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मम्मीजी, प्लीज़ सब्जी काटने में मेरी मदद कीजिये…

"सीमा मेरे लिए नाश्ता अलग और खाना अलग अलग बनाना, मुझे एक जैसा खाना दो बार अच्छा नहीं लगता। तुम्हारी मम्मी भी अलग ही बनाती थी।"

“सीमा मेरे लिए नाश्ता अलग और खाना अलग अलग बनाना, मुझे एक जैसा खाना दो बार अच्छा नहीं लगता। तुम्हारी मम्मी भी अलग ही बनाती थी।”

आज मैं जो लिखने जा रही हूं जानती हूं इसका बहुत प्रतिकार हो।

विरोध भी होगा और शायद कुछ लोग असहमत होकर मुझसे नाराज भी हो जाएं, क्योंकि ये विचार समाज की उस लीक से थोड़े अलग है जहाँ यह संस्कार दिए जाते हैं और यह सिखाया जाता  है कि बड़े बूढ़े एक छायादार पेड़ की तरह होते हैं और ये…वो…

और मैं कतई इसका विरोध भी नहीं कर रही हूँ पर पहले कुछ उदाहरण देखिए –

सीन 1

“बहू मेरे कपड़े बाथरूम में रख दो मैं नहाने जा रहा हूँ।”

“पापा आप पहले इन को नहा लेने दीजिये ना, इन्हें आज जल्दी ऑफिस जाना है।”

“नहीं उसे जल्दी जाना है तो जल्दी जागना चाहिए था। पहले तो मैं ही नहाऊंगा।”

सीन 2

“मम्मीजी, प्लीज मुझे सब्जी काटने में थोड़ी हेल्प कीजिए ना, आज दोनों भाई-बहन अलग अलग सब्जी टिफ़िन में ले जाने की जिद कर रहे हैं।”

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“तो क्यों बिगाड़ा तुमने? अब भुगतो! मैं तो पहले पूजा करूँगी, बाद में मेरा मन नही लगता।”

सीन 3

“सीमा मेरे लिए नाश्ता अलग और खाना अलग अलग बनाना, मुझे एक जैसा खाना दो बार अच्छा नहीं लगता। तुम्हारी मम्मी भी अलग ही बनाती थी।”

दफ्तर के लिए घड़ी की सुइयों से भी तेज भागती निशा मन ही मन कुड़ी, झुंझलाई भी कि पापा मम्मी मेरी तरह 10 बजे ऑफिस नहीं जाती थी न।

ये कुछ ऐसे उदाहरण है जो आपको हर दूसरे तीसरे घर में मिल जायेंगे।

घर के वे बड़े जो ऑफिस से और महिलाएं जो घर के काम से सेवा निवृत्त हो गई हैं, वे अपने समय की भाग-दौड़ को भूल गए और अब ये नहीं देख पा रहे कि अब वही समय उनके वंशजों का चल रहा है।

वे अब अपनी शर्तों और टाइम टेबल पर ही जीना चाहते हैं।

पिंकी की दादी उनकी हमउम्र पड़ोसन से पिंकी की शिकायत कर रही हैं कि उसकी वजह से उनको दोपहर में वो सीरियल दोबारा देखने को नहीं मिलते क्योंकि उनकी पोती सहेलियों के साथ वही बैठकर प्रोजेक्ट बनाती है। और पड़ोसन दादी की शिकायत यह है कि उनकी पोती सूट बिना दुपट्टे के पहनती है घर में शॉर्ट्स पहनती है।

अभी हम इतने नीचे नहीं आये न ही हमारे संस्कार इतने बुरे हैं। हम अभी भी अपने पालनहार को, हमारे माँ बाप को अपने साथ ही रखना पसंद करते हैं।

बस एक विनती, एक निवेदन उन बुजुर्गो से जो अभी अशक्त नहीं हैं, वो थोड़ा सा समझौता, समय का और खानपान का उन के साथ करें जिनका समय अभी बहुत व्यस्त चल रहा है और थोड़ी सी आजादी आने वाली युवा पीढ़ी को भी दें।

आप खुद अपनी शर्तों पर जीना चाहते हैं तो जीएं लेकिन दूसरों को अपनी शर्तों पर नचा कर नहीं। एडजस्ट करना सिर्फ छोटों को ही नहीं, बड़ों को भी आना चाहिए। अपना ख्याल रखें, खुशी से जीएं और दूसरों को भी ख़ुशी से जीने दें!

मूल चित्र : Still from Short Film Best Of Amma/MensXP, YouTube

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