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Shubha Pathak

Proud mother of a son. I'm Master's in science, a tutor and a blogger. Love to read and write especially about social issues and sports blogs.

Voice of Shubha Pathak

बस एक मैं, अकेली ही काफी हूं…!

जो होगा हुनर तो जीतूंगी हर बाज़ी मैं, क्यूंकि इस भीड़ भरी दुनिया में, अपनी एक अलग पहचान बनाने को, मैं अकेली ही काफी हूं।

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घुटता है दम इस प्राकृतिक की गोद में …..

शहरी जीवन का वातावरण आज कल बहुत प्रदूषित होता जा रहा है।  ऐसे में दम घुटने लगता है और प्राकृतिक की दशा छिन्न भिन्न हो रही है। 

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क्या आप जानते हैं कि एक गृहणी होने के लिए कितना धैर्य चाहिए – शुभा पाठक

'होम-मेकर होने का मेरा सफर' कांटेस्ट की तीन बेहतरीन कहानियों की श्रृंखला में आज हम, आप सब के साथ, शुभा पाठक जी को बधाई देते हुए उनका अभिनंदन करते हैं और जानते हैं उनके इस सफर के बारे में। 

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हर पल को जी भर के…जी ले ज़रा!

हर सवेरा लाता है एक नई उम्मीद, ज़रूरत है तू बस नज़रिया बदल, जो नहीं मिला वो बेशक कम था, कुछ और सुनहरा लिखा है, शायद, भरोसा खुदा पर कभी कम ना कर।

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हां उड़ना है मुझे – पर क्यों मुट्ठी भर आसमान भी दूसरों से ही मांगना पड़े? 

हां उड़ना है इसे, तो क्यों परेशानी है? दे दो बस मुट्ठी भर आसमां, क्या उस पर भी सिर्फ तुम्हारी ही जागीर है? ना समझो कि ये बस एक शरीर है!

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हां अब…. देह विहीन उसकी आत्मा सुकून से लौट सकेगी अपने घर!

कितनी रातें दर्द से भरी, कितने दिन वेदना से घिरे, सब नोच गए वो वहशी सरफिरे। क्या उसकी मुस्कुराहट ही थी उसका पाप? या उसका यूं स्वछंद घूमना ना आया उनको रास?

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चाहे जितना भी टोको चाहे जितना भी रोको, पर मैं परचम लहराऊंगी

क्यों आज भी हो टोकते, आगे बढ़ने से हो रोकते, धिक्कारते हो घर में तुम, फिर मूर्ति में पूजते, पहुँच गई शिखर पे मैं, फतेह करी अपनी ध्वजा, मैं नभ भी चीर जाऊँगी।

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बरसो रे मेघा!

जब आज भी वर्षा ना हुई, तो दूधिया का बालमन भर आया, उसकी नज़रें अपने बापू को ही ढूंढ़ रहीं थीं कि उसने देखा की वो घर से दूर खेत की ओर रस्सी लेकर जा रहे हैं।

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क्यों हरदम तलाशे ग़ैर सभी, तू बन अपना ख़ुदा

हरदम तलाशे गैर में रहते हैं सभी, डरते हैं कहीं खुद से मुलाकात ना हो जाए, ये रिश्ते तुम्हारे मेरे, देते हैं सुकून बहुत, पुराने खुद की याद मुझे दिला जाएं।

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हाँ स्त्री हूँ मैं! उस ब्रह्मांड रचियता की सबसे रहस्यमयी कृति हूँ मैं

ना हूँ मैं अगर यूँ खिली-खिली तो हाल क्या हो इन दरख्तों का! खुश हूँ मैं ना जानकर सारे जवाब, पूछना चाहती नहीं मैं कोई भी सवाल। 

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