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रक्षाबंधन का त्यौहार : जैसे कि राखी ना हो गई, जीवन बीमा की पॉलिसी हो गई!

क्या ऐसा समझा जाए कि आज रक्षाबंधन का मतलब अपना स्वार्थ है? क्या हम केवल अपने फायदे के लिए ये रक्षा सूत्र बांधती हैं, कि भाई को राखी का फ़र्ज़ निभाना ही होगा? 

क्या ऐसा समझा जाए कि आज रक्षाबंधन का मतलब अपना स्वार्थ है? क्या हम केवल अपने फायदे के लिए ये रक्षा सूत्र बांधती हैं, कि भाई को राखी का फ़र्ज़ निभाना ही होगा? 

राखी अर्थात रक्षाबंधन का त्यौहार, और इस रक्षा सूत्र की परंपरा अब से नहीं, अपितु सदियों से चली आ रही है। मुख्यतः जब घर के पुरुष, युद्ध के लिए युद्ध भूमि में जाते थे, तो उनकी पत्नियाँ अपने सुहाग के सकुशल लौटने की प्रार्थना संग, इसे अपने पति की कलाई पर बांधती थी। उस धागे में उनकी, विश्वास भरी शुभकामनाएं और अमरता का वरदान बद्ध होता था।

 फिर समय बदला, रक्षाबंधन का रूप, आधार बदला और ये रक्षा सूत्र, राखी या रक्षा बंधन कहलाने लग गया। जिसमें बहनें, अपने भाइयों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य की मंगल कामना करती हुई, यह सूत्र उनकी कलाई पर बांधने लगीं।

परन्तु मुझे कभी-कभी हंसी भी आती है कि चाहे बहन अपने भाई से बड़ी हो या छोटी, चाहे स्कूल, खेल के मैदान में बड़ी बहन अपने छोटे भाई की रक्षा करती हो, चाहे बहन कमा कर अपने भाई का भरण-पोषण कर रही हो, चाहे बहन दुनिया के सर्वोच्च शक्तिशाली पद पर ही क्यों ना आसीन हो, परन्तु रीत यही है कि रक्षाबंधन का मतलब है कि बस राखी, भाई के ही बंधेगी।

प्रश्न उठना चाहिए कि तर्क के आधार पर, क्या उस बहन की लंबी उम्र की कामना के लिए, छोटे भाई को भी अपनी बहन की कलाई पर यह रक्षा सूत्र नहीं बांधना चाहिए?

क्या रक्षाबंधन का प्यार औरतों के नसीब में नहीं हो सकता?

चाहे सदियों पुराने समय की बात कर लें या आज की, रक्षाबंधन का एक आधार यही रहा है कि रक्षा सूत्र, औरत जाति ही पुरुष जाति को बांधती आई है। क्योंकि औरत चाहे पत्नी हो, बहन हो या माँ ही क्यों ना हो। वो रक्षा नहीं कर सकती, बल्कि उन्हें पति, भाई, पिता की सुरक्षा चाहिए। तो रक्षा किसकी होनी चाहिए पुरुष की, क्योंकि उसी ने तो औरत जाति के विभिन्न रूपों की सुरक्षा करनी है।
परन्तु अगर बहन होगी तभी तो भाई, भाई कहलाएगा! तो भाई के साथ-साथ बहन की भी लंबी उम्र की कामना होनी ही चाहिए।

अलग-अलग त्योहारों, पर्वों, व्रतों के द्वारा बड़ी श्रद्धा से औरतें, पुरुषों अर्थात पति, भाई, बेटे की लंबी उम्र, स्वास्थ्य की भगवान से याचना करती हैं। कारण कि औरतों के ये सब रूप अपने से संबंधित पुरुषों को बहुत प्यार करती हैं। परन्तु क्या ऐसा और इतना प्यार औरतों के नसीब में नहीं हो सकता! या फिर ये समझा जाए कि औरतें ये सब स्वार्थी हो कर करती हैं, तब तो हम सब स्त्रियाँ बहुत स्वार्थी हैं, जो केवल अपने फायदे के लिए, ये रक्षा सूत्र बांधती हैं!

राखी जीवन बीमा की पॉलिसी ही हो गई!

अरे! आप यह सब पढ़ कर व्यथित न हों! मैं रक्षाबंधन के त्यौहार के विरुद्ध नहीं बोल रही हूँ, अपितु मैं खुद साल भर इसका इंतजार करती हूँ। और निःस्वार्थ भाव से अपने भाईयों को राखी बांधती हूँ।

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मैं बस अपने इस पावन त्योहार को एक तार्किक आधार से देखने के लिए कह रही हूँ कि जहां बहनें भाईयों की रक्षा कर रहीं हैं। उन घरों में बहन से राखी बंधवा कर खुद भी उन्हें राखी बांधनी चाहिए। देखना! वो बहन गदगद हो जाएगी और उस समय के माहौल का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।
देखा! यह सुझाव आपको अच्छा लगा ना!

परन्तु सभी ऐसा नहीं कर पाएंगे, क्योंकि भाई पुरुष जाति से संबंध रखता है। जहां तक बहन से राखी बंधवाने के पीछे, बहन की सुरक्षा करने का तर्क है वे लोग कहेंगे कि भविष्य में बहन जब बूढ़ी होगी तो भी तो वो भाई अपना फर्ज निभा सकता है।

बस समझ लो, कभी ना कभी बहन को ही भाई की जरूरत पड़ेगी, तो बस यह एक बंधन है, जो उस समय काम आएगा, जब बहन भाई को धड़ल्ले से कह सकेगी कि मैं तुम्हें राखी बांधती रही हूँ तो, तुम ही मेरी मदद करोगे! जैसे कि राखी ना हो गई, जीवन बीमा की पालिसी ही हो गई!

अब रक्षाबंधन का मतलब है कि भाई जुट जाते हैं, अपनी चादर से बाहर पैर पसारने के लिए!

और आज कल इस दिन इतना आडंबर-दिखावा, चका-चौंध की, पूछो ही मत! बाजार से महंगे रेडीमेड गिफ्ट, कपड़े आदि की होड़ लग जाती है कि सबसे महंगा गिफ्ट लेना है, चाहे उसमें जरूरत का सामान कोई भी ना हो! और बहन जब सब समझ जाती है तो बड़ी भावुक हो प्यार से कहती है, “भाई मुझे कुछ नहीं चाहिए, तुम इन सब में मत उलझो!” पर भाई कहता है, “बहना तुम्हारे लिए नहीं, तुम्हारे ससुराल में तुम्हें कोई बात ना सुननी पड़े, इसलिए सलाह कर रहे हैं!”

अब बहन सचमुच चुप हो जाती है। और भाई-माँ-भाभी सब जुट जाते हैं, अपनी चादर से बाहर पैर पसारने के लिए! और बहन सोचती है कि अगली बार डाक से ही राखी भेज दूंगी। पर फिर अगले साल अपने भाई की प्यारी सी सूरत को निहारने के लिए, राखी के बहाने पहुँच जाती है।

तो सारांश यह है कि किसी भी पर्व, त्योहार, व्रत का जो तार्किक आधार है, उनको दिमाग से नहीं देखना तो दिल से ही देख लिया जाए। बस अंधाधुंध नहीं! तो देखिएगा इस पावन पर्व के दिन भाई के संग बहनें भी इतरा कर अपनी राखी स्कूल, कॉलेज, दफ्तर में दिखाएंगी। और गरीब भाई अपनी बहन संग बिना किसी चिंता के, इस दिन का आनंद ले पाएगा! और ये रक्षा सूत्र सारे परिवार की रक्षा करेगा!

मूल चित्र: Canva

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