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भारत की पहली महिला वकील कॉर्नेलिया सोराबजी: क्या आप उनके बारे में ये जानते हैं?

भारत की पहली महिला वकील कॉर्नेलिया सोराबजी मुम्बई विश्वविद्यालय से पहली महिला स्नातक और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कानून पढ़ने वाली पहली भारतीय महिला थीं। 

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भारत की पहली महिला वकील कॉर्नेलिया सोराबजी मुम्बई विश्वविद्यालय से पहली महिला स्नातक और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कानून पढ़ने वाली पहली भारतीय महिला थीं। 

भारत में महिलाओं की सामाजिक स्थिति समाज में बेहतर हो, उन्हें घर के निजी दायरे में और घर के बाहर सम्मानपूर्वक जीवन की अधिकार हो। इस दिशा में औपनिवेशिक दौर में पुरुष समाज सुधारकों ने खासकर उस दौर में महिलाओं को लेकर पूर्वाग्रही मानसिकता पर जोरदार प्रहार किए। उनके ही मानवतावादी प्रयासों से एक-एक करके कई कानून महिलाओं के हक में बने। कमोबेश हर समाज सुधारक ने महिलाओं के सामाजिक स्थिति में सुधार के लिए महिलाओं के शिक्षा को एक जरूरी हथियार बताया।

भारत की पहली महिला वकील कॉर्नेलिया सोराबजी का जीवन( Pahli Mahila Vakeel)

औपनिवेशिक सत्ता के जिन गलियारों में महिलाओं के लिए तमाम कानून बन रहे थे, उसमें एक प्रमुख जगह न्यायपालिका का भी। परंतु, न्यायपालिका के दलहीज पर महिलाओं के हक में दलील देने वाली पहली महिला अधिवक्ता आसान शब्दों का सहारा लूँ तो वकील बनने का गौरव जिस महिला को मिला वह थी कॉर्नेलिया सोराबजी। उन्होंने अपने दौर में एक नई कई उन छवियों को तोड़ा जो एक महिला के लिए आसान तो कतई नहीं रहा होगा।

वह पहली भारतीय महिला नागरिक थीं जिन्होंने विदेशों में पढ़ाई की, बॉम्बे यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन और आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की। वह एक मात्र महिला वकील थीं जिन्होंने ब्रिटेन और भारत दोनों जगहों पर अपने वकालत की प्रैक्टिस कर रही थी।

बेशक इन बुलंदियों तक पहुंचने में उनके परिवार की आर्थिक स्थिति जिम्मेदार रही होगी, पर इन उपलब्धियों तक पहुंचने तक जिस जस्बे की आवश्यकता होती है वह कॉर्नेलिया का अपना था।

15 नवबंर 1866 को नासिक के एक धनी पारसी परिवार में कॉर्नेलिया का जन्म हुआ था। पिता मिशनरी व्यक्ति थे और मां समाज सेविका। मां-पिताजी के जीवन और उनके जीवन कर्तव्यों का प्रभाव कॉर्नेलिया के ऊपर बचपन में ही पड़ चुका था। कॉर्नेलिया अपने पांच भाई-बहनों के साथ बेल्जियम में बचपन बिताकर और प्रारंभिक स्कूली पढ़ाई वही के स्कूल से कर के बॉम्बे यूनवर्सिटी पहुंची थीं। जाहिर है वह एक आजाद ख्याल महौल से भारत के औपनिवेशिक गुलामी को देखने-समझने लगी थीं जिसके बारे में उनकी समझदारी साहित्य पढ़ने के रुझान के कारण बना था।

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कॉर्नेलिया के लिए उनके जीवन के चुनौति वाले दिन वह थे जब वह तमाम परीक्षाओं में अव्वल आने के बाद भी आक्सफोर्ड जाने के लिए उस स्कॉलरशिप से महरूम रह गईं। बॉम्बे और पूना में रहने वाली इंग्लिश महिलाएं भारत में महिलाओं के सामाजिक स्थिति में सुधार के लिए एक महिला वकील की आवश्यता महसूस कर रही थीं। उन लोगों ने मिलकर कॉर्नेलिया के लिए पैसे जोड़े और 1889 में उन्हें सोमलविल कॉलेज में उन्हें दाखिला मिल गया।

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जब कॉर्नेलिया सोराबजी पहली महिला बनी तब महिलाओं को वकालत की प्रैक्टिस करने की इजाजत ही नहीं थी

1892 में जब कॉर्नेलिया ने वकालत की पढ़ाई पूरी करने वाली पहली महिला बनी तब महिलाओं को वकालत की प्रैक्टिस करने की इजाजत ही नहीं थी। वह भारत आईं और उन्होंने लोगों को कानूनी और अदालती सलाह देना शूरू किया साथ ही साथ भारत भर में 600 से अधिक महिलाओं/लड़कियों को असिस्ट किया। वह बंगाल, बिहार, उड़ीसा और असम की अदालतों में सहायक महिला वकील के तौर पर काम करती रहीं।

महिलाओं को भी वकालत की प्रैक्टिस करने का मौका मिले इसके लिए उन्होंने अपील डाल रखी थी, जिसका फैसला उनके पक्ष में 1920 में आया। कॉर्नेलिया ने कलकत्ता हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करना शुरू किया। हालांकि उनका यह सफर 9 सालों का ही रहा परंतु, उन्होंने जिस चीज के लिए संघर्ष किया उसका असर दिखने लगा था। उनके ही समय कई भारतीय महिलाओं ने कानून की पढ़ाई और वकालत को अपना पेशा बनाया।

यह कहना कहीं से गलत नहीं होगा कि भारत में न्यायपालिका के गलियारे में काला गाउन पहने जो भी महिला दिख रही हैं उसकी बुनियाद कॉर्नेलिया सोराबजी रखी।

2012 में लिंकन इन, लंदन में उनकी प्रतिमा इस बात की याद दिलाती है कि वह वकालत जैसे प्रतिष्ठित और जटिल पेशे में महिलाओं के लिए दरवाजे खोलने वाली महिला रही हैं।

वकालत से सेवानिवृत्त होने के बाद वह लंदन में बस गई और सर्दियों के दौरान भारत आया करती थीं। अपने जीवन के तमाम संघर्षों और उतार-चढ़ाव को उन्होंने अपनी बॉयोग्राफी “बिटवीन द ट्वाईलाइट्स” में बयां किया है, जो यह बताता है कि जिस दौर में उन्होंने महिलाओं के लिए संघर्ष किया खासकर महिलाओं के कानूनी अधिकार के लिए भारत जैसे देश में वह आसान नहीं था। इसके लिए हर मोड़ पर एक चुनौति थी जिससे लड़ने के लिए कॉर्नेलिया सोराबजी के पास आत्मविश्वास के अलावा कुछ भी नहीं था।

आज में न्यायपालिका के गलियारों में महिला वकीलों या न्यायधीशोम के खिलाफ कई तरह के चुनौतियां मौजूद है जिसका सीधा रिश्ता पुरुषवादी सामंती सोच और पूर्वाग्रह से है। जिसके विरुद्ध पुरजोर मुखाल्फत कॉर्नेलिया सोराबजी के बाद के पीढ़ी की महिला वकील संगठित होकर कर रही हैं।

इमेज सोर्स: Wikipedia

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