saroj maheshwari

Voice of saroj maheshwari

तब वक़्त कुछ और था, वक़्त कुछ और है अब

इस कविता के माध्यम से सरोज जी ने अपने मन की बात हम सब के साथ साझा की है - तब का वक़्त और आज का वक़्त...जाने उनके इस दृष्टिकोण को!

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दर्द हो जीवन में, तड़प हो राह में, तो सवाल स्वत: ही उठते हैं

एक बेटी की आवाज़ है ये - अब ले तेरी कोख से जन्म मैं, कोहराम ऐसा मचा दूंगी मैं भारत में, कानून ऐसा सख़्त कि होंगे दंडित बलात्कारी ऐसे कि कानून भी थर्रा जाएगा!

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नारी तुम क्या हो – कल्पना चावला या दुर्गा, सीता या लक्ष्मीबाई?

बुद्धिमती, कर्मठ प्रयत्नशील नारी शक्ति हो तुम, अंतरिक्ष में उड़ने वाली कल्पना चावला हो तुम - नारी एक, रूप अनेक की परिकल्पना को पूर्ण करती है ये सुंदर कविता।  

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तब के रावण को तो राम ने मार डाला पर आज के रावण को कौन मारेगा?

पर नारी पर कुदृष्टि का अंजाम बताती यह रामायण हमें आज भी, दानवों की अपावन नज़रों से क्यों त्रसित है सबला आज भी, कैकई रूप में जीवित क्यों विमाता है आज भी?

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इस नवरात्री दुर्गा का सिर्फ स्मरण काफी नहीं, ज़रुरत है उसके सशक्तिकरण की

कन्या विहीन धरा को तुम कैसे पुष्पित कर पाओगे?फिर कन्याओं का भोग तुम कैसे लगा पाओगे?जब तक असुरक्षित कन्या और नारी हैंतब तक चंद्रघंटा पूजा अधूरी हमारी है

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अब फूलों सी नाज़ुक नहीं हैं ये बेटियाँ

तीन तलाक का दर्द न सहेंगी अब ये बेटियाँ, दहेज रूपी दैत्य को भी मसल फेंकेंगी अब ये बेटियाँ, अब फूलों सी नाज़ुक नहीं हैं ये बेटियाँ। 

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नर तू जीवनदात्री बिन पूर्ण नहीं

सम्मान करो उसकावह तो जीवनदात्री हैउड़ने दो उन्मुक्त गगन में उसकोजिसकी वह अधिकारी हैनारी बिन नर का अस्तित्व नहींनर! नारी बिन कभी पूर्ण नहीं

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नारी! है शक्ति की अवतारी अब तू

चल उठ अपनी रक्षक बन, ले ले कवच ढाल हाथों में अब तू, ना कृष्ण कोई तुझे बचाने आएगा अबबन काली दिखा दे अब तू

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