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पापा, मैं अपने घरवालों के लिए कमाना चाहती हूँ…

संध्या तुम्हारे कहने से पढ़ाई करा दी और अब क्या बेटी के पैसों का खाएंगे। बस यही दिन देखने रह गए थे। कहीं नहीं करनी नौकरी।

संध्या तुम्हारे कहने से पढ़ाई करा दी और अब क्या बेटी के पैसों का खाएंगे। बस यही दिन देखने रह गए थे। कहीं नहीं करनी नौकरी।

“मेरा दम घुटता है इस घर में…पता नहीं मां ने इतने बरस इस जेल में कैसे गुजारे।” नमिता अपनी सहेली रमा से रोते हुए बोली जा रही थी।

नमिता के घर में उसके पिता मनीष जी का काफी दबदबा था। वो नमिता या किसी भी घर की महिला का ज्यादा घर से बाहर निकलना या किसी के घर जाना आना पसंद नहीं था। बस उसकी एक सहेली रमा ही थी जिसे पता नहीं क्यूं मनीष जी ने मना नहीं किया आने से।

नमिता रोए जा रही थी और रमा बस दिलासा ही दे पा रही थी।

“बस रमा बहुत हुआ मेरा ग्रेजुएशन पूरा होने वाला है। कहीं अच्छी नौकरी लग जाए तो देखना मैं नहीं आने वाली इस घर।”

“ऐसा नहीं बोलते नमिता अपना घर तो अपना होता है। अपने माता-पिता अगर किसी बात के लिए मना करते हैं तो उसके पीछे भी तो कोई वजह होगी।”

“अरे! क्या वजह होगी वही तो जानना है। कभी बताया है उन्होंने बस हर बात पर ताना और सख्ती। कौन अपने बच्चों से ऐसा बर्ताव करता है। कभी-कभी तो लगता है उनको लड़का चाहिए था और लड़की होने से वो शर्मिंदा हैं।”

इधर नमिता के घर आते ही… “कहां थी इतनी देर तक। ये भी कोई समय है घर आने का। बस पूरे दिन आवारागर्दी। संध्या इस पर नज़र रखो। तुम्हारा लाड़-प्यार इसे बिगाड़ रहा।” मनीष जी अपनी पत्नी से नाराज़ होते बोले।

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“आवारागर्दी नहीं रमा के पास थी और अभी तो ८ ही बज रहे। कौन सी इतनी देर हो गई जो आपको बुरा लग रहा।”

“बस चुप हो जा नमिता पापा से कोई ऐसे बात करता है।”

नमिता गुस्से से अपने कमरे में चली जाती है। पूरी रात इसी उधेड़बुन में चलती है कि बस जल्दी नौकरी लग जाए।

ग्रेजुएशन का अंतिम वर्ष चल रहा था और साथ ही प्लेसमेंट से कई छात्र-छात्राओं की नौकरी भी लग रही थी। इस तरह नमिता की भी दिल्ली में अच्छे पद पर नौकरी लग गई।

पूरे रास्ते खुशियों से भरी जल्दी घर को चली आ रही थी। बस कैसे भी घर पर पापा को दिखा देगी मैं किसी से कम नहीं हूं।

घर पर जैसे ही नमिता ने बताया, मनीष जी गुस्से से आग-बबूला हो गए। “संध्या तुम्हारे कहने से पढ़ाई करा दी और अब क्या बेटी के पैसों का खाएंगे। बस यही दिन देखने रह गए थे।”

“क्यूं बेटी नौकरी नहीं कर सकती। मैंने पढ़ाई घर पर बैठने और चूल्हा-चौका संभालने तक को ही नहीं की थी।”

“बस नमिता! कहीं नहीं करनी नौकरी। मैंने बोल दिया तो बोल दिया।”

पापा की बातों का नमिता पर कोई असर नहीं हुआ। अपनी परीक्षा पूरी कर वो दिल्ली जाने की तैयारियों में चोरी छुपे लग गई। एक दिन बिना बताए एक चिट्ठी लिखकर ‌वो अपने सपनों को छूने निकल गई।

घर पर नमिता के ना होने से मनीष और संध्या दुखी हो गए। इधर मनीष जी का बिजनेस भी धीरे-धीरे कम हो रहा था। एक समय ऐसा आया जब उन्हें दुकान बेचने की नौबत आने वाली थी।

इधर रमा से घर के हालचाल नमिता को मिलते थे। जब नमिता को ये बात पता चली तो वो फ़ौरन घर आ गई। उसको घर आया इतने समय बाद देख मनीष और संध्या बस रोए जा रहे थे।

नमिता ने तुरंत अपने पापा के हाथों में पैसे देकर कहा, “आपको जहां भी जिसको पैसे देकर अपनी दुकान पुनः चालू करनी है करें। पर अपनी यह दुकान मैं बिकने नहीं दूंगी।”

बेटी की ये बातें सुनकर मनीष जी ने उससे माफ़ी मांगी।

“मैं आज तक सिर्फ तुझको कोसता था। तुझ पर तमाम अंकुश लगाए पर तूने अपने पिता की पगड़ी संभाल ली। सच मैं ग़लत था और ये तूने सिखाया। बेटियां बेटों से किसी मामले में कम नहीं होती।”

आज आखिरकार नमिता को इतने समय बाद उसके पिता ने गर्व से गले लगाया था।

इमेज सोर्स : Still from Tanishq Jewellery ad, YouTube (for representational purpose only)

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