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घरेलु हिंसा कभी किसी का ‘निजी मामला’ नहीं हो सकता…

हम सब को ये समझना है कि घरेलु हिंसा निजी मामला नहीं है बल्कि पुरुषवादी समाज की एक चाल है जिससे पीड़ित महिला को कोई मदद न मिल पाए।

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और अब बस कहने का समय आ गया था…

शादी की पहली रात, एक लम्बे इंतज़ार के बाद पतिदेव ने कमरे में लड़खड़ाते हुए कदम रखा। नमिता के तो डर के मारे होश उड़ गए।

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मेरी कहानी में जिसे होना चाहिए था, बस वही नहीं था…

माँ ने जो सिखाया था वह वही करने की कोशिश करती लेकिन तब भी हर रोज कोई न कोई कमी निकल ही जाती और पति से भी हर रोज उसकी शिकायत होती।

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और एक आखिरी प्रयास किया मैंने रावण को समझाने का…

"जेठ जी! आप बड़े हैं इस तरह के कर्म आपको शोभा नहीं देते, मेरा मार्ग छोड़िए।" एक आखिरी प्रयास किया मैंने रावण को समझाने का...

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काश उस दिन किसी ने उसे भी पनाह दी होती…

उसने दृढ़ निश्चय कर लिया, कि जो उसके साथ हुआ था, वह किसी के साथ वैसा नहीं होने देगी। और उस दिन...तो आखिर ऐसा हुआ क्या?

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जसविंदर संघेरा की किताब ‘डॉटर्स ऑफ़ शेम’ ने मेरी आँखें खोल दीं…

जसविंदर संघेरा कहती हैं कि बाहर बसे ये लोग ज़्यादातर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के थे, और ये नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे अपनी मर्ज़ी से शादी करें। 

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