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नारी और समाज
अब मुझे ‘छेड़े जाने’ का कोई डर नहीं है क्यूंकि मेरी शादी हो गयी है!

हम औरतें भी ना कैसी कैसी धारणा बना लेती हैं कि यदि हमारी शादी हो गई है, हमारी मांग में सिंदूर, माथे पर लगी बिंदी को देखकर कोई भी हमारा बुरा नहीं कर सकता।

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चुप हैं हम क्यूंकि हमें क्या करना किसी और के दुःख या संघर्ष से!

हमारा इंटरेस्ट तो फिल्मी हस्तियों पर ज़्यादा है, उनकी बातें हमें इफ़ेक्ट करती हैं। नेताओं और ढोंगी बाबाओं की बातें प्रभावित करती हैं। मृत समाज है हमारा। 

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हम कौन होते हैं दूसरों को जज करने वाले

बस करो अब! बंद करो अब हमें जज करना, हमारे नेचर से हमारे करैक्टर को जज करना, हमारे पहनावे से हमारे ज़मीर को जज करना बंद करो!

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मैं लिखना नहीं चाहती : हर नर लगे गिद्ध और नारी मांस का टुकड़ा, कुछ और नहीं

शर्मिंदगी और हार का दर्द, बेबसी, घृणा और क्रोध जो भीतर कढ़ कर ज़हर बन गया है, मुझे हर नर में एक गिद्ध नज़र आता है, नारी में मांस का लोथड़ा, बस और कुछ नहीं

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खनक – एक नई जगती उम्मीद!

"कितने नादान हो कि जानते भी नहीं कि लांघ कर तुम्हारी सारी लक्ष्मण रेखाओं को...ध्वस्त कर तुम्हारे अहं की लंका, कब से घुल चुका है वो उल्लास इन हवाओं में..."

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1 फरवरी को सिर्फ 4 अपराधियों को फाँसी…एक को अभी भी छोड़ा जा रहा है, क्यों?

क्या सब उस छठे आरोपी, जो अब नाबालिग नहीं रहा, के अगले अपराध का इन्तज़ार कर रहे हैं? फिर उसके बाद ही उसे सजा देंगे? यही न्याय है क्या? 

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