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क्या आप ‘फलों का राजा’ आम से जुड़े इन 9 तथ्यों से परिचित हैं?

Posted: जुलाई 4, 2020

फलों का राजा आम अनेक तहज़ीब, ज़ुबा, रहन-सहन, बोली और अपने-अपने मज़हब को मानने वाले देश भारत की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा है। 

अनेक तहज़ीब, ज़ुबा, रहन-सहन, बोली और अपने-अपने मज़हब को मानने वाले देश भारत की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा है, यहां का खाना। जिसके स्वाद में अपने मीठे रसीले तासीर से घुला-मिला हुआ है आम का फल और उसके जुड़े सैकड़ों किस्म के ज़ायके। आम का फल, पेड़ और पत्तियों ने अपने सैकड़ों गुणों  के कारण हर एक भारतीय के दिल में “फलों का राजा” सरीखे की ज़गह बनाए हुए है।

आम हमारे देश का ही नहीं, पाकिस्तान और फिलीपींस में भीराष्ट्रीय फल  माना जाता है

हर एक भारतीय दिल में आम के लिए खास ज़गह होने के कारण ही आम हमारे देश का ही नहीं, पाकिस्तान और फिलीपींस में आम राष्ट्रीय फल माना जाता है और बांग्लादेश में आम के पेड़ को राष्ट्रीय पेड़ का दर्जा प्राप्त है।

कोई आम की एक नस्ल का दीवाना है तो कोई दूसरे नस्ल का

मई-जून के तपती गर्मी के दिनों में कुछ अपवाद को छोड़कर शायद ही किसी शख्स कि ज़ुबान में आम और आम के बने व्यज़नों की तासीर घुली न हो। अपने रसीले मीठास से अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सभी को हर तरह ख़ास नस्ल दीवाना बनाए रखती है। हर एक जुबान का स्वाद आम के अलग-अलग किस्मों के लिए अलग-अलग तरह हैं, कोई एक नस्ल का दीवाना है तो कोई दूसरे नस्ल का।

तपती गर्मी में लू के धपेड़ों में आम पन्ना से बेहतर कोई दवा नहीं बैचेन मिजाज़ को शांत करने के लिए, बड़े-बुर्जुग यह भी कहते हैं कि वसंत के दिनों में आम मज़री को हथेलियों में रगड़कर मसलने से त्वचा से जुड़े विकार भी दूर होते है।

फलों का राजा आम कई तरीकों से हमारे बीच मौजूद है

आम हर भारतीय घरों में कच्चे आम की चटनी, गुड़ के साथ खट्टमिठ्ठी, कई तरह के आम अचार, अमोट और न जाने कितने ही आम के ज़ायके और डिशेज़ के रूप में मौज़ूद है।

वैसे तो आम आता है गर्मियों के मौसम में, पर भारतीय घरों में महिलाएं कच्चे आम को मसाले-कच्चे सरसों के तेल के साथ मिलाकर शीशे या चीनी मिट्टी के मर्तबानों में डालकर सूरज की रोशनी में रखकर सहेज़े रखती है सालभर। इसी तरह कच्चे आम को सूखाकर उसका पाउडर बनाकर रखा जाता है जिसका इस्तेमाल सब्ज़ियों में खटाई के लिए होता हैं।

आम के अचार और खटाई के बिना भारतीय खाने की थाली की कोई कल्पना कर सकता है भला। महानगर और शहरों के दौड़ती भागती ज़िदगी में आम के ज़ायकों का मजा लेने का वक्त भले न मिले पर शीशे के छोटे-बड़े आकार के बोतलों में आम के अचार ज़रूर मिलते हैं।

आम का पेड़ और इसकी पत्तियां भी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है

आम का केवल फल ही नहीं आम का पेड़ और इसकी पत्तियां भी भारतीय संस्कृति में इस कदर घुला-मिला हुआ है कि इसे जीवनदायनी वृक्ष के रूप में की जा सकती है। आस्था से जुड़ा हुआ भारतीय जीवन में आम के पेड़, उसकी पत्तियां ही नहीं आम की लकड़ियों का विशेष महत्व है। भारतीय संस्कृति के रीति, व्यवहार, हवन, पूजा, कथा, त्योहार सभी मंगल कार्यों में आम के एक भाग का इस्तेमाल शामिल ही है।

विश्व में भारत आम का सबसे बड़ा उत्पादक देश है

भवन निमार्ण से अन्य घरेलू कामों में आम की लकड़ियां अन्य पेड़ों के लकड़कियों से अधिक सहज-सुलभ है। जनउपयोगी ज़रूरतों के साथ-साथ विश्व में भारत आम का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। अनुमान है कि देश में प्रतिवर्ष एक करोड़ टन आम पैदा होता है जो दुनिया के कुल उत्पादन का 52 फीसदी है। प्रमुख उत्पादक होने के कारण आम भारतीय अर्थव्यवस्था में गतिशीलता भी देता है और मानवीय संबंध ही नहीं पड़ोसी देशों के साथ राजनयिक संबंधों को मधुर बनाने में “आम के टोकरी” की विशिष्ट भूमिका होती या रहती है क्योंकि पारंपरिक रूप से किसी को भी “आम के टोकरी” देना मित्रत्रा का सूचक है।

फलों का राजा आम भी कम नहीं इठलाता है

कड़कड़ाती सर्दी के बाद गुनगुने धूप के बसंत के दिनों में आम के बगानों में आम के मंजरी की खुश्बू फ़िजाओं में जो मदहोशी घोलते हैं, उसे केवल महसूस भर किया जा सकता है। वसंत की अल्साई धूप में आम की मंजरी हरे-हरे गुच्छे, हरे-हरे पत्ते में लुका-छुप्पी खेलते है, चुपचाप पृथ्वी का रस पीते, सूरज की रोशनी में नहाते, हवा से दुलार पाते, लोक-लोचनों से बिल्कुल दूर-दूर, ज़नानी से गदराती, कुछ पीली-पीली पड़ती जाती, गालों पर अप्रियतम लालिमा लि, बरसात की पहली फुहारे ठंडापन लिए रहता है। जिस नबावी ठाठ-बाट से प्रकृति आम को पालती है उससे आम भी कम नहीं इठलाता है।

हिंदी साहित्यक शिखर पुरुष हजारी प्रसाद द्दिवेदी फलों का राजा आम के बारे में लिखते हैं

“गर्मिन की ऋतुअन मैं,अब आमन के राज भये।

आम्र तरु सज धज के,एक नये रूप पाए लौ।

आम फिर बौरा गये आम फेरि बौरा गए॥१॥

काली घटा घट-घट के निचुक-निचुक बरसाए गई।

आम्र देखे उनको तौ, थोरो-थोरो घबराए गये।

आम फिर बौरा गये आम फेरि बौरा गये॥२॥

आम को कोई भी नहीं छोड़ता नहीं

केवल प्रकृति ही नहीं आम के बगीचे का माली भी अपने बाग के हरेक आम को नाज़ों से पालता ही नहीं, रखवाली में भी रात-दिन की सुधबुध खो देता है। नाज़ो-ख़्याल से पली आम की टोकरी जब अपने पेड़ और माली से बिछड़ कर मंड़ी-हाट-बाज़ारों में पहुंचती है तो अपने मोल-भाव से भी इतराती रहती है। घरों में पहुंचकर ठंड़े पानी में डुबकी लगाकर नज़ाकट से प्लेटों में सजकर अपने दीवानों के पास पहुंचती है तो चाहे उसमें रसीली मिठास हो या खट्टापन कोई भी उसको छोड़ता नहीं है।

आम के मौसम में आम खाने और खिलाने का शौक भारतीयों ने वैसे ही जिंदा रखा है

भले ही आज बाज़ार ने प्लास्टिक के बोतलों में आम के शीतल पेय बारहों महीने उपलब्ध करा दिया हो, पर आम के मौसम में आम खाने और खिलाने का शौक भारतीयों ने वैसे ही जिंदा रखा है, जैसे उनके दादा-परदादाओं ने शुरू किया था। आम केवल एक फल नहीं है एक ज़रिया है आपस में लोगों के बीच रिश्ते का मिठास घोलने का। एक ज़रिया है बगानों से टूटे आम के टोकरी आस-पड़ौस में भेजकर प्यार और मिठास बांटने का। वो मिठास जो बांधे रखे है समाज में प्यार का आपसी विश्वास और संबंध।

मूल चित्र : Canva

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