नारीवादी
कभी हौसला नहीं हारने वाली बुलंद, अपने ही जैसी एक मिसाल बन तू

एक स्त्री के अपने सपनों को पूरा करने, अपनी शर्तों पर जीवन जीने और अपनी मुश्किल बीमारी और हालात से जूझकर भी हार ना मानने की कहानी। 

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क्या आज भी हमारे समाज को कबीर सिंह जैसी फिल्मों की ज़रुरत है?

हमारे देश के वर्तमान में महिलाओं की स्थिति कोई खास अच्छी नहीं है, ऐसे में कबीर सिंह जैसी फ़िल्में आग में घी डालने के जैसी हैं।

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काबिलियत के रंग के सामने कोई और रंग कहाँ टिक पाया है कभी!

दुनिया मेरे रंग पर तरह-तरह की बात करती, दादी सिर पीट रही थी, पर मां और पिता जी की तो मैं ही  राजकुमारी थी, सबसे प्यारी राजकुमारी!

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चाहे जितना भी टोको चाहे जितना भी रोको, पर मैं परचम लहराऊंगी

क्यों आज भी हो टोकते, आगे बढ़ने से हो रोकते, धिक्कारते हो घर में तुम, फिर मूर्ति में पूजते, पहुँच गई शिखर पे मैं, फतेह करी अपनी ध्वजा, मैं नभ भी चीर जाऊँगी।

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आधुनिक नारी की एक परिभाषा हूँ मैं!

आइये कहें, 'आधुनिक नारी हूँ मैं! मैं द्रौपदी नहीं कि पति की दुर्बलता पर चीर हरण का शिकार बनूँ, मैं मजबूर माँ नहीं कि कन्या के जन्म पर सिर झुकाऊँ​!'

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उस चांदी की अंगूठी को निकाल फेंकना! निशाँ ये हाथ पर नहीं ज़मीर पर कर जायेगी

कभी लगाव था पर आज सिर्फ एक गहना, साफ़ हो सकती है ये परत लेकिन, फिर आएगी जब जब आवाज़ उठाएगी, क्या मूक मुर्दा बन जिंदा रह पायेगी?

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