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कम्युनिटी प्रस्तुत
आशारूपी दीपक

धूप-छांव के उतार-चढ़ावों को, पार करते हुए आशारूपी दीपक हो, प्रज्वलित तेजमयी प्रकाश की लेकर आस, 2020 का खुशनुमा स्वागत हो खास!

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अपने पर्यावरण को बचाएँ, धरती को हरा-भरा बनाएँ

आज हम संकल्प-रत हैं, और प्रण है यह - उगायेंगे निर्जन मरूभूमि में मधुबन, एक पौधा पितृ सा पावन,पुण्य तर्पण से अधिक सिंचन!

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मासूमियत ही भगवान

मैं बहुत खुशी खुशी घर आई, आइने में अपने आप को ‌देखा तो एक अजीब सी चमक थी और एक विश्वास था कि मेरा दिन बहुत सुन्दर जाएगा।

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जिंदगी का फलसफ़ा

यदि पता होता कि बड़े होकर ये सब झेलना पड़ेगा तो हम बड़े होते ही क्यों? पर अब जब बड़े हो ही गए हैं तो क्यों न ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा कुछ यूं समझ लें

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फर्ज़

नाम में क्या रखा है बेटा। मुझे इस धरती ने बिना मांगे ही सब दिया।मैं भी कुछ आने वाली पीढ़ी को विरासत मे देना चाहता हूं।ये घने वृक्ष और इनकी छाया।

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बरसो रे मेघा!

जब आज भी वर्षा ना हुई, तो दूधिया का बालमन भर आया, उसकी नज़रें अपने बापू को ही ढूंढ़ रहीं थीं कि उसने देखा की वो घर से दूर खेत की ओर रस्सी लेकर जा रहे हैं।

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