्कर, आराम से घर में रहने और सोने को मिलता है तो मुझे समझ नहीं आता कि तुम औरतें नौकरी क्यूँ करना चाहती हो? अपनी आज़ादी प्यारी नहीं क्या?”

रिया ने ठंडी साँस लेकर कहा, “क्यों मुझे घर सँभालने कहाँ आता है? साफ सफाई तो कामवाली कर देती है। और किचेन का तो कितना सारा काम तुम खुद कर लेते हो, वो भी मुझसे अच्छा। है कि नहीं बोलो?

और आज़ादी क्या इसी को कहते हैं कि घर में पड़े रहो? पति के आने का इंतजार करो? कभी खाना बनाकर इंतजार करो, तो कभी तैयार होकर इंतजार करो? मन बहलाने के लिए टीवी देखो?” रिया ने जोर देकर कहा, “मुझे ये इन सब में आज़ादी नहीं घुटन महसुस होती है।”

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अवि को समझ आ रहा था कि जाने अनजाने जो वो रिया को कहता रहता है कि तुमसे ज्यादा काम तो मैं करता हूँ, या क्या करती हो तुम घर पर? ये सब बातें  रिया को आहत करती हैं। अवि ने प्यार से बात बदलते हुए कहा, “यार तुम जानती हो, तुम्हारे बिना यहाँ सब सुना हो जायेगा और घर तो गृहिणी से ही  होता है न?”

रिया ने भी समझाते हुए प्यार से कहा, तो मैं कहाँ जीवन भर के लिए तुम्हें छोड़कर जा रही हूँ अवि? जाते ही तबादले की लिए लिखकर दे दूंगी और अगर तबादला न भी हुआ तो मैं हर महीने छुट्टियों में तुम्हारे पास आ जाया करुँगी या कभी कभी तुम मेरे पास आते रहना। चलो चाय पियो। मैं लंच बनाकर ज़रुरी शॉपिंग करने जाऊँगी।”

रिया नहाने के लिए बाथरूम में चली गयी। आज सब उलझनों की दिमाग से धोकर फ्रेश होने के लिए। आखिर उसे भी हक है अपनी मेहनत का, अपनी पढ़ाई का,  काबिलियत का फल चखने का। अकेले रहने के डर से क्यूँ इतना अच्छा मौका गँवा दे? बालों को झटक कर रिया ने शावर चला दिया और अपनी नयी आज़ादी के सपने बुनने लगी।

आप सबको मेरी ये कहानी कैसे लगी? अपनी राय और सुझाव मुझे ज़रुर दें।

मूल चित्र : IndiaImages from Getty Images Via CanvaPro 

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