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naarivaadi kavita
हम फिर से जीऐंगे, पर अपने लिए…

हम फिर से उठेंगे, एक समाज की इज्जत की तरह नहीं, एक बराबरी पाने वाले व्यक्ति की तरह, हम, फिर से जीएँगे, एक साधन की तरह नहीं, पर अपने लिए।

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अब आवाज़ करो बुलंद क्यूंकि अकेली नहीं हो तुम…

एक बार तुम बुलंद तो करो अपने हक़-अधिकार और मान-सम्मान के खातिर अपनी आवाज...क्यूंकि अब अकेली नहीं हो तुम...अब अकेली नहीं हो तुम!

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बस एक मैं, अकेली ही काफी हूं…!

जो होगा हुनर तो जीतूंगी हर बाज़ी मैं, क्यूंकि इस भीड़ भरी दुनिया में, अपनी एक अलग पहचान बनाने को, मैं अकेली ही काफी हूं।

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अपने उसूलों पर चलती, मैं हूँ बागी विचारों सी लड़की …

गलत-सही निर्णय जो आप ही लेती हूं, लोगों को कम ही भाती हूं, मैं आज़ाद ख्यालों सी लड़की, अपनी एक सोच लिये, अपने उसूलों पर चलती हूं, मैं आधुनिक ज़माने की लड़की।

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