क्यों स्त्रियों को एक समूचे अस्तित्व के तौर पर स्वीकारना इतना मुश्किल है

Posted: April 16, 2019

सम्मान दें और सम्मान पाएं, क्यूंकि मर्यादा का पालन सबको करना चाहिए, सिर्फ बहुओं या औरतों को ही नहीं। मर्यादा से ही समाज चलता है, ये न भूलें। 

महिला दिवस हर वर्ष की तरह ही इस बार भी आया और आकर चला गया। बड़ी खुशी होती है एक महिला, एक स्त्री होने पर मुझे। पर ये खुशी तकलीफ़ में बदल जाती है जब मेरे या मेरी जैसी किसी अन्य स्त्री के अस्तित्व को नकार दिया जाता है, कभी शब्द-बाण से बेधकर, तो कभी उसके होने पर ही प्रश्न उठाकर, या फिर उसके फैसले उसे खुद ना लेने देकर और उसे परजीवी बनाकर।

हर बार की तरह सभी ने अपने-अपने ढ़ंग से अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की खुशियां मनाईं। फिर हर तरफ भाषण और वही बातें शुरू हुईं, महिला सशक्तिकरण की और नारी पूजनीय है इत्यादि, यानि कि बड़ी-बड़ी हस्तियों ने महिलाओं के महत्व का एहसास दिलाने की कोशिश की और इसकी ज़रुरत भी है पर हमारे समाज में ये बातें एक कान से सुनी जाती हैं और दूसरे कान से निकाल भी दी जाती हैं। हम सब इस दिन पर कई जटिल और सुंदर शब्दों को सुनते हैं, बहुत अच्छा और गर्व भी महसूस होता है, जैसे कि वीमेन-राइट्स, वीमेन-पावर, जेंडर-इक्वालिटी आदि और इसी तरह के कितने ही शब्द और बातें जो कि सिर्फ बातें ही रह जाती हैं और अगले ही दिन से फिर वही शुरू क्योंकि जब तक कोई बात दिल से ना मानी जाए और बदलाव घर से ना शुरू हो वो सिर्फ एक बात बनकर रह जाती है।

वैसे तो ये सिर्फ हम औरतें ही जानती है कितनी सचाई है इन बातों में। क्या सच में नारी को पूजते हैं लोग या इसे सिर्फ प्रयोग की वस्तु एवं एक देह मात्र की तरह मान कर ही चला जाता है, और वो भी अपनी सहूलियत और जरूरत से। और, इन्हीं सब के बीच कहीं हमारी बच्चियों के लिए सड़क पर निकलना सुरक्षित नहीं होगा। और, कहीं दूसरी जगह पर कोई लोग ये निर्णय लेंगे कि लड़कियों को क्या पहनना चाहिए जिससे वो सुरक्षित रहें, छेड़छाड़ और रेप की घटनाओ से और इस बीच हम सब बातें और सिर्फ बातें करेंगे, क्यों कोई लड़कों या मर्दों को नहीं कहता/सिखाता कि भई तुमको औरतों और लड़कियों की इज़्ज़त करनी चाहिए न कि बुरी नज़र रखनी चाहिए। अपनी बहन को कोई कुछ कहे, तो खून खौल जाता है, फिर वही व्यवहार तुम दूसरे की बहन-बेटी के साथ कैसे कर सकते हो?

इस पुरुषप्रधान समाज में आज भी नारी को दोयम दर्जा ही दिया जाता है, चाहे वह बाहर जाकर पैसे कमाए या घर पर ही चौबीसों घंटे काम करे। क्या इतनी स्वतंत्रता है एक स्त्री को, कि अपनी मर्ज़ी से, कमाऊ होने क्र बाजवूद, अपने मन की कोई बड़ी चीज़ घरवालों या पति से पूछे बिना ले ले?

सबकी कहानी एक जैसी ही है, औरतों के हाथ बांध कर रखो, उसे ज्यादा सोचने-विचारने ही मत दो, कहीं उच्छृंखल न बन जाये, कहीं कुसंस्कारी न हो जाये। कहीं  अपने आप ही निर्णय ले तो, ऐसे कैसे? और इन बातों को उठाती भी सबसे पहले औरतें और महिलाएं ही हैं, जिनमें सास ,ननद, देवरानी, जेठानी, चाची, ताई, भाभी एवं पड़ोसन इत्यादि हो सकती हैं, जो अपनी या पास-पड़ोस की बहुओं को जली-कटी सुनाने में कोई कसर नहीं रखती।

शर्म आती है ससुराल वालों को अगर जब बहू कम पढ़ी-लिखी हो तो, “अंग्रेजी भी नहीं बोल पाती, पार्टी में ले जाने और लोगों से मिलाने लायक नहीं है बिलकुल ये मेरी बहू”। फिर अगर ज्यादा पढ़ी-लिखी और नौकरीपेशा है, थोड़ी जुबां भी खुल जाती है कभी उसकी तो बस देखो, “कितनी बेशरम है बड़े-छोटे का लिहाज़ ही नहीं इसको”, या फिर “पैसे की धौंस दिखाती है हमेशा, पता नहीं माँ-बाप ने क्या संस्कार दिए हैं इसको।” अब बहु के माता-पिता का इससे क्या लेना-देना है, पहले खुद को देखो जितनी कड़वी बातें आप बोलते हो, बहू पलट के एक बात भी बोल दे तो संस्कार और घटिया परवरिश का आप नाम देते हो। किन एक बात पूछनी थी, ये जो आप हर समय बहुओं को और उनके माता-पिता को कोसते रहते हो उससे किसकी परवरिश और संस्कार पर सवाल उठने चाहिए जरा मंत्रणा करके बताना।

“अरे! जल्दी करो, घंटों लगते हैं तुमको तैयार होने में!” सखियों, क्या आपको भी ये डायलॉग सुना सा लग रहा है?

जी, सही सोचा आपने ‘श्रीमान’ जी अपनी ‘श्रीमती’ जी से कह रहे हैं, जिनको ज़रा भी एहसास नहीं होता है ये कहने से पहले कि जितनी देर में वो बाथरूम से निकल कर आए हैं उतनी देर में श्रीमती जी ने नाश्ता बना दिया है, बच्चों को तैयार कर दिया है, घर समेट लिया है। जी हाँ, वही जो आपने फैलाया था, अरे वहीं शर्ट को बेड पर डाल देना, टॉवल कहीं और आपका लैपटॉप बैग तो डाइनिंग-टेबल पर ही छोड़ दिया था, आप बहुत थके हुए जो थे न। और हम औरतों, खासतौर पर बहुओं को, थकने का भी अधिकार नहीं है, नहीं तो थकने पर लोग हमें बीमार करार देते हैं। बेड बना दिया है, सिलिंडर ऑफ कर दिया है और हाँ नाश्ते के बर्तनों को धोकर भी रख दिया है।

अरे, अभी लिस्ट कहाँ पूरी हुई है। आपने और बाकी सबने बाथरूम की जो गत बनाई है, जाने के पहले वो भी ठीक करके जाना है, क्योंकि सुनने को मिलेगा बाद में कि तुम इतना भी नहीं कर सकती? बाथरूम देखो कैसा पड़ा है, करती क्या रहती हो तुम?

तो भई, बाथरूम का नक्शा सुधार कर ज्योंही श्रीमती जी अपना चौखटा भी सुधारने चलीं तो बस आपका ही नहीं घर-भर का राग अलापना शुरू हो जाता है कि तुमको तो कहीं ले जाना हो तो दो दिन पहले से बताना चाहिए, देर हो रही है और तुम्हारा मेकअप ही नहीं हो पा रहा।

अच्छा जी, बताया होता तो दो दिन पहले ही नाश्ता भी तैयार कर देती श्रीमती जी। और तभी तो आपको समझ आएगा कि श्रीमती जी आखिर करती क्या हैं पूरे दिन।

ये उदाहरण जो मैंने दिए, बानगी भर है रोज़ हमारे साथ होने और बीतने वाले पलों के जिसके बावजूद हमारे पास इतना समय भी नहीं होता कि सोच लें कि अच्छा, बुरा क्या है, कोई प्रतिक्रिया भी दे लें। क्योंकि, रोज़ बोलो और रोज़ हाय-तौबा मचेगी फिर तो। इसलिए हमने चुप रहना सीख लिया है, मन को मार कर। पर फिर भी ये कहना है हमारा कि हमें इज़्ज़त दो, हमें देवी मत बनाओ एक दिन के लिए और पूजा भी मत करो हमारी। बस थोड़ा प्यार, थोड़ी इज़्ज़त और थोड़े मर्यादित बोल हमारे लिए प्रयोग करें। बस इतनी सी ही श्रीमती जी और एक बहू और एक नारी की आकाँक्षा है।

मेरा स्वाभिमान मेरे लिए बड़ी चीज़ है, उसे अपने शब्दों से छलनी न करें। सम्मान दें और सम्मान पाएं, क्यूंकि मर्यादा का पालन सबको करना चाहिए, सिर्फ बहुओं या औरतों को ही नहीं। मर्यादा से ही समाज चलता है, ये न भूलें।

बेटियों के साथ बेटों को भी सिखाएं सभी की इज़्ज़त करना और अपने काम करना।

मैंने देखा है घरों में छोटी या बड़ी लड़कियां या बहुएँ ही जूठी प्लेटें उठातीं हैं। आदमी बस खाकर उसे वैसे ही टेबल पर छोड़ देते हैं। बार-बार लड़कियों और औरतों को खाने के बीच से उठा दिया जाता है कि ‘ज़रा पानी ला देना, ज़रा पापड़-अचार ला देना।’ क्या ये सही है किसी को खाने पर से उठा देना? क्यों आपको खुद उठकर कुछ लेने में शर्म आती है?

ध्यान दीजिये, छोटी बातें हैं पर मन को लग जाती हैं। इसलिए कुछ छोटे-मोटे काम आप भी करिये, आत्म निर्भर बनिए। हमें और आपको, सबको कम कष्ट होगा और परिवार में सुख आएगा।

यकीन मानिये, जिन परिवारों में सब मिल कर आपसी सहयोग से रहते हैं वो सर्वाधिक सुखी परिवार हैं और समाज में मिसाल हैं।

इसलिए महिला दिवस पर सिर्फ एक दिन बड़ी-बड़ी बातें और वॉट्सएप्प पर संदेशों को भेजने की बजाय सच में रोज उन संदेशों में कही बातों पर अमल करें।  महिलाओं को सम्मान दें उनके स्वाभिमान को बनाये रखने में मदद करें। बस उतना ही काफी है हम स्त्रियों के लिए।

और यही हम महिलाओं को भी करना है, आपस में एक-दुसरे की जड़ें न काटें। अगर दूसरी किसी महिला को आपकी ज़रुरत है तो सहारा बनें न कि ताने और जली कटी बातें कहकर उसके स्वाभिमान को चोट पहुंचाए। क्योंकि, टूटी कलम और औरों से जलन, खुद का भाग्य नहीं लिखने देती है। साथ मिलकर चलें हम महिलाएं तो, शक्ति हैं, दुर्गा हैं हम, और ये आज के वक़्त की ज़रुरत भी है।

Smita Saksena writes Stories, Poetries, Articles on Social Issues and Parenting , Quotes etc. for various

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