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Anjali Sharma

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क्या सच में तुम कदम बाहर बढ़ा पाओगी? क्या तुम जी पाओगी?

'जो आज न बढ़ी तो कमज़ोर पड़ जाऊंगी, फिर माँ, दादी की तरह इस कुएं में तड़पती रह जाऊंगी', उस दिन मेरा अहम् जीता या उसका स्वाभिमान, नहीं जानता!

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आज मैं गर्व से कहता हूँ, मेरी बेटियां ही मेरी कमाई हैं!

घर में विवाह या उसके विषय में किसी प्रकार का उल्लेख भी नहीं किया जाता। हमेशा ऊँची उड़ान भरने और जीवन में कुछ बनने का ख़्वाब देखती दोनों बेटियां।

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गुलाबी-नीले रंग से लेकर ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ का सफर…

,जब कोई लड़का हाथ उठाता है या कहीं हथियार उठाता है, तब उस बच्चे के सूखे आंसू बह जाने को मचलते हैं जब गुलाबी नीले रंगों में, बचपन बांटा जाता है!

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जब औरतों के सर उठते हैं, तो न जाने क्यों लोग घबराते हैं?

कहते रहे जो मुझे किसी की ज़रूरत नहीं, बस दो चार दिन में मिजाज़ बदले से नज़र आने लगते हैं? जब घर की औरतों के सर उठते हैं, तो न जाने क्यों लोग घबराने लगते हैं...

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क्यों राजकुमारी को नहीं चाहिए अपने सपनों का राज कुंवर…

क्यों रहती हूँ मैं बंद सजीले महल भवन में? न रोक सकेगा मुझको अब कोई रूढ़ि, धर्म, समाज, तोड़ दिए सब बंधन पहन साहस का चोला आज...

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बचपन सुहाना और अब तकनिकी ज़माना!

बचपन के दिन अधिक सुहाने और मनभावने होते हैं,  बचपन को जितनी खूबसूरती से जिया जा सकता है जीना चाहिए क्यूंकि बचपन दोबारा नहीं आता।

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कब तक अग्निपरीक्षा सिर्फ मेरी होगी – मुझे आज जवाब चाहिए!

बैठे-बैठे सोच यूँ ही सोच आती है आज, सड़कों पर दुर्व्यवहार, घर में भेदभाव व्यभिचार, बस बातों के संस्कृति संस्कार, बुरा लगे जो करे प्रतिकार! क्यों? 

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कण कण में बसी क्षण क्षण में रची नारी तेरी ये कहानी!

बचपन बीता सकुचा सिमटा, यौवन आया नई आस लिए, आयी है पार झरोखों के, मन में स्वतंत्र उल्लास लिए नारी की विषम कहानी है।

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मैं भी मुसाफ़िर – सफ़र और मेरा रिश्ता कुछ ऐसा है जैसे रुई के फ़ाहे और बयार का

दूर तक फैले खेत, जंगल, हरियाली के मनोहारी दृश्य, जिन्हें कलाकार अपने चित्रों में उतारते हैं, आँखों के सामने दौड़ते तो मन रोमांच से भर जाता।

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