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माँ, क्या सच में रानी बेटी राज करेगी?

नंदिनी तो केवल अपनी इच्छा जाहिर कर रही थी। लता भी अब सोच रही थी कि क्या उसका फैसला सह था, क्या वास्तव में उसकी बेटी राज कर रही है?

नंदिनी तो केवल अपनी इच्छा जाहिर कर रही थी। लता भी अब सोच रही थी कि क्या उसका फैसला सह था, क्या वास्तव में उसकी बेटी राज कर रही है?

बेटी की शादी में लता ने सारे अरमान निकाल लिए। मन में जो जो इच्छाएं अपनी शादी के समय से रह गई थी वह सब पूरी कर लीं। ऊपरी मंजिल पर रहने वाली जेठानी को भी अंगूठा दिखा दिया कि “देखो शादी ऐसे की जाती है।”

जेठानी को सुना कर बोली, “लड़की की शादी तो ऐसे घर में करनी चाहिए कि ठाठ से रहे यह नहीं कि हर मुसीबत में मदद मांगने मायके आकर खड़ी हो जाए।”

जेठानी बेचारी चुप रह गई क्योंकि उनके घर में यही होता था। तीनों बेटियों में से कोई ना कोई कभी डिलीवरी के लिए तो कभी अपनी बीमारी में, कभी नाराज होकर और कभी ऐसे ही मायके में आती जाती रहती थी। एक कस्बे में रहने वाले दोनों भाइयों के पास हिस्सा बराबर था लेकिन पता नहीं मेहनत या भाग्य की कमी के कारण दोनों के स्तर में अंतर बढ़ता चला गया।

लता की बेटी सुमन का विवाह वास्तव में बहुत धनी परिवार में हुआ था। बिजनेस भी थी, ससुर पॉलिटिक्स में थे और काफी प्रॉपर्टी थी। सुमन की हर इच्छा पूरी हो जाती थी फिर भी वह खुश नहीं हो पाती थी। यदि साड़ी खरीदनी है तो ससुर घर में ही साड़ियां मंगवा लेते थे इनमें से ही छांट लो।

“संख्या और कीमत की कोई चिंता ना करना”, सास कह दिया करती थी। जो कुछ खाना है वह घर में बन जाता था।  दूध घी की कोई कमी नहीं थी क्योंकि पास में ही उनका कृषि फार्म था जहां से सब कुछ आ जाता था। कहीं जाना है तो गाड़ी खड़ी थी जिसमें अकेली नहीं जा सकती थी साथ में देवर या पति को लेकर ही जा सकती थी।

पति के पास मोटरसाइकिल थी लेकिन सुमन को बैठाकर कहीं नहीं ले जा सकते थे। ससुर का कहना था, “भले घर की बहू बेटियां इस तरह से मोटरसाइकिल पर पति के पीछे चिपक कर बैठ कर घूमती अच्छी नहीं लगतीं।”

यहां तक तो फिर भी ठीक था लेकिन सुमन तब बहुत परेशान हो जाती थी जब उसे मायके जाने के लिए बहुत कम मिलता था। यह परेशानी तब और अधिक बढ़ गई जब उसका बेटा हो गया। अब तो सास-ससुर पोते के बिना रह नहीं पाते थे इसलिए सुमन भी कुछ घंटों के लिए ही मायके जा पाती थी। वे लोग यह भी कह दिया करते थे, “सुमन के मायके में एसी नहीं है बच्चा कैसे रहेगा?”

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राखी और संक्रांति पर सभी लड़कियां मायके आती  लेकिन सुमन को लेकर उसके पति आते थे, गाड़ी खड़ी रहती थी और वह लेकर ही लौट जाते थे। अपनी बुआ की बेटी की शादी में किसी प्रकार से सुमन को दो दिन रुकने का समय मिल गया। सभी बहनों के साथ वह बाजार गई और अपनी इच्छा से खुलकर शॉपिंग की। लौटते समय सब ने चाट खाई।

यह तो गजब हो गया जब सुमन के ससुर को ज्ञात हुआ, “भले घर की बहू बेटियां सड़क पर पत्ते चाटती अच्छी लगती है क्या?” कहकर उन्होंने सुमन के मायके वालों को भी जमकर सुनाया। इसके बाद तो सुमन के मायके आने पर और रोक लग गई। लता इन सब बातों को अनदेखा करती हुई अपनी बेटी की ससुराल की समृद्धि की प्रशंसा करते नहीं थकती थी।

समय बीतता गया और सुमन एक बेटी की भी मां बन गई। एक दिन सुमन का रोते हुए फोन आया कि पापा जी मम्मी जी और ननद को लेकर शहर के मकान में चले गए हैं क्योंकि ननद की पढ़ाई आगे होनी थी। इसके साथ ही सुमन के बेटे को भी ले गए। वह भी अब पढ़ने योग्य हो गया था। कस्बे की बिजनेस सुमन के पति संभाल रहे थे इसलिए ससुर शहर में रहकर घर के बच्चों को पढ़वा भी लेंगे और पॉलिटिक्स की दुनिया में अधिक पैर फैला लेंगे।

यह सुनकर मन ही मन लता को भी बुरा लगा लेकिन उसने सुमन से यही कहा, “कोई बात नहीं बाबा बेटू को बहुत प्यार करते हैं तुमसे कहीं ज्यादा अच्छी तरह से रखेंगे।” उसने यह समझने की जरूरत नहीं समझी कि बच्चा भले ही दिन भर किसी के भी पास रहे पर रात को मां के कलेजे से लग कर सोता है तब दोनों ही निश्चिंत होकर सो सकते हैं।

सुमन धन वैभव ऐशो आराम से घिरी ऐसा जीवन बिता रही थी जो उसके सास-ससुर की मर्जी से चलता था। पति कुछ नहीं बोलते थे क्योंकि उन्हें यह सब सामान्य लगता था। वह सुमन के मायके वालों को भी कमतर आंक कर बात करते थे। उनके अनुसार मायके वालों का फर्ज था कि हर कुछ दिन बाद फोन करके उनसे हालचाल पूछे। हर तीज त्यौहार पर उन्हें सम्मान सहित उपहार दें। अपनी चचेरी बहनों के पति की तरह से सुमन अपने पति की मायके में  कभी भी हंसी मजाक करते हुए छवि सोच भी नहीं सकती थी। वह हमेशा ससुराल में कुंवर साहब बने रहते थे।

सुमन की मौसी की बेटी का विवाह था। मौसा जी अच्छे रसूख वाले और पैसे वाले लोग थे इसलिए उसके ससुर ने निमंत्रण आने पर उसे वहां भेज दिया और हां बच्चों को अपने ही पास रखा। छोटे-छोटे बच्चों को छोड़कर आने के कारण सुमन का मन भी नहीं लग रहा था तथा सब उसे आश्चर्य व आलोचनात्मक दृष्टि से देख रहे थे।

लता सुमन की ससुराल की प्रशंसा के पुल बांध रही थी। कभी उसके गहनों के बारे में बात करती तो कभी कीमती साड़ियों या बाहर खड़ी बड़ी गाड़ी के बारे में बात करती। महिलाएं गीत गा रही थीं। तभी एक महिला ने अपनी पसंद का गीत गाना शुरू कर दिया, “खुशी खुशी कर दो विदा की रानी बेटी राज करेगी।”

लता बहुत खुश होकर अपनी बहन की छोटी बेटी नंदिनी से बोली, “तेरी शादी तो मैं सुमन के देवर से करवाऊंगी फिर देखना तू वास्तव में राज करेगी जैसे सुमन राज कर रही है।”

नंदिनी हंसते हुए बोली, “मौसी वहां शादी करके मैं राज करूंगी या राजसी जेल में रहूंगी? मुझे ऐसा राजपरिवार नहीं चाहिए। मेरे लिए तो कोई साधारण परिवार ढूंढिए जहां मैं आजाद रह सकूं।”

जब तक नंदिनी की मां उसे रोक पातीं तब तक नंदिनी ने अपनी बात पूरी कर दी और सभी महिलाओं के सामने लता पर घड़ों पानी पड़ गया। बरामदे में पुरुषों के साथ बैठे कुंवर साहब ने भी सुन लिया और गुस्से से आंखें लाल हो गईं पर कर क्या सकते थे क्योंकि नंदिनी तो केवल अपनी इच्छा जाहिर कर रही थी। लता भी अब सोच रही थी कि क्या उसका फैसला सह था, क्या वास्तव में उसकी बेटी राज कर रही है?

इमेज सोर्स: Rajat Sarki via Unsplash (for representational porpose only)

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