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Feminist Poem
हाँ, अब मुझे झुकना नहीं है…

हाथ जोड़ने वाली ने अब हाथ उठाना सीख लिया, चूड़ी वाले हाथों ने अब बंदूक़ चलाना सीख लिया, नारी अब कमजोर नहीं है, नारी अब लाचार नहीं है।

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मुझे सिर्फ सजावट का समान नहीं बनाना…

सोच को बदलने का समय आ गया है, कमजोर नहीं सशक्त बनने का समय आ गया है, सिर्फ परिवार नहीं उसका स्वाभिमान भी सब पर भारी है।

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हम औरतें इतना क्यों सह जाती हैं…

आप क्या क्या कर सकते हो इसका जलवा तो एक बार दिखाना ही पड़ता है, आपका खुद पर किया विश्वास दूसरों के लिए भी मिसाल बन जाता है...

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मैं कभी कश्मीर नहीं गई : प्रज्ञा सिन्हा की बेहद खूबसूरत कविताओं की एक एन्थोलॉजी

प्रज्ञा सिन्हा की बेहद खूबसूरत 25 कविताओं की एन्थोलॉजी 'मैं कभी कश्मीर नहीं गई' के बारे में आज हम उन से इस इंटरव्यू में बात कर रहे हैं!

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अब तुम्हें अपनी दुनिया खुद बदलनी है…

कोई कृष्ण नहीं अब आयेंग, बाधा ख़ुद आप ही हरनी है, अपनी जाति की आज तुम्हें मर्यादा ऊंची करनी है, अब अपनी दुनिया बदलनी है।

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मुझे देवी बना कर हर किये की माफ़ी क्यों चाहते हो तुम?

मेरी झल्लाहट पर तुम,अपना रौद्र रूप दिखलाते हो, ऐसा होने पर भी तुम काली मुझे ही बतलाते होऔर फिर एक बार शोषण मेरा कर जाते हो?

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