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अब मैं हाउस वाइफ नहीं हूँ…

शादी के बाद, घर साफ न होने पर, खाने में देरी हो जाने पर, कपड़े प्रेस न होने पर, हर बात की मैं जवाबदेह थी, उस पर 'तुम दिन भर करती क्या हो?'

शादी के बाद, घर साफ न होने पर, खाने में देरी हो जाने पर, कपड़े प्रेस न होने पर, हर बात की मैं जवाबदेह थी, उस पर ‘तुम दिन भर करती क्या हो?’

दिन भर के सफर के बाद घर पहुंच कर चैन की सांस ली। तभी शांता ने पानी का गिलास थमाया। पानी पीकर मैं फ्रेश होने चली गई। तभी शांता चाय की ट्रे लेकर आ गई। थकावट के कारण शरीर का अंग अंग दर्द कर रहा था। कुछ देर कमर सीधी करने के लिए बिस्तर पर लेट गई। लेटते ही नींद आ गई।

लगभग दो घंटे बाद बहू ने खाने के लिए उठाया। मेज पर खाना लगा हुआ था। किसी प्रकार हिम्मत करके उठी और थोड़ा बहुत खाना खा कर फिर सो गई। सुबह देेर तक सोती रही। फ्रेश होकर अपने कमरे से बाहर निकली तो शांता ने आकर पूछा, “मम्मी जी! आप चाय लेंगी?”

सुन कर मन गदगद हो गया। अपने घर में सुबह की चाय “हम” हम स्वयं बनाते हैं। मैं ने झट से हां कर दी और वह मिनटों में चाय बना कर ले आई। साथ में बिस्कुट भी थे। इसी प्रकार नाश्ता, दोपहर का भोजन, रात का खाना चलता रहा।  हर बार वह ‘खाने में क्या बनाऊं?’ अवश्य पूछती।

हम औरतों को बिना किसी किच्-किच् के खाना मिल जाए, उस से बढ़ कर कोई बात नहीं होती है।खाने में हम “घी, तेल, मिर्च-मसाला, तली-भुनी चीजें कम ही खाते हैं”, यह उसे पहले दिन ही स्पष्ट कर दिया था।

कुछ दिन बड़े आराम से निकले। फिर धीरे-धीरे ऊब होने लगी। शरीर भी आरामपरस्त हो गया। घर के काम की सारी व्यवस्था स्वयं देखने वाली, हम मध्यवर्गीय परिवारों की स्त्रियों के लिए इस तरह की जीवन शैली कल्पना से परे ही रहती है। पर मन यह सोच कर प्रफुल्लित रहता कि जीवन में जो सुविधाएं उपलब्ध हैं हमें उसका भरपूर आनन्द उठाना चाहिए। आज का समय बीती बातों को सोच कर परेशान होने का नहीं है, वरन जो सहुलतें मिली हैं, उनका आनन्द उठाने का है।

एक दिन शांता कहीं दूसरी जगह व्यस्त थी। हमारी शाम की चाय का समय हो गया था। मैं स्वयं उठकर रसोई में चाय बनाने चली गई। रसोई में खटपट सुन कर वह हाथ का काम छोड़ कर रसोई में आ गई। मुझे चाय बनाता देख, उसने कप में थोड़ा सा दूध निकाल कर दिया और बाकी दूध फ्रिज में रख दिया। इसी प्रकार एक दिन मैं ने ब्रैड-ऑमलेट खाने की इच्छा जाहिर की तो वह प्लेट में थोड़ी सी सॉस परोस कर सॉस की बोतल रसोई में ले गई। वाशिंग मशीन में साबुन डालते समय भी वह पूरी निगरानी करती।

मैंने मन ने सोचा, ‘मेरी बिल्ली , मुझे ही म्याऊं? ये हमारी सुविधा के लिए हैं, हमारे मालिक नहीं।’ फिर बच्चे मेरे भरोसे सब कुछ छोड़ छाड़ कर अपनी अपनी नौकरी पर चले जाते हैं। अब उसकी जगह मैं उसकी निगरानी करने लगी। अपनी इच्छा अनुसार घर का सारा काम करवाने लगी। वह भी घर में अपना और मेरा स्थान समझ गई। धीरे-धीरे हम दोनों में अच्छा तालमेल बैठ गया।

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शांता इस घर की पुरानी कुक (महाराजिन) थी। पहले वह सुबह, दोपहर, शाम का खाना बनाती थी। घर के अन्य कामों मसलन सफाई, बर्तन और कपड़ों की धुलाई के लिए अन्य कर्मचारी थे। मैं लगभग चार महीने बाद यहां आई थी। इस दौरान शांता ने फुल टाइम नौकरी सम्भाल ली है, इसलिए बाकी सब काम वाली बाइयों ने आना बंद कर दिया है। यह सब बातें बहू ने फोन पर ही मुझे बता दी थीं।

पहले शांता को जाने की जल्दी रहती थी क्योंकि उसे दूसरी जगह भी काम करना रहता था इसलिए वह झटपट नाश्ता बना कर चली जाती थी और दोपहर में उसे लंच बना कर निकलने की जल्दी रहती थी। पर अब क्योंकि उसे सारा दिन घर पर ही रहना होता था, इस लिए वह बड़े इत्मीनान से सब को नाश्ता करवाती। फिर घर की सफाई, चौका-बर्तन, कपड़ों की धुलाई आदि में लग जाती थी। फिर दोपहर का भोजन बनाती थी। इसी प्रकार शाम की चाय, नाश्ता सब संभालती थी। यह समझो कि एक घरेलू औरत की सारी जिम्मेदारी वह बखूबी संभालती थी।

वह सब काम पूरी लगन से मन लगाकर खुशी खुशी करती थी। हम पति-पत्नी के खान -पान का विशेष ध्यान रखती थी। मिनी की ऑनलाइन कक्षाएं चल रही थी, इन कक्षाओं के ब्रेक टाइम में वह मिनी को कभी मैगी खिलाती, कभी पास्ता देती और कभी कॉल्ड कॉफी देती थी। उसे परिवार के सब सदस्यों की पसंद-नापसंद का भी पूरा ज्ञान हो गया था। मुझे उस की कार्य कुशलता पर बहुत आश्चर्य होता था।

बच्चे अपने कार्य स्थल पर व्यस्त रहते थे, उनकी व्यस्त दिनचर्या में हमारे लिए समय ही नहीं होता था और मिनी अपनी ऑनलाइन कक्षाओं और गृह कार्य में व्यस्त रहती थी। ऐसे में एक शांता ही थी जिससे बातचीत में अपने को उलझाए रखने का प्रयास करती थी मैं। बातचीत में भी वह बहुत ही नम्र और सुशील थी। एक दिन बातों ही बातों में मैंने उससे पूछा, “शांता! तुमने खाना बनाने का काम कब से शुरू किया है?”

बस मेरा इतना पूछना ही काफी था। मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैंने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो ।

“क्या बताऊं मम्मी जी! (वह मुझे मम्मी जी कह कर ही सम्बोधित करती थी ) शादी के बाद घर साफ न होने पर, खाने में जरा सी भी देरी हो जाने पर, कपड़े प्रेस न होने पर, यानि हर बात की मैं जवाबदेह थी। उस पर ‘तुम दिन भर करती क्या हो?’ सुन-सुन कर मैं परेशान हो गई थी। मेरी पहचान मात्र हाउस वाइफ बन कर रह गई थी।

धीरे-धीरे बच्चों की आंखों में भी मैं अवज्ञा के भाव देख रही थी। उन्हीं दिनों पड़ोस में एक नवयुवक नौकरी करने आ गया। खाने की कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण उसने मुझसे खाना बनाने के लिए गुजारिश की। मैंने भी ‘घर में पूरे परिवार के लिए खाना बनता ही है’ यह सोच कर हामी भर दी और उसके लिए टिफिन तैयार करने लगी।

आज कल बच्चे घर से पढ़ाई या नौकरी के लिए निकल तो पड़ते हैं, उनके लिए खाने की समस्या बनी रहती है। अक्सर बाहर का खाना उन्हें हजम नहीं होता है। इस लिए घर के बने साफ सुथरे खाने के लालच में उसके दो तीन साथियों ने भी टिफिन की सिफारिश की। घर के पास ही एक महिला कुकरी क्लासें चलाती थी। तरह तरह के पकवान बनाने का मुझे बचपन से शौक था। इस लिए दोपहर में मैंने वहां जाना शुरू कर दिया। बच्चे भी अब तक बड़े हो गए थे।”

कुछ क्षण रुक कर वह फिर कहने लगी, “मम्मी जी! आज कल अधिकतर कामकाजी महिलाओं के पास खाना बनाने के लिए समय ही नहीं होता है। इस लिए घर आकर खाना बनाने के लिए मुझे आफर आने लगे। ‘न राशन पानी की चिंता और न ही सब्जी भाजी का फिक्र’, यह सोच कर मैंने हामी भर दी। अब जो मालिक लोग कहते हैं बना कर दे देती थी।

इन्हीं दिनों आप के परिवार से फुलटाइम मेड की आफर आ गई। मैंने सोचा जगह जगह घूमने से अच्छा है, एक ही घर में काम करूं। मम्मी जी! खाने में सब की पसंद अलग अलग होती है। किसी को मिर्च-मसाला तीखा, तला भुना खाना पसंद है और किसी को सीधा सादा भोजन। जितने घर, उतनी पसंद।

कई घरों में काम करने से कई बार गड़बड़ हो जाती थी। कभी कभी देर सबेर हो जाती थी। उस पर सब की बातें सुनो। खाना बनाना भी एक कला है। सब काम बड़े मनोयोग से करना पड़ता है, जरा सा भी मन विचलित हुआ, ध्यान इधर उधर भटका नहीं कि सब करा धरा रह जाता है। फिर अब बच्चे भी बड़े हो गए थे। इस लिए मैंने आपके घर का काम पकड़ लिया। मेरी इधर-उधर की भाग दौड़ खत्म हो गई है। अब घर में चार पैसे आने लगे हैं, तो घर के सब सदस्य भी सुबह शाम घर के काम में हाथ बटाने लगे हैं। मैं भी बच्चों पर आराम से खर्च कर सकती हूं।

मम्मी जी! कभी कभी मैं सोचती हूं कि दिन भर घर में खटने वाली महिलाओं को कोई इज्जत नहीं देता, न घर न समाज। पर वही महिलाएं जब घर से बाहर निकलती हैं, एकाएक लोगों की नजर में उसकी इज्जत बढ़ जाती है। उसे अनेकों सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। यह सोच समाज के हर वर्ग की महिलाओं के प्रति होती है, भले ही वह स्कूल में काम करे, आफिस जाए या घर घर चोका-बर्तन करें। इस लिए मेरे जैसी अनगिनत औरतें अपने घर, परिवार, बच्चों की अवहेलना ( इग्नोर ) कर के, मात्र अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए घर से काम पर निकलती हैं, फिर निन्यानवे के फेर में ऐसी फंस जाती हैं कि जीवन पर्यन्त बाहर निकल नहीं पाती हैं।”

कुछ क्षण रुक कर वह फिर कहने लगी, “मम्मी जी! यहां भी तो मैं आम हाउस वाइफ की तरह सारा घर संभालती हूं। पर परिवार वालों की नजर में मैं हाउस वाइफ नहीं वर्किंग वुमन हूं, क्योंकि मैं पैसा कमा कर देती हूं और हाउस वाइफ केवल खर्च कर सकती है, कमा नहीं सकती।”

मैं उसकी बातें सुनकर आश्चर्य चकित सी रह गयी…

मूल चित्र : Still from Gharelu, Hindi Short Film, YouTube 

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