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तुम क्यों अपने दिल की नहीं कहतीं?

कैसे स्त्रियाँ बस अपने लिए नहीं पर अपनों के लिए जीती चली जाती हैं, क्यों ये कभी अपने मन की नहीं करतीं, क्यों कभी अपने दिल की नहीं कहतीं?

कैसे स्त्रियाँ बस अपने लिए नहीं पर अपनों के लिए जीती चली जाती हैं, क्यों ये कभी अपने मन की नहीं करतीं, क्यों कभी अपने दिल की नहीं कहतीं?

ये स्त्रियाँ क्यों कभी मन की नहीं करतीं
क्यों कभी अपने दिल की नहीं कहतीं?

टाँक देती हैं फूलों को हर पैबंद पर
दीवारों से गिरती पपड़ी को ढक देती हैं।

तुरप देती हैं उधड़न होती जिंदगी
सबके सपनों को बुनती जाती हैं।

घर को संभालती हैं ,सहेजती हैं
घर को घर सा वही बना देती हैं।

सूनी आँखों में उठते प्रश्नों को देखती हैं
पर उम्मीद को अपने में जिंदा रखती हैं।

न मन हो फिर भी मुस्कराती जाती हैं
आँसू छिपा अपनी ख़ुशी छलकाती जाती हैं।

चाहे-अनचाहे सवालों में घुटती जाती हैं
एक तारीफ़ के बोल को तरस जाती हैं।

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खुश करने को, सबको बस करती ही जाती हैं
ये स्त्रियाँ क्यों सबके मन की करती हैं?

ये स्त्रियाँ क्यों कभी मन की नहीं करतीं
क्यों कभी अपने दिल की नहीं कहतीं?

मूल चित्र: a still from short film “Soul Mother” via YouTube

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About the Author

I am Shalini Verma ,first of all My identity is that I am a strong woman ,by profession I am a teacher and by hobbies I am a fashion designer,blogger ,poetess and Writer . मैं सोचती बहुत हूँ , विचारों का एक बवंडर सा मेरे दिमाग में हर समय चलता है और जैसे बादल पूरे भर जाते हैं तो फिर बरस जाते हैं मेरे साथ भी बिलकुल वैसा ही होता है ।अपने विचारों को ,उस अंतर्द्वंद्व को अपनी लेखनी से काग़ज़ पर उकेरने लगती हूँ । समाज के हर दबे तबके के बारे में लिखना चाहती हूँ ,फिर वह चाहे सदियों से दबे कुचले कोई भी वर्ग हों मेरी लेखनी के माध्यम से विचारधारा में परिवर्तन लाना चाहती हूँ l दिखाई देते या अनदेखे भेदभाव हों ,महिलाओं के साथ होते अन्याय न कहीं मेरे मन में एक क्षुब्ध भाव भर देते हैं | read more...

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