Shubha Pathak

Proud mother of a son. I'm Master's in science, a tutor and a blogger. Love to read and write especially about social issues and sports blogs.

Voice of Shubha Pathak

चाहे जितना भी टोको चाहे जितना भी रोको, पर मैं परचम लहराऊंगी

क्यों आज भी हो टोकते, आगे बढ़ने से हो रोकते, धिक्कारते हो घर में तुम, फिर मूर्ति में पूजते, पहुँच गई शिखर पे मैं, फतेह करी अपनी ध्वजा, मैं नभ भी चीर जाऊँगी।

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बरसो रे मेघा!

जब आज भी वर्षा ना हुई, तो दूधिया का बालमन भर आया, उसकी नज़रें अपने बापू को ही ढूंढ़ रहीं थीं कि उसने देखा की वो घर से दूर खेत की ओर रस्सी लेकर जा रहे हैं।

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क्यों हरदम तलाशे ग़ैर सभी, तू बन अपना ख़ुदा

हरदम तलाशे गैर में रहते हैं सभी, डरते हैं कहीं खुद से मुलाकात ना हो जाए, ये रिश्ते तुम्हारे मेरे, देते हैं सुकून बहुत, पुराने खुद की याद मुझे दिला जाएं।

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हाँ स्त्री हूँ मैं! उस ब्रह्मांड रचियता की सबसे रहस्यमयी कृति हूँ मैं

ना हूँ मैं अगर यूँ खिली-खिली तो हाल क्या हो इन दरख्तों का! खुश हूँ मैं ना जानकर सारे जवाब, पूछना चाहती नहीं मैं कोई भी सवाल। 

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