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इस घर पर सिर्फ हमारी बहू का हक़ है…

शर्मा परिवार एक दूसरे को हौसला देते रवि के जाने के ग़म को सह ही रहे थे कि एक सुबह दोनों बेटे परिवार सहित आ पहुँचे। 

शर्मा परिवार एक दूसरे को हौसला देते रवि के जाने के ग़म को सह ही रहे थे कि एक सुबह दोनों बेटे परिवार सहित आ पहुँचे। 

शर्मा निवास के उस बड़े से कमरे में अजीब सा सन्नाटा पसरा था। कहने को तो पूरा परिवार वहाँ मौजूद था लेकिन सब चुप थे क्यूंकि आज अपने पिता अलोक जी बात सुन अब किसी के पास कुछ नहीं था, ना ही कुछ कहने को या फिर तर्क करने को।

सुमन जी और उनके पति अलोक जी के तीन बेटों का हँसता खेलता घर था। कॉलेज में प्रोफेसर अलोक जी और उनकी पति सुमन जी बेहद व्यवहार कुशल और मृदु स्वाभाव के थे अपने बच्चों को भी उन दोनों ने अच्छे संस्कार देने की कोशिश की थी।

समय के साथ बच्चे बड़े हो गए बड़े बेटे राजू की शादी भी अलोक जी और सुमन जी ने देखभाल के स्वाति से कर दी ये सोच की बड़ी बहु घर साथ ले के चलेगी, लेकिन कहते है ना कि सोचा कभी होता ही कहाँ है। बहु उनके हिसाब की नहीं थी। सास ससुर और ससुराल की जिम्मेदारी उसे बंधन लगती थी एक साल होते होते ही बड़े बेटे बहु ने अपनी अलग दुनिया बसा ली।

दूसरे बेटे की नौकरी विदेश में लगी थी और विवाह के बाद अपनी पत्नी के साथ वो भी विदेश ही बस गया। शर्मा निवास जो हमेशा हंसी से गुलजार रहता था, अब सूना सा हो चला था। दोनों बेटे अपनी घर गृहस्थी में मगन थे।

सुमन जी और अलोक जी का सबसे छोटा बेटा रवि बहुत कोशिश करता अपने माता-पिता के मन को बहलाने की लेकिन बड़े दोनों बेटों के निर्मोही स्वाभाव ने दोनों पति-पत्नी के दिल को तोड़ दिया था।

रवि की जिम्मेदारी बची थी सो उसकी भी शादी सुमन जी और अलोक जी ने निपटा दी। बहु के रूप में रूपा सबसे छोटी बहु बन शर्मा निवास में आयी। हमेशा चेहरे पे एक सौम्या मुस्कान लिये रूपा का जैसा नाम था वैसा ही गुण। सास ससुर की सेवा बिना किसी शिकन के करती। रवि भी अपने माता पिता की सेवा पूरे मन से करता।

सविता जी और अलोक जी भी रवि और रूपा से बहुत स्नेह रखते एक तसल्ली सी थी कि कम से कम एक बेटा तो उनके दिये संस्कारों का मान रख रहा है।

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समय अपनी रफ़्तार से गुजर रहा था अपने बेटों की राह ताकते अलोक जी और सुमन जी जो समय से पहले वृद्ध हो चले थे कि उसपे एक और वज्रपात होना बाकी था। बरसात की उस रात जाने कैसे राजू की बाइक को किसी ट्रक वाले ने ऐसा धक्का दिया की फिर राजू कभी लौट ही नहीं पाया। रूपा की दुनिया उजड़ चुकी थी। दोनों बेटों को पड़ोसियों ने ख़बर पहुंचा दी। सुमन जी को आशा थी की अपने छोटे भाई की असमय मृत्यु और उसकी गर्भवती पत्नी के दुःख में दुखी उनके दोनों बेटे बिना एक पल देर किये घर आ जायेंगे।

“चाचा जी देर हो रहा है अब अंतिम संस्कार कर देना चाहिये”, राजू के एक दोस्त ने जब अलोक जी से पूछा तो अलोक जी निशब्द सिर्फ सिर हाँ में हिला रह गए। जानते थे अब बेटे को घर रखना ठीक नहीं था। वहीं दोनों बड़े बेटे छुट्टी की समस्या जता तुरंत आने में असहमति जाता गए थे। एक पिता ने कलेजे पे पत्थर रख अपने श्रवण कुमार बेटे को अंतिम विदाई दी।

“रूपा बेटा, कितना शोक मनायेगी अब पोंछ ले अपने आंसू।”

“बहुत मुश्किल काम दे रही हैं माँ आप”, सिसकते हुई रूपा ने कहा तो सविता जी ने रूपा को गले लगा लिया।

“बेटा, माना तूने पति खोया है और हमने बेटा। और कुछ नहीं तो रवि की अंतिम निशानी का ख़याल कर खुद को संभाल ले।”

शर्मा परिवार एक दूसरे को हौसला देते रवि के जाने के ग़म को सह ही रहे थे कि एक सुबह दोनों बेटे परिवार सहित आ पहुँचे।

“तुम लोग यूं अचानक? भाई के मौत पे जिन्हें समय नहीं मिला वो आज कैसे आ गए और वो भी परिवार के साथ? क्या अब छोटे शहर में इन्हें परेशानी नहीं होगी?” अलोक जी ने व्यंग से कहा तो दोनों बेटे-बहू बगलें झांकने लगे।

“वो पापा, हम तो बस रूपा का दुःख बांटने आ गए और सोचा अगर लगे हाथ घर और बाकी चीज़ों का भी बटवारा हो जाता तो अच्छा रहता अब रवि तो रहा नहीं तो रूपा भी मायके ही जायेगी और फिर आप दोनों भी बुजुर्ग हो चुके हैं। निःसंकोच हो बड़े बेटे राजू ने अपने मन की बात सामने रख दी।

अब तक अलोक जी अपने बेटों को सिर्फ मतलबी समझ रहे थे लेकिन वो धोखेबाज भी थे ये भी आज उन्होंने ने जान लिया था दोनों के मन में छल था।

“कैसा हिस्सा?” शांत स्वर में अलोक जी ने सवाल किया तो दोनों बेटे बहु चौंक कर एक दूसरे को देखने लगे।

“ये कैसा सवाल है पापा? हमारा हिस्सा पापा और किसका? अब इस घर के बेटे हम है तो हिस्सा भी हमारा ही होगा।”

“क्यों? सिर्फ हक़ याद है बेटे होने का तुम दोनों को और फ़र्ज वो तो बहुत आसानी से भूल गए तुम दोनों? तुम दोनों को अपने जवान भाई की मौत पे आने का समय ना मिला लेकिन आज अपना हिस्सा मांगने बहुत समय से आ गए? मैंने अपनी सारी संपत्ति को अपनी बहु रूपा के नाम कर दिया है।”

“लेकिन क्यों पापा? बेटे हम है तो हिस्से पे हक़ भी हमारा ही होगा, रूपा का कैसे हो सकता है जबकि रवि जिन्दा भी नहीं है?”

“रूपा सिर्फ हमारी बहु नहीं बेटी भी है। रवि और रूपा ने अपने सारे फ़र्ज हमेशा निस्वार्थ निभाया।  अब एक बात हो तो बताऊ तुम दोनों को अपने बेटे-बहु की। याद है मेरे अस्पताल में भर्ती होने पे तुम दोनों ने साफ साफ आने से माना कर दिया था, वहीं रूपा और राजू रात रात भर मेरे सिरहाने बैठे मेरी सेवा करते रहे।

पहले फ़र्ज निभाना सीखो फिर हक़ जाताना। और तुम दोनों को ऐसा क्यों लगता है कि रवि के बाद रूपा अपने मायके जायेगी? रूपा अब मेरी जिम्मेदारी है और आज मैं साफ साफ कह देता हूँ मेरी संपत्ति में सिर्फ और सिर्फ मेरी बहु का हक़ है और किसी का नहीं।  बेहतर होगा अब तुम दोनों अपने परिवार के साथ मेरे घर से चले जाओ।”

पिता के मुँह से कर्वी सच्चाई सुन दोनों भाई निशब्द रह गए थे। सच ही तो कहा था अलोक जी ने, जिन बेटों ने कभी अपने बेटे और भाई होने का फ़र्ज नहीं निभाया था वो कैसे अपने हक़ को ले सजग थे?

अपने बेटों को संपत्ति से बेदखल कर छोटी बहु के नाम संपत्ति करने के फैसले से आप कितने सहमत है जरूर बतायें।

मूल चित्र : Still from Jhelum, Zee Music Compnay, YouTube

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