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Arsin Fatma

Arshin Fatmia

Voice of Arsin Fatma

तेरी पत्नी मेरी भी तो कुछ लगती है…

बस कर लल्ला! ज्यादा मत बोल। सबका दिल एक जैसा नहीं होता। इसको प्यार की जरूरत है इस तरह करोगे तो वो और बीमार हो जाएगी।

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और आप तो कुछ बोलते ही नहीं हैं…

उसको लगता कि जब से उसकी जब से शादी हुई तब से आजादी खत्म हो गई थी। पति भी कभी कुछ नहीं बोलते लेकिन एक दिन ऐसा कुछ हुआ कि...

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और मेरे घर में एक ही हॉट टॉपिक था…मेरी शादी!

बस मम्मी बस! अब और नहीं। क्या चाहतीं हैं आप? घर का काम करुं? शादी कर लूँ? कब करना है? आज? आपका जब दिल करे, आप करवा दीजिए।

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कौन गलत कौन सही, अब ये कहना मुश्किल था…

उन्होंने तो मना कर दिया मगर क्या अवि गलत था या नैना? दोनों को उसकी खुशी प्यारी थी मगर उन्हें लगता था जब इतना वक्त  गुजर गया है तो...

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और एक दिन मैंने अपनी ये खामोशी तोड़ दी…

सब उससे हमदर्दी रखते, अफ़सोस भी करते कि हाय बेचारी बहुत सीधी है, हाय बेचारी जबसे आई है कभी ऊंची आवाज में बोली नहीं, हाय बेचारी!

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वारिस चाहिए! क्यों आज भी लड़की पैदा होने पर अपनी बहु को सुनाते हैं ये लोग?

तुम लोगों ने मुझे क्या कोई मशीन समझ रखा है कि एक के बाद दूसरी, तीसरी, अब फिर?अकल-वकल है तुम लोगो में? मैं इन्सान हूँ जानवर नहीं...

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मुझे तुम्हारे पैसों की नहीं तुम्हारे साथ की ज़रुरत है…

मुझे पेंशन मिलता है बच्चों, मुझे तुम्हारे पैसों की जरूरत नहीं है। मैं घर में अपने कमरे में अकेली पड़ी रहती हूँ। मुझे तुम्हारे साथ की जरूरत है। 

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मैं भी अपने किए पर शर्मिंदा थी, लेकिन अभी देर नहीं हुई थी…

मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं थी। सर में दर्द था और हल्का बुखार भी था। मैं अपने कमरे में लेटी थी, कोई भी नहीं आया था। सुबह से  मैंने कुछ खाया भी नहीं।

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मुझे साल भर के अंदर पोते का मुँह देखना है…सिर्फ पोते का!

"अम्मा! बेटा, बेटी तो हमारे हाथ में नहीं होता ना। भगवान जो चाहे वो दे दे...", बहू ने सर झुका कर इतना ही कहा था कि अम्मा गुस्से में फुफकार उठीं। 

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और अपनी बेटी के बिना कुछ बोले, माँ सब समझ रहीं थीं…

नीलिमा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान ने माँ को इतमिनान दिला दिया या शायद उन्होंने खुद को मना लिया कि वो संजीव के साथ खुश है। 

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और अब मुझे मम्मी जी की ख़ामोशी समझ में आ गई थी…

रोहित ने जब भी मुझे अपने साथ ले जाने की बात की, कुछ न कुछ हो ही जाता,  कभी मम्मी जी बीमार हो जातीं, तो कभी पापा जी रोक लेते मगर वो 'कुछ दिन बाद' आया ही नहीं।

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ख्वाहिश

अपनी माँ का वो सामान, जो उन्हें हद से ज्यादा अज़ीज़ था, उसको बेचने पर मजबूर कर दिया। सिर्फ दिखावे के लिए!

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मैं से मां तक का सफर : एक हसीन अहसास या कुछ और?

झुंझलाहट उस वक़्त होती,जब सारा काम खत्म करने के बाद खाना खाने बैठो तो पता नहीं बच्चों को कैसे पता चल जाता है। उसी वक़्त नैपी गंदी करके रोना शुरू!

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आखिर क्यों एक बेटी नहीं है हक़दार उसके मायके और ससुराल में सम्मान पाने की?

आखिर क्यों बेटियों को उनके घर में और ससुराल में उनके हक़ का प्यार नसीब नहीं होता ? संजना की भी कुछ ऐसी ही बेबसी की कहानी थी..

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वो एक देशभक्त की पत्नी थी और उसके आगे उसका देश था…

हाँ मैं हूँ! मैं एक बहादुर...देश के लिए जान देने वाले इंसान की पत्नी हूँ...मैं कमज़ोर कैसे हो सकती हूँ? वो एक सच्चे देशभक्त की पत्नी थी...

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और मैं तैयार थी अपने आत्मसम्मान की इस जंग को जीतने के लिए…

उसने कहा था वो उतना ही सहेगी जितना सहने की ताकत रहेगी, जिस दिन वो ताकत खत्म होगी, उस दिन वो पता नहीं क्या करेगी और आज वो दिन आ गया था...

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क्या आपके बेटे को आपकी गलत बात भी माननी चाहिए?

माँ आप हमेशा संजना के पीछे पड़ी रहतीं हैं, अगर उसने आपको जवाब देना शुरू कर दिया तब मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा, क्यों कि सहने की भी एक सीमा होती है।

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‘घर की बात घर में ही रहे’ के चलते अपने रिश्तों की बलि न चढ़ाएं

मुझे लगा वो मेरे पीछे आएंगे इसलिए मैंने मोबाइल कैमरा छुपा कर चला दिया, इतने दिनों से मेरे पास सबूत नहीं था इसलिए मैं बता भी नहीं रही थी।

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खुशनसीब हैं वो जिन्हें दो माओं का प्यार मिलता है…

मुझे कोई समस्या नहीं, मेरे लिए तो अच्छा है मुझे दो-दो मांओं का आशीर्वाद मिलेगा और तुम भी बेफिक्र रहोगी। बच्चे भी खुश रहेगें दादी-नानी का साथ पाकर।

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‘वो जैसी भी है मेरी पत्नी है’ क्या आप भी ऐसा मानते हैं?

"कसम से आप इतनी मासूम हो कि मेरे जैसा इंसान आपके ऊपर होने वाली ज्यादती बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। पता नहीं ये लोग किस मिट्टी के बने हैं।"

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