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“लड़कियां फौज में?” लोगों ने उड़ाई थी खिल्ली, आज हैं पद्म श्री डॉ पद्मा बंदोपाध्याय

जब महिलाएं इस क्षेत्र के बारे में सोचती तक नहीं थीं, तब पद्मा एक मिसाल बनीं। हाल ही में डॉ पद्मा बंदोपाध्याय को पद्म श्री से नवाज़ा गया।   

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जब महिलाएं इस क्षेत्र के बारे में सोचती तक नहीं थीं, तब पद्मा देश के लिए एक मिसाल बनीं। हाल ही में डॉ पद्मा बंदोपाध्याय को पद्म श्री से नवाज़ा गया।   

2021 में माननीय राष्ट्रपति द्वारा 102 लोगों को पद्म श्री से सम्मानित किया गया। पद्म श्री भारत के एक सम्नानीय पुरस्कारों में से एक है। जितने भी लोग इस पुरस्कार से सम्मानित हुए सबों की अपनी एक कहानी है जो हमें सीख देती है और देश को गौरवान्वित करती है।

खैर, इस पुरस्कार से सम्मानित होने वाली महिलाओं की लिस्ट तो लंबी है लेकिन हम उन्हीं में से एक देश के बेटी की बात करेंगे जिनकी वीरता ने देश के अन्य बेटियों की हौसला अफजाई की और लोगों के अंदर सदियों से बैठी यह बात कि ‘लड़कियां एयर फोर्स में कैसे जायेंगी’, इसे हटा दिया तथा उनके लिए आगे के राह खोल दी।

जी हां, आज के इस लेखन में हम चर्चा कर रहे हैं पद्मा बंदोपाध्याय की जो देश की पहली महिला एयर मार्शल बनीं। देश की सेवा में बेटियां हमेशा से हीं तत्पर रही हैं, इसमें तो कोई शक नहीं, उन्हीं में से एक हैं डॉ पद्मा बंदोपाध्याय।

पद्मा ने अपनी पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी के किरोड़ीमल कॉलेज से की थी। उन्होंने 1968 में एयरफोर्स ज्वाइन किया और उन्हें 1971 के युद्ध के समय विशिष्ट सेवा के लिए विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित भी किया गया। इसके अलावा पद्मा अति विशिष्ट सेवा मेडल और परम विशिष्ट सेवा मेडल से भी सम्मानित हो चुकी हैं।

पहली महिला एयर मार्शल होने के साथ-साथ डॉ पद्मा एयर कमांडर के पद पर पदोनत होने के लिए भारतीय वायु सेना की पहली महिला अधिकारी और  डिफेंस सर्विस स्टाफ का कोर्स पूरा करने वाली पहली महिला अधिकारी भी हैं। इसके अलावा उत्तरी ध्रुव में वैज्ञानिक अनुसंधान कर वह पहली भारतीय महिला अधिकारी बन गई थीं। साथ हीं साथ वह एविएशन में एयरोस्पेस मेडिकल सोसायटी ऑफ इंडिया की पहली महिला फेलो भी हैं।

जब महिलाएं इस क्षेत्र के बारे में कभी सोचती तक नहीं थी तब पद्मा उस समय में देश के लिए एक मिसाल बनीं।

एक इंटरव्यू के दौरान पद्मा बताती हैं कि “ए मेरे वतन के लोगों” इसी गाने से उन्हें प्रेरणा मिली और उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। उन्होंने बताया कि सभी की तरह वह भी सोचती थीं कि बड़े होकर वे आईएएस बनेंगी।

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पद्मा दिल्ली के गोल मार्केट में रहती थीं। उन्होंने बताया की वें जिन बच्चों के साथ खेलती थी वे सभी बच्चे दो तीन महीने के बाद गायब हो गए थे। वजह थी 1962 का युद्ध। तकरीबन 50 घरों में से 20 युवा सदस्य युद्ध के दौरान शाहिद हो गए थे। तब उन्हें लगा कि उन्हें देश के लिए कुछ करना चाहिए और उसी वक्त ठाना की वे फौज में जायेंगी।

उस समय तक उन्हें फौजी जैसे क्षेत्र की कोई भी जानकारी नहीं थी। केवल एक जज़्बा था कि देश के लिए खुद को समर्पित कर देना है। कई लोगों ने उनकी खिल्ली उड़ाई और कहा कि लड़की होकर फ़ौज में कैसे जायेगी?

उस वक्त 1962 में चाइनीज वॉर का ईयर था और उसी समय आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज स्थापित हुए थे। ऑल इंडिया लेवल पर इसमें एडमिशन के लिए कंपटीशन थे जो की काफी मुश्किल था। जिनमें लगभग करीब 100 लड़के और 15 लड़कियों का दाखिला हुआ और यहीं से पद्मा के फौजी जीवन का सफर भी शुरू हो चुका था।

पद्मा जहां वे रहती थीं वहां केवल आर्ट और दूसरे विषय के स्कूल थे। उनकी इच्छा थी कि वे साइंस में दाखिला लें। मां भी बीमार रहती थी तो मां ने कहा बस से इतनी दूर स्कूल जाना होगा। यहां आस पास के हीं किसी स्कूल में दाखिला ले लो।

पद्मा ने भी मां के कहे अनुसार वहीं पढ़ाई की। पास होने के बाद पद्मा को कहीं और मेडिकल साइंस के लिए एडमिशन नहीं मिल पा रहा था। डॉ पद्मा कहती हैं कि दाखिला करवाने के लिए उनके पिता ने काफी मशक्कत करी, कई कॉलेज में गए हाथ जोड़े और आग्रह किया।

अंततः पद्मा को दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज ने प्रीमेडिकल के लिए मौका दे दिया। पद्मा पहली ऐसी विद्यार्थी थी जो आर्ट्स से साइंस में आईं और एक डॉक्टर भी बनीं। इसका पूरा श्रेय डॉ पद्मा अपने पिता को और किरोड़ीमल कॉलेज को देती हैं।

इसके बाद पद्मा को मौका मिला यह तय करने के लिए की वो नेवी में जाना चाहती या एयरफोर्स में। उन्होंने एयरफोर्स को चुना। यहां तक आने के बाद डॉ पद्मा को और हिम्मत मिली और उनकी इच्छा एक पायलट बनने की हुई। उन्होंने आगे बताते हुए कहा की उन दिनों में एक डॉक्टर पायलट हुआ करते थे। जो भी परमानेंट कमीशन डॉक्टर हैं उनके पास यह मौका होता था कि वे पायलट बन सकें। लेकिन पद्मा इसके लिए योग्य नहीं हो सकीं।

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और एविएशन मेडिसिन में स्पेशियलिटी लिया ताकि वें पायलटों के साथ रहकर उनकी सेवा कर सकें उनकी तकलीफों को समझ सकें और कई एयर क्राफ्ट में उन्हें उड़ने के मौके भी मिलें।

1971 के वॉर में उस समय पंजाब बॉर्डर पर तैनात थीं और उन्होंने पहली बार कोई युद्ध देखा था। उनके साथ उनका 6/7 महीने का बच्चा भी था। डॉ पद्मा अकेली महिला थीं जो अपने पुरुष सह साथियों के साथ बंकर में रह रही थीं। युद्ध के दौरान कई लोग घायल हुए हड्डियां टूटी चोट आई। वे कहती हैं की आर्थोपेडिक्स में वे स्पेशलिस्ट तो नहीं थी लेकिन ट्रेनिंग के दौरान जो भी उन्होंने सीखा वह काफी उपयोगी रहा लोगों की जान बचाने के लिए।

उस वक्त वें कर्नल बन गईं और उनका काम था बॉर्डर पर हर आर्मी स्टेशन में उनकी जरूरत के हिसाब से चीजे पहुंचना, मैन पावर प्रोवाइड करवाना और मेडिकल से संबंधित चीजों को उपलब्ध करवाना।

उस समय में पद्मा की तरह हीं कई लड़कियां होंगी जिन्होंने एयर फोर्स या सेना में जाने का सोचा होगा। लेकिन उनके सपने शायद समाज के सामने दब गए होंगे। पद्मा पर भी लोग हंसे थे जब उन्होंने देश सेवा और एयर फोर्स में भर्ती होने की बात की थी। लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य को बनाए रखा और हौसला बुलंद रखा।

अपने बुलंद हौसले के कारण हीं पद्मा ने आसमान की ऊंचाइयों को छुआ और आज वें पद्म श्री से सम्मानित हो रहीं हैं। पद्मा ने खुद तो मुकाम हासिल किया हीं साथ हीं साथ वे कई लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गई।

आज लड़कियां हर श्रेत्र में बिना किसी निडरता के बल्कि पूरे साहस के साथ अपना झंडा फहरा रहीं। पद्म श्री डॉ पद्मा बंदोपाध्याय ने हमें सिखाया कि कोई भी कार्य आपके जिज्ञासा के सामने असंभव नहीं। यदि जज़्बा है तो आप हर परिस्थिति से कर गुजरेंगी।

इमेज सोर्स: OneIndia News, YouTube

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