“अच्छा है तेरा कोई भाई नहीं है…”

Posted: October 29, 2018

“कभी-कभी लगता है कि मेरा भाई होता तो अच्छा ही होता।” मेघना के ऐसा कहना पर, इरम और ईशा ने क्यों कहा,”अच्छा है न तेरा कोई भाई नहीं है।”   

“क्या हुआ, तेरा मुँह क्यों लटका हुआ है?”

इरम अपनी प्यारी सहेली मेघना का चेहरा देखते ही जान गई कि आज फिर उसके घर में धमाल मचा होगा।




“कुछ नहीं यार। मैं कब से तेरा और ईशा का इंतज़ार कर रही हूँ। आज प्रेक्टिस नहीं करनी क्या?” मेघना अपने बैग से बैडमिंटन रैकेट निकाल कर बैंच पर रखते हुए बोली।

इरम ने हैरानी से अपनी घड़ी की ओर नज़र घुमाई। अभी तो पाँच ही बजे थे और ये तीनों सहेलियाँ साढ़े पाँच बजे ही अपनी बैडमिंटन प्रेक्टिस शुरु करती थीं। तीनों एक ही स्कूल से थीं, एक दूसरे से अच्छी दोस्ती थी और हर रोज शाम को इसी पार्क में जॉगिंग करती थीं। ज़ोनल स्पोर्ट्स मीट को कुल दो महीने बचे थे इसलिए इनकी बैडमिंटन प्रेक्टिस भी ज़ोरों पर थी – पहले स्कूल में, फिर शाम को पार्क में।

“मेघना, अभी तो प्रेक्टिस का टाईम ही नहीं हुआ। ईशा भी आती होगी। तू बता, तेरे घर में आज फिर महाभारत हुई क्या?” इरम ने मेघना के बगल में बैठते हुए पूछा। पार्क के दूसरी तरफ से बच्चों का शोर शुरु हो चुका था।

“हाँ यार, फिर वही, माँ और दादी का ड्रामा।”

“किस बात पर?”

“एक ही तो मसला है। घर में दो बेटियाँ हैं, कोई बेटा नहीं है। बेटियों की शादी हो जाएगी, तो घर सूना हो जाएगा। पेरेन्ट्स का ख्याल कौन रखेगा। वगैरह, वगैरह…”

“हम्म, टिपिकल थर्ड-वर्ल्ड प्रोब्लम्स।” इरम ने शरारती हँसी हँसते हुए कहा।

“हाँ इरम, बिल्कुल सही कहा।”

“पर मेघना, तेरी दादी बिल्कुल ऐसी नहीं लगती यार, जो तेरी मॉम को बेटा न होने पर ताने मारे। वो बहुत अच्छी और समझदार लगती है।”

सोलह साल की मेघना ने अपनी सहेली की तरफ देखा ओर एक लम्बी सी साँस ली। इरम ठीक ही तो कह रही थी। दादी बहुत अच्छी और समझदार थीं। अपनी दोनों पोतियों को बेहद प्यार और दुलार करती थीं। फिर क्या हो जाता है कभी-कभी सबको? माँ को, दादी को?

“इरम, ये जानना बहुत मुश्किल होता है कि किसके मन में क्या चल रहा है। मेरी दादी बहुत अच्छी है, मेरी माँ भी बहुत अच्छी है। पर दोनों का अपना-अपना एक इमोशनल लेवल है,” मेघना ने मायूसी से कहा।

“आज क्या हुआ?”

“मेरे कोई दूर के अंकल हैं, फ्लोरिडा में रहते हैं। आज उनका फोन आया कि उनका बेटा हुआ है, और फिर मेरी छोटी बहन रिया ने दादी को अपनी फेसबुक प्रोफाईल से बेबी की फोटोज़ भी दिखाईं। दादी ने कहा कि चलो अब अंकल की फैमिली कम्पलीट हो गई। माँ ने सुन लिया। वो पहले से ही गुस्से में थी किसी बात पर। तो उन्होंने दादी से पूछा कि क्या उन्हें हमारा परिवार इन्कम्प्लीट लगता है।”

“फिर?”

“फिर दादी ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर माँ ने कुछ और कहा, तो दादी ने भी कुछ कह दिया। फिर कुछ और बातें  हुईं ओर फिर लड़ाई शुरु – फुल ऑन।”

“ओह!”

“इरम, मुझे लगता है कि मेरी माँ को गिल्ट कॉनशिएन्स है। उनको लगता है हर कोई उन्हें ताने दे रहा है। वो बातों को ऐसे ही इन्टरप्रेट करती हैं। और इसलिए वो दादी की हर छोटी-छोटी बात पर आपा खो देती हैं। फिर दादी भी शुरु हो जाती हैं , माँ को कोसने लगती हैं कि उनकी वजह से उनका वंश अब आगे नहीं बढ़ पाएगा। फिर तो दोनों में फुल थ्रोटल – एक-दूसरे को ताने मारने का कॉम्पिटिशन होने लगता है।” मेघना के भीतर की मायूसी अब उसकी आँखों से छलकने लगी थी।

“छोड़ न यार, चल थोड़ा वार्म-अप करते हैं। ” इरम ने मेघना का ध्यान बँटाना चाहा।

“यार इरम, कभी-कभी लगता है कि मेरा भाई होता तो अच्छा ही होता।”

अब भड़कने की बारी इरम की थी।

“तुझे पता भी है ये भाई किस सरदर्द का नाम है? मुझसे पूछ! मेरा एक भाई है, मुझसे छोटा है पर रौब ऐसे झाड़ता है कि क्या बताऊँ। उसे मेरी हर बात में दखल देना है – ऐसे कपड़े क्यों पहन रही हो; इतना मत घूमा-फिरा करो; स्पोर्ट्स में क्या रखा है, घर में मॉम का हाथ बँटाया करो। उफ! वो तो अच्छा है कि मेरे मॉम-डैड सपोर्टिव हैं वर्ना मेरा भाई तो…।”

“यार इरम, केयर करता होगा तेरी वो,” मेघना ने समझाना चाहा पर इरम फिर गुर्राई।

“खाक केयर करता है। गर्लफ्रेंड ऐसे बदलता है जैसे कपड़े, और मैं किसी लड़के से बात भी कर लूं तो उसे टेंशन हो जाती है। कभी-कभी जी करता है एक घुमा के दूँ कान के नीचे। पर फिर मॉम-डैड का लिहाज़ कर लेती हूँ। यार ये भाई ऐसे ही होते हैं। अच्छा ही है कि तेरा कोई भाई नहीं है।” इरम जैसे चीख रही थी।

“सभी भाई ऐसे नहीं होते।”

ये आवाज़ ईशा की थी।

“हाय ईशा!” इरम और मेघना दोनों अपनी सहेली को देख कर चहक उठीं। दोनों अपनी बातों में इतनी मशगूल थीं कि उन्हें ईशा का ख्याल ही नहीं रहा।

“तो बैडमिंटन की जगह गॉसिप हो रही है यहाँ।” ईशा ने मुस्कुराते हुए दोनों की हाय का जवाब दिया।

“गॉसिप नहीं हो रही। मैं बस इस लड़की को बता रही थी कि मैं अपने भाई से कितनी परेशान हूँ। ” इरम ने सफाई देनी चाही तो ईशा ने उसकी बात बीच में ही काट दी।

“पर मेरा भाई तेरे भाई जैसा नहीं है। वो तो बहुत अच्छा है, बहुत सपोर्टिव है, मुझे पढ़ाई में हेल्प करता है, गाईड करता है। ” ईशा कहते-कहते अचानक रुक गई।

“तु बहुत लकी है ईशा,” मेघना ने प्यार से अपनी सहेली का कंधा सहलाया।

“नहीं, इतनी भी लकी नहीं हूँ मैं। भाई अच्छा है, फैमिली में सब अच्छे हैं।  पर, कभी-कभी कुछ चीजें, कुछ बातें बहुत हर्ट करती हैं। चलो छोड़ो। लेट्स प्ले!”

“नहीं, प्लीज़ बताओ। क्या हर्ट करता है तुम्हें?” इरम अपनी इस हँसमुख सी सखी के चेहरे की मायूसी को देख कर हैरान थी।

“कुछ नहीं यार। बस कुछ छोटी-छोटी बातें है। जैसे अगर भाई को कुछ खरीदना होता है तो उसे झट से परमिशन मिल जाती है और मुझे कुछ चाहिए तो मुझे मम्मी-पापा को पहले अच्छे से कंविंस करना पड़ता है। और एग्ज़ाम्स के दौरान भाई रात भर जाग कर पढ़ाई करता है तो माँ हर घंटे-दो घंटे में उठ कर उसे चाय या काफी बना कर देती हैं। कभी-कभी तो हल्का खाना भी बना देती हैं। पर मेरे एग्ज़ाम्स के दौरान वो कभी ऐसा नहीं करती। और भाई जब कॉलेज से घर आता है तो उसे फटाफट पानी, चाय-नाश्ता मिलता है और मम्मी खुद उसे खाना गरम कर के सर्व करती हैं। पर मुझे अपना खाना अपने आप गर्म करना पड़ता है। मुझे अपना काम करने में कोई परेशानी नहीं है, पर इतना भेदभाव दिल को कचोटता है। और भी बहुत सी बातें है, छोटी-मोटी। वो लड़का है इसलिए शायद उसे ज्यादा फेवर करते हैं।”

“देख लिया न मेघना, अच्छा है न तेरा कोई भाई नहीं है। न तुझ पर कोई रोक-टोक करने वाला और न रौब जमाने वाला और तेरे मॉम-डैड और दादी के प्यार पर भी पूरा तेरा और तेरी बहन का हक। क्यों?” इरम ने धीमी आवाज में मेघना से कहा।

“अरे मैं तो एक भाई सिर्फ इसलिए चाह रही थी कि माँ और दादी में जो ये रोज-रोज का लड़ाई-झगड़ा होता है वो बंद हो जाता। रक्षा बंधन और भाई दूज पर तो मेरे घर में कोल्ड वॉर जैसी सिचुएशन हो जाती है।” मेघना ने कहा।

और फिर तीनों वार्म-अप की तैयारी करने लगीं। एक फीकी से मुस्कुराहट सबके चेहरे पर थी।

मूल चित्र: Pixabay

Journalist, photographer, blogger who loves to chronicle everything from mundane to magnificent. https://shobharanagrover.wordpress.

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