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एक दमदार संदेश देती है तापसी पन्नू की फिल्म रश्मि रॉकेट

तापसी पन्नू फिल्म रश्मि रॉकेट के उस डायलॉग की तरह है “हार-जीत तो बस परिणाम है कोशिश करते रहना अपना काम है...”

तापसी पन्नू फिल्म रश्मि रॉकेट के उस डायलॉग की तरह है “हार-जीत तो बस परिणाम है कोशिश करते रहना अपना काम है…”

खेल के मैदान में महिलाओं का एक से एक उपलब्धि दर्ज करते हुए मिसाल कायम करना जहां एक सच है, वहीं इस सच का दूसरा पहलू यह भी है कि दुनिया भर में महिला एथलिटों को नियमित रूप से भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उनका लिंग परिक्षण किया जाता है इसके परिणामस्वरूप अक्सर समाज में उनकी बेज्जती होती है और उनका करियर बर्बाद हो जाता है।

महिला एथलिटों के साथ इस लैंगिक भेदभाव और कामयाबी के संघर्ष को डायरेक्टर आकर्ष खुराना ने अपने निर्देशन में बनी स्पोर्टस-ड्रामा फिल्म रश्मि रॉकेट में एक साथ पिरोने की कोशिश की है इस संदेश के साथ कि “हार-जीत तो बस परिणाम है कोशिश करते रहना अपना काम है…”

क्या नई बात है रश्मि रॉकेट में

पिछले दिनों ओटीटी प्लेटफार्म ज़ी5 पर रश्मि रॉकेट रिलीज़ हुई जिसकी कहानी तापसी पन्नू के इर्द-गिर्द बुनी गई है और ये सच्ची घटनाओं पर आधारित है।

भारत में महिला एथलीट पर हाल के दशकों में बहुत सी कहानी कही गई हैं पर उसमें उस एथलिट विशेष के संघर्ष, मेहनत और उपलब्धियों पर अधिक फोकस किया जाता रहा है। रश्मि रॉकेट के कहानी में यूएसबी यह कही जा सकती है कि इस कहानी ने महिला एथलीट के साथ खेल के दुनिया में जो भेदभाव है उसको उधेड़ कर रख दिया है।

रश्मि रॉकेट अपनी कहानी में एथलेटिक्स संघ से एक एथलीट के भिड़ जाने की दास्ता है जो देश में कई एथलीट के साथ होता रहा है। यह कहानी खेल के दुनिया में महिला एथलीट को अपने खेल के साथ गंभीर रहने के साथ-साथ उनके साथ होने वाले व्यवहार के प्रति सचेत करने जैसा है।

वैसे भी भारतीय समाज और सामाजिक सरचना में महिला एथलीट के पास स्वयं को साबित करने और साबित करने के बाद अपने नाम से उपलब्धियों हासिल करने का समय पुरुष एथलीटों से कम है।

तमाम उपलब्धियों के बाद भी घर बसाने के सामाजिक दबाव से वह कभी भी मुक्त नहीं हो पाती है। उसको अपने शारीरिक और मानसिक चुनौतियों के साथ-साथ सामाजिक चुनौति ही नहीं खेल संघों के पुरुषवादी चुनौतियों से लड़ते-भिड़ते हुए अपने खेल पर भी फोकस करना पड़ता है। जब इन सब चौहद्दियों को पार कर भी लेती है और उपलब्धियों को एन्जॉय करने का समय आता है, समाज बेटी बोलकर पिता की तरह दीवार बनकर खड़ा हो जाता है, “बेटी अब बस घर बसा लो” की नसीहत के साथ।

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तापसी पन्नू हिंदी सिनेमा में कुछ अलग गढ़ रही हैं

रश्मि रॉकेट फिल्म के कहानी, कलाकारों के अभिनय और डायरेक्टर आकर्ष खुराना के निर्देशन पर दो-चार बात करने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि तापसी पन्नू अपनी अधिकांश फिल्मों की  कहानी में महिला एथलीट के सामने जो चुनौतियां आती हैं उसको सतह पर लाने का प्रयास कर रही हैं।

मनोरंजन के साथ-साथ महिला एथलीट के इन चुनौतियों के बारे में भी ठहर कर सोचने की जरूरत है। तापसी का अभिनय  महिला चरित्र का एक अलग ही व्याकरण तो रच ही रहा है, महिलाओं के साथ सामाजिक सोच को भी सतह पर लाकर पटक दे रहा है।

तापसी पन्नू ने अपनी कई फिल्मों में स्वयं को एथलीट के तौर पर पेश किया है या उस चरित्र के तौर पर जो समाज के पुरुषवादी चरित्र से लड़ रहा है। मसलन, उनकी पहली फिल्म नाम शबाना  उनके कंधे पर खडी फिल्म थी।

सूरमा में वह हॉकी खिलाड़ी में दिखी हैं। इससे पहले मनमर्ज़ियाँ में भी वह हाकी खिलाड़ी थीं तो सांड की आंख में राइफल शूटंग प्लेयर के चरित्र में उनकी अपकमिंग फिल्म शाबाश मिट्ठू भी एक बायोपिक है जो क्रिकेट प्लेयर पर है। इसी तरह पिंक और मुल्क में उनका चरित्र महिला प्रधान ही था जिसमें उनका रोल सबसे अधिक प्रभावी था।

हिंदी फिल्मों में हीरो के मुकाबले हिरोईन के पास चुनाव के अधिक मौके नहीं होते है। अगर स्क्रिप्ट में हीरोई न की अधिक गुंजाइश होती है तो कोई भी बड़ा हीरो उस फिल्म में काम करने को राजी नहीं होता है।

अपने कंधे पर पूरी फिल्म को ढ़ोकर दर्शकों के बीच में जाना और वाह-वाही भी बटोरना, बिल्कुल ही आसान काम नहीं है। शो-पीस के तरह फिल्म का हिस्सा बनकर कुछ गाने और रोमाटिंक सीन करके भी हिरोइन बने रहने का विकल्प तापसी के पास हमेशा से ही था।

तापसी अपने अभिनय में जिन चरित्रों को निभा रही हैं, उसके माध्यम से असमानता से भरे इस समाज में संदेश भी दे रही हैं। तापसी ने उम्मीद नहीं खोई है कि ‘कुछ नहीं हो सकता है।’ आप अगर चाहते हैं तो विकल्प आपके पास हमेशा से होते हैं, आप उसका इस्तेमाल करते हैं या नहीं, यह आप पर ही निर्भर करता है।

तापसी उस विकल्प का इस्तेमाल अपने अभिनय कैरियर के साथ भी कर रही हैं और समाज में महिलओं के निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के उन सवालों को सामने लाने में जुटी हुई हैं, जिस पर ठहर बात करना भी पुरुषवादी समाज के लिए अपमान सरीखा है।

तापसी रश्मि रॉकेट के उस डायलॉग की तरह हैं “हार-जीत तो बस परिणाम है कोशिश करते रहना अपना काम है…”

इमेज सोर्स : Still from Rashmi Rocket Trailer/Surma/Naam Shabana/ YouTube 

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