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मेरी बहू मुझसे बात नहीं करती है…

काम वो करती, तारीफें सासु माँ ले जाती और तो और जब ऑफ़िस से धर्मेश आते तो हर काम में बहू के साथ साथ हो जाती, मानों उसकी मदद कर रहीं हों।

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बेटा, मैं आज ही अपनी गलती सुधारती हूँ…

"माँ, आप देखो सिंक बर्तन से भरा है, घर का हाल देख लीजिये! ये नहीं कि थोड़ा टाइम निकाल ले। छोटी सी बच्ची है घर में। पता नहीं कैसी माँ है!"

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बहू! खाना बनाना सिर्फ तुम्हारा नहीं मेरे बेटे का भी काम है…

इधर भूमि के ऑफिस में इतना काम रहता था कि वो किचिन में ज्यादा वक्त नहीं दे पाती थी। सास के जाने के बाद भूमि ने खाना होटल से मँगवाया।

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मैं अपनी खुशियों का ख्याल खुद रखूंगी…

अगर आप इसी मीनल से कुछ दिन पहले मिलते तो वो परेशान रहने वाली मीनल थी। लेकिन ये बदलाव आया कैसे? अभी कुछ दिन पहले की बात है...

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बहू, मुझे तेरी वाली साड़ी चाहिए…

"अगली बार मैं आपके लिए बिल्कुल अपनी तरह ही साड़ी लाऊंगी। मम्मी जी, तब तो आपको पसंद आएगी ना?" यह बात शिप्रा ने मुस्कुराते हुए कही।

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माँ, जीतने के चक्कर में आपने अपना घर तोड़ दिया…

"शर्म आनी चाहिए मां। झगड़े आप करा रही थीं। जीतने के चक्कर में आपने अपना घर तोड़ दिया और फिर भी इल्जाम अपनी बहुओं को दे रही हो?"

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