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मैं उस घर का दामाद हूं और तुम इस घर की बहू…

अभी दो दिन पहले जब खुद के भाभी-भाभी आये थे तब तो बहुत खुश थी। हर चीज का इंतजाम खुद देख रही थी। तब तुम्हें कोई परेशानी नहीं हुई।

अभी दो दिन पहले जब खुद के भाभी-भाभी आये थे तब तो बहुत खुश थी। हर चीज का इंतजाम खुद देख रही थी। तब तुम्हें कोई परेशानी नहीं हुई।

रमा अपनी ही दुनिया मे खोयी हुई थी। रोते रोते रसोई में झूठे बर्तनों को साफ कर रही थी। तभी उसके पति अजय ने खुशी में मुस्कुराते हुए रसोई में आकर कहा, “सुनो! कल गांव से माँ और अमन अपनी पत्नी और बच्चो के साथ आ रहे हैं। एक काम करो जल्दी से सारे काम निपटा कर उनकी पसंद के खाने पीने की चीजों के लिस्ट बनाकर मुझे दे दो, मैं आज ही लेता आऊंगा।”

लेकिन इधर रमा ने ना अजय की तरफ पलटकर देखा, ना ही कोई जवाब दिया। बस चुपचाप अपने काम मे लगी रही।

दअरसल रमा के भाई भाभी चार साल बाद उससे मिलने और उसके साथ घूमने फिरने मुम्बई आये थे लेकिन रमा के पति अजय ने उनसे अच्छे से व्यवहार नहीं किया। रमा के लाख समझाने पर भी उसने उन लोगों के सामने ऑफिस के काम मे व्यस्त रहने का नाटक किया।

इधर रमा ने भी अपनी और घर की इज्जत बचाने के लिए उसने उन लोगों के सामने अजय के झूठे नाटक में हां में हां मिलाई क्योंकि उसके पास और कोई दूसरा चारा नहीं था।

ये पहली बार नहीं था जब अजय ने ऐसा व्यवहार रमा के मायके वालों के साथ किया हो। वो हर बार यही करता। जब भी रमा के मायके से कोई आने वाला होता, उससे पहले ही वो रमा से झगड़ा कर के घर का माहौल बिगाड़ देता और चुप्पी साध लेता और उन लोगों के जाते ही खुश होकर बात करने लगता।

अजय की बातों को अनसुना छोड़कर रमा का यूँ अपनी सोच में खोए रहना और अपनी धुन में बर्तनों का धुलना अजय को बिलकुल भी पसंद नहीं आया। क्योंकि ये रमा द्वारा चुप रहकर उसके अहम पर की गयी चोट थी।

उसने रमा का बांह पकड़कर अपनी तरफ करते हुए कहा, “अब क्या हो गया? जो जवाब नहीं दे रही हो। मैं तुमसे बात कर रहा हूं दीवारों से नहीं, समझी।”

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लेकिन आज रमा ने अपने आंसुओं को पोछते हुए हिम्मत करके अजय से कहा, “हाँ सुन लिया मैंने।पता चल गया मुझे, कल से खाना बनाने वाली को बुला लूंगी और बाकी कमली (हेल्पर) को समझा दूंगी की जब तक वो लोग रहे तब तक कोई छुट्टी ना ले। कुछ एडवांस भी उसको दे दूंगी। ठीक है। अब हटो, मुझे काम करने दो।”

अजय ने गुस्सा दबाते हुए आश्चर्यचकित होकर कहा, “क्या मतलब खाना बनाने वाली को बोल दूंगी। तुम कहाँ जा रही हो? मैं चाहता हूँ, देखो मेरी बात कान खोलकर सुन लो, उन लोगो के सामने तुम अच्छे से रहना।

उनकी सेवा में कोई कमी ना रहे ये तुम्हारी जिम्मेदारी है। ये मुँह बना कर कटे कटे नहीं। मेरी मां और भाई रोज-रोज नहीं आते हैं। समझी? इसलिए मुझे घर में कोई नाटक नहीं चाहिए।”

“लेकिन आप ने तो अभी से नाटक शुरू कर दिया। और अब उन लोगों के आने से पहले खुद झगड़ा शुरू करने की तैयारी शुरू कर दी। बस यही तरीका है तुम्हारा अपनी बात कहने का और अपनी मांगे पूरी कराने का।” आज रमा की भी आवाज़ ऊँची हो गयी थी।

“अगर तुमको ऐसा लगता है तो ऐसा ही सही। अभी दो दिन पहले जब खुद के भाभी-भाभी आये थे तब तो बहुत खुश थी। खुद खाना, पानी, चाय-नाश्ता हर चीज का इंतजाम देख रही थी। तब तुम्हें कोई परेशानी नहीं हुई।

तुम औरतों का यही नाटक रहता है जब कोई मायके से आये तो खुशी से चेहरा खिल जाता है। और ससुराल वालों को देखते मुँह बन जाता है। फिर उनके साथ सिर्फ खुश रहने का नाटक किया जाता है।” अजय ने कहा।

“अच्छा लेकिन अफसोस कि तुम मेरे भैया भाभी के साथ चार दिन खुश रहने नाटक भी नहीं कर पाए।” वह रुआंसी हो गई।

“अच्छा तो तुम को अब मेरे माँ और भाई और तुम्हारे भाई भाभी में कोई फर्क ही नहीं पता। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई उन लोगों के तुलना करने की”, अजय ने गुस्साते हुए कहा।

“और सबसे बड़ी बात, उनके आने से पहले ही मैंने कह दिया था कि तुम मुझसे कोई उम्मीद मत रखना। मुझे ऑफिस के बहुत काम होंगे इस महीने में। मैं पूरा महीना व्यस्त हूं। तो मैं उन्हें मुंबई दर्शन नहीं करा सकता।”

“अच्छा तो तुम कल से सासुमां और देवरजी के लिए फ्री कैसे हो जाओगे? क्योंकि अभी तो पूरा महीना बिता नहीं है।

चलो मान लिया मुम्बई दर्शन ना सही लेकिन क्या तुम उनसे बैठकर दो मिनट प्यार से बात भी नहीं कर सकते थे। शनिवार रविवार घर पर रहने वाला इंसान उनके आने पर उन दो दिनों में भी ऑफिस का बहाना कर के दोस्तो के साथ पार्टी करने चला जाता था।

उन्होंने कुछ नहीं कहा लेकिन मुझे तो बुरा लगा ना। चार साल बाद 1 सप्ताह के लिए वो हमारे घर हम सब से मिलने आये थे। लेकिन तुम उनके साथ खुश रहने का नाटक भी नहीं कर पाए।”

“रमा, तुम पहले बात करने का ढंग सीखो। मैं उस घर का दामाद हूं और तुम इस घर की बहू समझी। तुम क्या चाहती हो कि मैं घर जमाई बन जाऊं। उनके आगे पीछे घूमूं तो ये सब मुझसे बिल्कुल नहीं होगा।

अब अपना ये नाटक बंद करके मूड ठीक करो और उन लोगों के स्वागत की तैयारी करो”, अजय ने तुनकर बोला।

तब रमा ने कहा, “नाटक! काश मुझे तुम्हारी तरह नाटक करना आता, तो तुम मेरा दर्द समझ पाते। लेकिन अब बहुत हो गया। अब जैसे मैं मेरे घर वालो को हैंडल करती हूं तुम भी तुम्हारे घर वालो को संभालो। मुझ से कोई उम्मीद मत रखना”, कहकर रमा अपने कमरे में चली गयी। और अजय हॉल में सोफे पर लेटकर टीवी देखने लगा।

अगले दिन अजय उठा तो देखा कि स्टेशन पहुँचने में उसे देर हो गई। वो गुस्से में रमा को चिल्लाते हुए बुलाने लगा, “रमा, तुम मुझे समय से उठा नहीं सकती थी। मुझे अब तक स्टेशन पहुंच जाना चाहिए था।”

लेकिन उसे रमा की कोई आवाज नहीं आयी। उसने अंदर जाकर कमरे में चारो तरफ देखा उसे कमरे में रमा कही नहीं दिख रही थी। उसके माथे पर पसीने छूटने लगे। उसने रमा को फोन मिलाया तो देखा उसका मोबाइल भी घर पर था।

इधर अजय के मोबाइल पर उसकी भाई का फोन आने लगा कि वो स्टेशन पर आ गया है। वो कब तक आ रहा है उन लोगो को लेने। अजय को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे, कहाँ जाएं?

तभी उसे दरवाजे के डोरबेल की आवाज आई। उसने दरवाजा खोल कर देखा तो सामने उसकी माँ और भाई सपरिवार खड़े थे। वो आश्चर्य से देखने लगा।

तभी अमन ने कहा, “क्या हुआ भैया? कोई बात है क्या?”

अजय ने हकलाते हुए कहा, “अरे नहीं तो। कोई भी बात नहीं। आ अंदर तो आ। कैसे आया कैब से? मेरी तो आंख ही देर से खुली।”

“हाँ बताया भाभी ने कि आपकी तबियत थोड़ी ठीक नहीं इसलिए वो आ गयी लेने। हमे छोड़कर कुछ सामान लेने गयी हैं। बोला तुम लोग चलो, मैं समान लेकर आती हूं। अब कैसी है आपकी तबियत?” अमन ने कहा।

तब तक रमा भी वहाँ आ गयी। रमा को देखते अजय की सांस में सांस आयी। कुछ दिन रह कर  सब खुशी खुशी वापिस चले गए। तब अजय ने कहा, “अच्छा हुआ तुमने उनके सामने कोई नाटक नहीं किया।”

रमा को गुस्सा तो बहुत तेज आया लेकिन उसने खुद को कंट्रोल करते हुए कहा, “हाँ क्योंकि मुझे तुम्हारी तरह नाटक करना नहीं आता। मेरे माता पिता ने मुझे संस्कार सिखाए है कि घर आया कोई भी मेहमान भगवान समान होता है। और मेहमानों में कोई भी भेदभाव नही करना चाहिए। तो मैं सबका अनादर कैसे कर सकती थी जब बात अपने ही परिवार की हो।”

कहकर रमा ने वहाँ से उठकर कमरे में जाते हुए पलटकर कहा, “कर तो मैं भी सकती थी तुमको सबक सिखाने के लिए। तुम्हे अच्छे से पता है क्योंकि उन महज कुछ घण्टों में तुम कितना डर गए थे ये तुम्हारे चेहरे की उड़ी रंगत ही बता रही थी। काश अगर मैं वो सच में कर देती तो तुम क्या जवाब देते। लेकिन तब ये मेरी जीत नहीं होती, बदला होता जो मुझ में और तुम में फर्क मिटा देता।”

कहानी का सार सिर्फ इतना है कि अधिकतर पुरुष अपनी पत्नी के मायके से आये ससुर, साले या अन्य किसी मेहमान के आने पर साथ ठीक से व्यवहार नहीं करते। या तो वो बिल्कुल चुप रहेंगे या फिर किसी ना किसी तरह का व्यंग या कटाक्ष करके उनको अपमानित करते रहते हैं।

जबकि खुद के घर वालो के आने पर उनके साथ ये उम्मीद करते हैं कि उनकी पत्नी उनको वीआईपी की तरह ट्रीट करें। उनकी सेवा और आवभगत करे। लेकिन पुरुषों के इस अभद्र व्यवहार के लिए समाज उन्हें कुछ नहीं कहता।

ना ही बेटी के माता पिता या भाई बहन दामाद को समाज में बदनाम करते हैं। लेकिन अगर यही व्यवहार एक बहु करती है तो उसे अनेकों बार अपमानित होना पड़ता है और समाज उसे खराब और असंस्कारी बहू का तमगा चिपका देती है।

इमेज सोर्स : Still from Woosh Diwali ad, YouTube

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