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एक भूली हुई माँ अपनी बात खुद कहने लगी तो…

ये स्वयं अपनी कविता में अपने संघर्ष के, व्यथित मन के गीत, कूंची से जीवन की रंग-बेरंग होती तस्वीर, लिखकर, गाकर, उकेरकर, लोगों को स्वयं ही दिखलाएँ?

ये स्वयं अपनी कविता में अपने संघर्ष के, व्यथित मन के गीत, कूंची से जीवन की रंग-बेरंग होती तस्वीर, लिखकर, गाकर, उकेरकर, लोगों को स्वयं ही दिखलाएँ?

कुछ किताबें उन मांओं पर लिखी जानी चाहिएँ,
जिनके दिन चुल्हे के धुएं की धुंध बनकर रह गए।
एक पन्ना भी मन का न नसीब आया जिनके।

एक-आधा गीत उनके द्वंद्व की भी गढ़ा जाना चाहिए,
महिमामय नहीं, खांस-खांस खाट पर निढाल हुई जो पट गईं।
दम निकलते वक्त अकेले पड़ी कोठरी में दो टूक शब्द तक नहीं सुने।

टूटे-फूटे ढाई अक्षर दिवार पर ही सही, उनके नाम के भी गुंथे जाने चाहिएँ,
जो दहलीज़ के पीछे घूंघट में घर चकचकाती रह गईं।
आंखों की दमक झुर्रियों संग ढल गया जिनका।

किन्तु जो ऐसा हो,
इनको कविता और कैनवस पर उतारने से अच्छा
क्यों न इन्हें सशक्त बनने दिया जाए?

कलम, कंठ और कूंची से
ये स्वयं अपनी
कविता में अपने संघर्ष के पद्य
कंठ से अपनी व्यथित मन के गीत
कूंची से जीवन की रंग-बेरंग होती तस्वीर
लिखकर, गाकर, उकेरकर, लोगों को स्वयं ही दिखलाएँ?

इमेज सोर्स: Still from short film Sorry Maa/Suryansh Raghuvanshi, YouTube

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Shilpee Prasad

A researcher, an advocate of equal rights, homemaker, a mother, blogger and an avid reader. I write to acknowledge my feelings. I am enjoying these roles. read more...

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