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प्रमुख लेख
मेरे जीवन की सबसे प्यारी सहेली हिंदी से जुड़ी महत्‍वपूर्ण सुनहरी यादें!

भाषा तो अपने विचारो को प्रकट करने का एक माध्‍यम है और सभी भाषाएं सीखनी भी चाहिए पर अपनी मातृभाषा का तिरस्‍कार करके बिल्‍कुल नहीं।

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अब वो बदल चुकी थी और उसके रिश्तों के मायने भी…

बहु जो होना था हो गया। ये सब तो भगवान की मर्जी होती है। लगता है कि समधन जी के कर्मों की कमाई अच्छी नहीं थी जो पति और बेटा दोनो चले गए।

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मर्द करे तो ठीक, लेकिन औरत करे तो बदचलन…!

हमारे पाठकों का भी मानना है कि औरत अगर अपनी मर्ज़ी के मुताबिक कोई काम करे तो उसको रोकने के लिए समाज उसे बदचलन कह देता है।

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अरे आपने इतना अच्छा रिश्ता छोड़ दिया…

मोहन जी आपकी बेटी ने इतना अच्छा रिश्ता तोड़ दिया और आप उसे डाँटने कि जगह पर आप प्यार से बात कर रहे हो...

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क्या सच में तुम कदम बाहर बढ़ा पाओगी? क्या तुम जी पाओगी?

'जो आज न बढ़ी तो कमज़ोर पड़ जाऊंगी, फिर माँ, दादी की तरह इस कुएं में तड़पती रह जाऊंगी', उस दिन मेरा अहम् जीता या उसका स्वाभिमान, नहीं जानता!

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बात सिर्फ जेवर की नहीं हमारे हक की भी है…

नए जोड़े को कुछ दिन बाद हनीमून के लिए जाना था तो शीला जी छोटी बहू से बोलीं, "बहु जाने से पहले गहने मुझे दे कर जाना मैं संभाल कर रख दूँगी।"

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