Sugyata

निरंतर लेखन करते हुए स्वयं और दुनिया को समझने में प्रयासरत !

Voice of Sugyata

मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम बच्चा अभी भी बड़ा होने से डरता है

उम्र के एक पड़ाव पर पहुंच कर जब हम पीछे पलटकर देखते हैं, तो हमारे अंदर छिपा वही मासूम बच्चा बार बार हमें फिर से बचपन में लौटकर चलने को कहता है।

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जाने कहाँ गए वो दिन – याद आती है वो बसंत

अब मैं सुहाग देने आने वाली किसी पंडिताइन के इंतजार में नहीं सजती, मैं पार्लर जाती हूं, बसंत थीम वाली किटी पार्टी में होने वाले फैशन शो में भाग लेने को।

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‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को बस बातों तक ही सीमित ना रखें

मुझे लगता है कि 'वसुधैव कुटुंबकम्', परस्पर भाइचारे और धार्मिक सद्भाव की बातें शायद हम केवल दिखावे के लिए ही किया करते हैं!

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क्या अब निर्भया को मुक्ति मिलेगी?

22 जनवरी 2020, सुबह 7:00 बजे, चारों दोषियों को फांसी! बस तभी वे आखिरी सांस लेंगे! अगर आज निर्भया हमारे बीच होतीं तो वे क्या ऐसा ही महसूस करतीं? 

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हम चाहें तो इस नए साल में बहुत कुछ बदल सकते हैं, ज़रुरत है वो पहला कदम उठाने की!

तो नए साल से मिली इसी ढांढस की बंधी हुई पोटली खोलिए और निकाल लीजिए पिछले बरस के फटे, पुराने, उधड़े और बेरंग सपने और कीजिए उनकी छंटाई, रंगाई!

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महानायक अमिताभ बच्चन को दादा साहब फाल्के पुरस्कार की अनेकों शुभकामनाएं

महानायक अमिताभ बच्चन को दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला, उन्होंने सभी का शुक्रिया अदा किया और यह भी साफ किया कि वह अभी रिटायर नहीं होने जा रहे हैं। 

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एक और नए साल की दहलीज़ पर जब खड़े हैं हम!

एक और नए साल की दहलीज़ पर खड़े हुए पीछे की ओर मुड़ कर देखें, और अब सोचें कि ऐसा क्या था जो अलग किया और क्या नया करेंगे नए साल में

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सुरेखा सीकरी तीसरा नेशनल फिल्म अवार्ड पा पर खुश हैं और उनके साथ हम भी खुश हैं!

सुरेखा सीकरी तीसरा नेशनल फिल्म अवार्ड पाने पर कहती हैं कि उनकी सेलिब्रेशन ये है कि वे दिल से खुश हैं और उनकी इस ख़ुशी में उनके प्रशंसक भी शामिल हैं!

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वो खुद को अपने ही नज़रिये से आंकती! क्या ये आप हैं?

सबसे खूबसूरत लड़की, मुस्कुराकर नज़रअंदाज़ करती है उम्र की निशानियों को! सबसे निडर लड़की, पंजा लड़ाती है दुनिया के लांछनों से! क्या ये आप हैं?

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‘ये दुनिया वाले पूछेंगे’ ये गाना लोगों की सोच बखूबी ब्यान करता है

'ये दुनिया वाले पूछेंगे' पर ये कम्बख़्त दुनिया वाले भी न, कोई इनसे पूछे भला, ये दूसरों के जीवन में इतनी दिलचस्पी क्यों लेते हैं, कोई और काम नहीं इन्हें?

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रावण की मनकही कब तक सुनते रहेंगे?

दशहरा गए, रावण जलाये तो दिन हो गए लेकिन रोज़-रोज़ के रावणों का क्या किया जाए? क्यों ना एक बार ऐसा दशहरा मनाएं कि कोई रावण वापस ना आ सके? 

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आज से हो ये नारा – ‘बेटा पढ़ाओ, बेटे को संस्कार सिखाओ!’

दूसरे पहलू पर गौर करना होगा कि बेटे को तमाम व्यसनों और बुरी सोहबत से अधिक सुरक्षित रख कर हम कितनी ही बेटियों को सुरक्षित रख सकते हैं!

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क्यों एक ही प्रश्न सामने खड़ा है – ये कैसा युग?

समाज में औरतों की व्यवस्था देख कर आज मेरे मन में एक ही सवाल रह रह कर आता है - कलियुग को ख़त्म करने के लिए क्या हम सबको ख़त्म होना होगा?   

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