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बहू को इतनी ढील देना ठीक नहीं…

पड़ोस की महिलाओं ने बबीता जी को तंज कसने शुरू कर दिए, “अगर बहू को कुछ सिखाया होता तो फटाफट कुछ बन जाता और ढील दो उसे।”

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मेरे पति घर का पैक किया टिफ़िन ऑफिस में बेच कर फ़ास्ट फ़ूड खाते हैं…

मेरे पति अपने सहकर्मियों को मेरे बनाये सैंडविच बेचते हैं, और उन पैसों से वह रेस्ट्रॉंट से अपना लंच खरीदने जाते है। यह सुनके मैं तो दंग रह गई।

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अगर ये सब आलस है, तो हाँ मैं हूँ आलसी…

कितनी बार राकेश से बोला था कि मेरे लिए मेड लगा दो, अब नहीं होता अकेले सारा काम...पर‌ मजाल है जो राकेश उसकी बातों को सुन लें।

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अरे! कहीं बहू ने नौकरी तो नहीं छोड़ दी?

तुम घर की बहू हो, बेटी नहीं। तुम्हें जिम्मेदारियों का कोई एहसास है कि नहीं? रात के खाने का टाइम हो चुका है और तुम्हारा अता पता ही नहीं।

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बहु घर का काम ही कितना होता है जो टाइम नहीं मिला…

आलोक को भी अच्छा खाने का शौक था, वह निशा से रोज़ नई सब्ज़ी बनवा कर खाता, इन सब चक्करों में निशा को समय ही नहीं मिलता...

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जब वो कुछ नहीं करती तब वो कुछ ऐसा करती है…

जब वो कुछ नहीं करती तब वो अपनी माँ को फोन करती है और पूछती है कि वे सारी उमर घर पर खाली बैठी आज तक बोर क्यों नहीं हुई!

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