कोरोना वायरस के प्रकोप में, हम औरतें कैसे, इस मुश्किल का सामना करते हुए भी, एक दूसरे का समर्थन कर सकती हैं?  जानने के लिए चेक करें हमारी स्पेशल फीड!

दृष्टिकोण
क्या आज भी औरतें का काम सिर्फ़ दूसरों की ज़रूरतें पूरा करना है?

पुरूष केवल एक भूमिका निभाते हुए, कर्मठ, मज़बूत साबित होता है और महिलायें न जाने कितनी भूमिकाओं में लिप्त हैं और फिर भी अबला और कमज़ोर कहलाती हैं। 

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भेज ना इतनी दूर मुझको तू, घर लौट के भी आ ना पाऊँ माँ

अभी विदाई का दर्द झेला है और मोड़ में मुड़ते ही खुशी की आगोश में गले तक डूबे देवर, ननंद, सास और ससुराल वालों के सामने मुस्कुराने की विवशता।

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तब वक़्त कुछ और था, वक़्त कुछ और है अब

इस कविता के माध्यम से सरोज जी ने अपने मन की बात हम सब के साथ साझा की है - तब का वक़्त और आज का वक़्त...जाने उनके इस दृष्टिकोण को!

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अगर अपने समाज में बदलाव देखना है तो…प्यार बाँटते चलो!

मेरी यह बात कई लोगों को बहुत बुरी लगेगी, मगर वास्तव में अगर सोचा जाए कि इतने सारे त्यौहारों के बीच यदि एक दिन सिर्फ प्यार के नाम है भी तो इसे रहने दें।

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मेरे हक़ तुम्हारे हक़ से टकराते क्यों हैं?

सच कहूँ तो तुम्हारी पूरी जमात डरती है स्त्री से, जो अपने निर्णय स्वयं लेती है और अपनी ग़लतियों को सहेज कर, उनका श्रृंगार करती हैं।

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समलैंगिता! भारत में काग़ज़ों तक ही सीमित है, सोच में नहीं…

हमको कई प्रकार के मौलिक अधिकार प्राप्त हैं, इनमें से एक है समानता का अधिकार, मुझे इस समानता का अर्थ तो बखूबी पता है, मगर मैं इसको कहाँ ढूँढूँ?

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