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क्या मेरे लिए भी बना है आज़ादी का अमृत महोत्सव?

आखिर अमृत महोत्सव तो हम मना रहे हैं पर क्या वास्तव में इस आज़ादी का अमृत भारत की आधी आबादी को मिलता है? ये आज़ादी सभी को मिलनी चाहिए...

आखिर अमृत महोत्सव तो हम मना रहे हैं पर क्या वास्तव में इस आज़ादी का अमृत भारत की आधी आबादी को मिलता है? ये आज़ादी सभी को मिलनी चाहिए…

‘अमृत महोत्सव’ ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ ये शब्द आपने मार्च 2021 से लेकर आज तक हजारों बार सुने होंगे और 15 अगस्त 2023 तक सुनते ही रहेंगे। हम सभी को ज्ञात है कि अमृत महोत्सव का शुभारम्भ 12 मार्च 2021 को किया गया और यह महोत्सव 15 अगस्त 2023 तक चलेगा।

इस महोत्सव में संपूर्ण भारत के महाविद्यालय, विश्वविद्यालय,विदेशों में स्थापित भारतीय दूतावास और सभी भारतीय व प्रवासी भारतीय सम्मिलित हैं। इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस से इस महोत्सव के नाम से अनेक कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ गई।

इन कार्यक्रमों को देख कर बहुत प्रसन्नता भी होती है परंतु कहीं न कहीं मन में कुछ विचार भी आते हैं। आखिर अमृत महोत्सव तो हम मना रहे हैं पर क्या वास्तव में इस आज़ादी के अमृत का रसास्वादन भारत की आधी आबादी को मिलता है?

अमृत महोत्सव तो हम मना रहे हैं पर क्या वास्तव में इस आज़ादी के अमृत का रसास्वादन भारत की आधी आबादी को मिलता है?

कुछ प्रश्न इस आज़ादी के महोत्सव ने मेरे मष्तिष्क में जगाएँ हैं जो इस लेख के माध्यम से अपने पाठकों के समक्ष रखूँगी।

वेदों में कहा गया है ‘मृत्योः मुक्षीय मामृतात्’ जिसका अर्थ है हम दुःख, कष्ट, क्लेश और विनाश से निकलकर अमृत की तरफ आगे बढ़ें और अमरता को प्राप्त करें । ऐसे ही कुछ विचारों के साथ इस महोत्सव का आरंभ किया गया है।

हमारे देश की आजादी के बाद की यह 75 वर्षों की यात्रा यूँ ही नहीं पूरी हुई। इसमें हम भारतीयों की मेहनत और हमारी उद्यम-शीलता झलकती है। हमने अपनी मेहनत से खुद को साबित किया है। हमें हमारी लोकतांत्रिक परंपराओं पर गर्व करने के अनेक कारण मिलते हैं।

आज हम मंगल से लेकर चंद्रमा तक हर एक क्षेत्र में अपनी पहचान कायम कर रहे हैं और इस पहचान को कायम करने में देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का भी विशेष योगदान रहा है।

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क्या हमें अपनी क्षमताओं का दोहन करने का अवसर मिलता है?

पर इस लेख के माध्यम से सवाल सरकारों से नहीं बल्कि देश के हर एक जन से है कि इस ‘आधी आबादी’ को क्या अपनी क्षमताओं और शक्तियों का पूरा दोहन करने का अवसर मिलता है? क्या वे सच में आजाद हैं?

महात्मा गाँधी जी ने देश के स्वतंत्रता आंदोलन के समय इनकी शक्ति का आवाहन किया था और उन्हें पूर्ण विश्वास था कि बिना स्त्रियों के हमें आज़ादी नहीं मिल सकती। स्त्री सशक्तिकरण की बातें तो बहुत होती हैं पर क्या आज भी हर घर में बेटी-बहु सच में सशक्त हैं?

क्या वास्तव में आज़ादी के अमृत का रसास्वादन भारत की आधी आबादी को मिलता है?

क्यों हमारे समाज में इस आबादी को जन्म से लेकर मृत्यु तक एक अनदेखे साँचे में फिट करने की अनगिनत कोशिश चलती है और एक ऐसी प्रक्रिया जीवनपर्यन्त चलती है कि लोगों को महसूस भी नहीं होता कि उन्होंने अपनी ही बेटी के सामान्य अधिकारों का किस प्रकार हनन कर दिया।

लोग इन बातों पर तर्क देने लग जाते हैं कि अभी स्त्री को सभी अधिकार प्राप्त हैं और उन्हें अब समान अवसर मिलते हैं। शिक्षा से लेकर नौकरी तक वे किसी पर निर्भर नहीं हैं। पर जब आप ज़मीनी सच्चाई को देखेंगे तो दंग रह जाएँगे कि आज भी देश की आधी आबादी अपने सामान्य अधिकारों के लिए भी संघर्ष करती हैं।

हमें इस आज़ादी के इस अमृत महोत्सव में संकल्प लेना होगा कि ये आज़ादी, और वो भी बिना डर के सांस लेने की, सभी को मिलनी ही चाहिए।

देश की आधी आबादी को अपने निर्णय लेने की, सोचने की, पढ़ने की आज़ादी हो और ये आज़ादी सरकार के प्रयत्नों या कानून के कारण नहीं बल्कि हर जन की अपनी जिम्मेदारी से होनी चाहिए।

मेरे विचार में आज़ादी का सही अमृत महोत्सव वही होगा जो ऊर्जा से लेकर प्रेरणा तक, नए विचारों का, नए संकल्पों का महोत्सव हो और जिसमें दिखावटी आधुनिकता न हो बल्कि सभी की सही आज़ादी हो।

मूल चित्र :  Still from Short Film Attack – Nirbhaya…Fear No More/Arshh Films, YouTube

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About the Author

shalini verma

I am Shalini Verma ,first of all My identity is that I am a strong woman ,by profession I am a teacher and by hobbies I am a fashion designer,blogger ,poetess and Writer . मैं सोचती बहुत हूँ , विचारों का एक बवंडर सा मेरे दिमाग में हर समय चलता है और जैसे बादल पूरे भर जाते हैं तो फिर बरस जाते हैं मेरे साथ भी बिलकुल वैसा ही होता है ।अपने विचारों को ,उस अंतर्द्वंद्व को अपनी लेखनी से काग़ज़ पर उकेरने लगती हूँ । समाज के हर दबे तबके के बारे में लिखना चाहती हूँ ,फिर वह चाहे सदियों से दबे कुचले कोई भी वर्ग हों मेरी लेखनी के माध्यम से विचारधारा में परिवर्तन लाना चाहती हूँ l दिखाई देते या अनदेखे भेदभाव हों ,महिलाओं के साथ होते अन्याय न कहीं मेरे मन में एक क्षुब्ध भाव भर देते हैं | read more...

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