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अब ये मेरी नकचढ़ी बहू नहीं लाडली बहू है…

दूसरे दिन बारह बजने को आए पर बहू का कोई अता-पता नहीं! आज तो रसोई की रस्म थी! सुप्रिया जी लोगों के बीच छिपते-छुपाते बहू के कमरे में गईं।

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दूसरे दिन बारह बजने को आए पर बहू का कोई अता-पता नहीं! आज तो रसोई की रस्म निभानी थी और फिर से सुप्रिया जी लोगों की बातों के बीच छिपते-छुपाते बहू के कमरे में गईं।

भव्य बारात के साथ सपन अपनी होने वाली दुल्हनिया को लेने गाजे-बाजे के साथ आया। भिन्न-भिन्न प्रकार के फूलों से सजा घर और दरवाज़े पर लगे तोरण अलग ही सबका ध्यान आकर्षित कर रहे थे।

तारिनी अपने माता-पिता की इकलौती बेटी है। इकलौती है तो प्यार-दुलार लुटाया भी दिल खोलकर है मिश्रा दंपति ने। रमेश और लीला ने अपनी बेटी की शादी में पैसों की किसी प्रकार कमी नहीं रहने दी। जो आज देखते ही बन रही थी। हां लड़के वालों की तरफ़ से कोई मांग नहीं थी।

इधर पांडे परिवार में राजेश और सुप्रिया अपनी बहू को लेने चल पड़े। सभी विधि विधानों के साथ तारिनी को ब्याह कर अपने घर ले आया सपन।

गृहप्रवेश के बाद तारिनी को सभी बड़ों के आशीर्वाद लेने को बोला गया। तो तपाक से शब्द बाहर आए…”अरे! आज के समय ऐसे रीति-रिवाज कौन करता है? मुझसे ये सब ना होगा सासू मां!”

बहू की ऐसी बात सुनकर सुप्रिया जी अंदर तक हिल गईं। इतने साल हो गए किसी ने सुप्रिया जी की ऊंची आवाज़ भी ना सुनी थी और ये तो नई बहू थी। खैर! बातों को नज़रंदाज़ कर बहू को आराम करने दिया।

दूसरे दिन बारह बजने को आए पर बहू का कोई अता-पता नहीं। आज तो रसोई की रस्म निभानी थी और फिर से सुप्रिया जी लोगों की बातों के बीच छिपते-छुपाते बहू के कमरे में गईं।

“बेटा! तुम अभी तक सो रही हो? नीचे सब इंतज़ार कर रहे हैं! आज रसोई की रस्म है। चलो जल्दी फ्रेश होकर आ जाओ और खीर बना दो।”

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“खीर! कौन खाता है इतना हैवी ब्रेकफास्ट… मम्मी जी! आप ऐसा करो मुझे बताओ कोई हल्का नाश्ता मैं आर्डर कर देती हूं। आपके लिए भी आराम हो जाएगा…”

बहू की इन बातों को सुनकर सुप्रिया जी का दिमाग हिल गया। ये किसे घर ले आए हम? कल बड़ों का अपमान किया और आज रसोई से दूरी? अब ज्यादा कुछ बोला तो ये कहीं घर में हंगामा ना मचा दे।

सपन को सारी बात बताकर सुप्रिया छुपते-छुपाते खुद रसोई में खीर बना लाईं। बस तारिनी के हाथ लगवा दिए ताकि कोई चार बातें ना बोल जाए। पर दबी ज़ुबान से सब नई बहू के व्यवहार की निन्दा कर रहे थे।

तारिनी घर के ना कामों में दिलचस्पी ले रही थी और ना सपन के लिए ही कोई रुचि दिखा रही थी। उसे तो बस अपने सजने-संवरने और नखरों से ही फुर्सत नहीं थी।

सुप्रिया जी और उनके परिवार को समझ नहीं आ रहा था कि कैसे इस समस्या का हल निकाला जाए। सो उन्होंने रमेश और लीला जी से बात करी। उन्होंने समस्या को सुना और वो भी अपनी बेरी के इस व्यवहार से परेशान हो गए।

“हम पूरी कोशिश करेंगे कि तारिनी अपनी जिम्मेदारियों को समझे। हम उससे बात करते हैं और उसकी गलती के लिए माफ़ी भी मांगते हैं।”

पग फेरे की रस्म के लिए रमेश जी अपनी बेटी को घर ले आए। दूसरे दिन आदतन तारिनी ने चाय की डिमांड की जो उसकी मां ने इग्नोर कर दी। नाश्ता भी तारिनी की मां ने अपना और रमेश जी का बना रसोई समेट दी।

तारिनी को बहुत गुस्सा आया और उसने नाश्ता भी नहीं किया। खाने के समय भी यही हाल रहा…तारिनी ने टेबल पर देखा तो कुछ नहीं था। कुछ दिन घर पर यही चला और तारिनी बाहर से खाना आर्डर करती रही। पर अब उसे बाहर का खाना अच्छा नहीं लगता था।

आखिरकार उसने अपनी मां से बात करी।

लीला जी ने तारिनी को बड़े प्यार से समझाया, “बेटा! घर के कामों से कोई नौकर नहीं बन जाता और इन रीति-रिवाजों के पालन से गंवारपन नहीं दिखता। ये तो छोटों का बड़ों के लिए सम्मान और प्यार होता है। गलत रीती-रिवाज़ तो तेरे ससुराल वाले भी नहीं मानते। इतना तो हम उन्हें जानते हैं।

गलती सिर्फ तुम्हारी ही नहीं हमारी भी उतनी ही है। हम तुम्हारे लाड-प्यार में इतने खो गए की आगे का सोचा ही नहीं पाए। सास भी मां समान होती है और घर की सेवा और बड़ों का ध्यान रखने से कोई छोटा नहीं हो जाता। अपितु गाहे-बगाहे ये सभी चीजें अपने ही काम आतीं हैं।

आज तुम बाहर का खाना खाकर बोर हो गई। यदि तुम अच्छा खाना खुद बना लो तो ये हेल्दी होने के साथ स्वाद भी देगा। और घर की जिम्मेदारियां निभाना तो सभी को आना चाहिए। अगर रिश्तों को प्यार और सम्मान के साथ निभाया जाए तो वो और निखरते हैं। तो इन प्यारे पलों को हाथ से जाने ना दो।”

अब तारिनी जब ससुराल आई तो बिल्कुल बदली हुई थी। बड़ों का सम्मान और प्यार सभी के लिए इज्ज़त। साथ ही रसोई में सुप्रिया जी की मदद भी कर रही थी। अब तो घर में हर तरफ खुशियां ही खुशियां थी। क्यूंकि उनकी नकचड़ी बहू उनकी लाडली बहू जो बन गयी थी।

सुप्रिया जी ने लीला जी को तुरंत फोन कर धन्यवाद दिया।

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इमेज सोर्स : Photo by rajat sarki on Unsplash 

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