कोरोना वायरस के प्रकोप में, हम औरतें कैसे, इस मुश्किल का सामना करते हुए भी, एक दूसरे का समर्थन कर सकती हैं?  जानने के लिए चेक करें हमारी स्पेशल फीड!

फ़िल्म देवी के सवाल का जवाब अब हमें देना होगा

फ़िल्म देवी से मुझे इतना तो समझ आया कि हमें अपने मतभेदों को भूलकर एक साथ खड़े रहना है क्योंकि एक औरत ही दूसरी औरत का दर्द समझ सकती है।

फ़िल्म देवी से मुझे इतना तो समझ आया कि हमें अपने मतभेदों को भूलकर एक साथ खड़े रहना है क्योंकि एक औरत ही दूसरी औरत का दर्द समझ सकती है।

लार्ज शॉर्ट फिल्म्स, इलेक्ट्रिक एप्पल्स, इंडियन स्टोरीटेलर्स प्रोडक्शन की शॉर्ट फिल्म देवी रिलीज़ हो चुकी है। डायरेक्टर प्रियंका बनर्जी की फ़िल्म देवी को 2 मार्च 2020 को यू-ट्यूब पर रीलीज़ किया गया है। इस फिल्म का पहला पोस्टर आने के बाद से ही इसे लेकर काफ़ी बातें हो रही थी इसलिए देखना ज़रूरी था और देखने के बाद फिर से देखने का मन कर गया।

फ़िल्म देवी का सच आपको झकझोर देगा

13 मिनट की ये फ़िल्म देवी आपको पूरे वक्त अपने साथ जोड़कर रखेगी। इसकी कहानी, कैरेक्टर क्लाइमेक्स और मैसेज सब कुछ बांध कर रखता है। 9 महिलाओं की कहानी ‘देवी’ का दरवाज़ा अब खुल चुका है और इसका सच आपको झकझोर देगा। फिल्म देखने के कुछ देर बाद भी आप इसके बारे में सोचेंगे ज़रूर क्योंकि ये जो सवाल उठाती है वो है ही ऐसा।

फ़िल्म की कहानी

एक कमरे में बंद 9 औरतें अपने-अपने कामों में लगी हैं। ये सारी औरतें अलग-अलग बैकग्राउंड्स से हैं जैसे एक बोल नहीं पाती, दूसरी शराब पी रही है, 3 बुज़ुर्ग मराठी औरतें हैं जो थोड़ी पुरानी सोच की हैं, उनमें से एक की शादी 12 साल में हो गयी थी इसलिए वो कभी स्कूल नहीं गई, एक बिज़नेसवूमन है जो सिर्फ अंग्रेज़ी में बात करती है, एक मुस्लिम औरत है, एक पढ़ाई करती हुई लड़की है और एक साड़ी में घरेलू सी नज़र आने वाली औरत।

छोटी सी गूंगी लड़की टीवी को थपथपा कर उसे चलाने की कोशिश कर रही है। थोड़ी देर बाद टीवी चल जाता है और सभी औरतों का ध्यान टीवी पर चल रही ख़बर की तरफ़। ख़बर में रिपोर्टर किसी केस की पीड़ित के घर के बाहर है जहां उसे जाने नहीं दिया जा रहा और वो सवाल उठा रहा है कि “आख़िर क्यों साल दर साल गुनहगारों को उनकी सज़ा नहीं मिल पा रही है।”

टीवी अचानक बंद हो जाता है और ये औरतें चुप हो जाती हैं। कुछ ही देर बाद तेज़ी से दरवाज़े की घंटी बजती है और इन औरतों में झगड़ा होने लगता है जैसे कि दरवाज़े पर बजी घंटी उनके लिए कोई मुसीबत लेकर आई हो।

सभी औरतें इस बात पर बहस करने लगती हैं कि दरवाज़े पर खड़े शख्स को अंदर बुलाना चाहिए या नहीं। कोई कहता है, “एक कमरे में हमें बकरियों की तरह भर दिया है। इस भीड़ में और कितनी औरतें रहेंगी।” तीन बुज़ुर्ग औरतें इस पक्ष में ही हैं कि जो भी बाहर है उसे अंदर ना आने दिया जाए क्योंकि इस कमरे में अब किसी और के लिए जगह नहीं है।

Never miss real stories from India's women.

Register Now

कुछ इस पक्ष में भी हैं कि बाहर जो भी है उसे अंदर बुला लिया जाए क्योंकि शायद उनकी ही तरह उसे भी ज़रूरत है। तर्क-वितर्क में लड़ाई बढ़ती रहती है और ये औरतें एक-दूसरे को ताने भी कसने लगती हैं।

कौन रहेगा अंदर कौन जाएगा बाहर

दरवाज़े की घंटी फिर बजती है लेकिन अभी भी ये औरतें इस बात का फ़ैसला नहीं कर पा रही हैं कि बाहर जो भी है उसे पनाह दी जाए या नहीं। इसका फ़ैसला करने के लिए किताब पढ़ रही लड़की कहती है कि यहां रहने के लिए उन्हें एक सिस्टम की ज़रूरत है क्योंकि हर कोई एक वक्त में अंदर नहीं रह सकता। उसकी बात पर कुछ महिलाएं हामी तो भर देती हैं लेकिन ख़ुद बाहर जाने से इनकार कर देती हैं।

ये औरतें तय करने लगती हैं कि अंदर-बाहर वालों का बंटवारा कैसे करें। एक लड़की कहती है, “जिनके पापा, भाई या पति ने किया हो वो रह सकते हैं।”

फिर दूसरी औरत कहती है कि उम्र के हिसाब से बंटवारा किया जाना चाहिए। फिर कोई कहती है जिस तरीके से हुआ था, उस हिसाब से फ़ैसला किया जाए।

कोई कहता है जला दिया गया, चाकू से मारा, बीयर बोतल से सर पर मारा, गला घोंट दिया, पत्थर से मारा। इस सीन के साथ ही आप ये समझने लगेंगे कि आख़िर इनके साथ क्या हुआ है।

बढ़ती लड़ाई देखकर ज्योति (काजोल) सख्ती से कहती है कि ‘कोई बाहर नहीं जाएगा और जो आई है उसे कहीं भेज नहीं सकते। बाहर की हैवानियत भरी दुनिया से अच्छा इस भीड़ में एडस्ट करना है।’ ज्योति की बात सुनकर विरोध के स्वर शांत हो जाते हैं और वो दरवाज़ा खोलने के लिए बढ़ जाती है।

ज्योति अंदर अकेले नहीं आती बल्कि किसी के साथ आती है जिसे देखने के बाद ये औरतें अपनी सारी बहस भूल जाती है और सबकी आंख में आंसू आ जाते हैं। इस फिल्म का आख़िरी सीन बहुत ही पावरफुल है जिसे देखने के बाद आपके सामने कड़वी सच्चाई आएगी। फिल्म में आपकी दिलचस्पी बनी रहे इसलिए अंत नहीं बताऊंगी।

फ़िल्म देवी का संदेश

इस फिल्म का सबसे ज़रूरी संदेश सिस्टरहुड है। ऐसा कोई दिन नहीं होगा जिस दिन हम औरतों के ख़िलाफ़ किसी अपराध की ख़बर ना सुनते हों। औरतों को हर रोज़ घर, बाहर, दफ़्तर हर तरफ़ अपने अधिकारों के लिए लड़ना पड़ता है। कोई नहीं जानता ये सब खत्म कब होगा? इसलिए हमारा साथ कोई दे ना दें हमें अपने मतभेदों को भूलकर एक-दूसरे के साथ हमेशा खड़े रहना है क्योंकि एक औरत ही दूसरी औरत का दर्द समझ सकती है।

अभी ये फिल्म देखिए और ज़रूर बताएं कि आपको ये फिल्म कैसी लगी। हां, एक और बात फिल्म देखते हुए कमरे में टंगी घड़ी ज़रूर देखिएगा जो कभी बढ़ती ही नहीं…

मूल चित्र : YouTube

पसंद आया यह लेख?

पाइये विमेन्सवेब के सारे दिलचस्प हिंदी लेख अपने ईमेल इनबॉक्स मे!

विमेन्सवेब एक खुला मंच है, जो विविध विचारों को प्रकाशित करता है। इस लेख में प्रकट किये गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं जो ज़रुरी नहीं की इस मंच की सोच को प्रतिबिम्बित करते हो।यदि आपके संपूरक या भिन्न विचार हों  तो आप भी विमेन्स वेब के लिए लिख सकते हैं।

टिप्पणी

About the Author

133 Posts | 463,635 Views
All Categories