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मैंने अपने लिए दोस्ती का रिश्ता चुना है…

उसने सोचा, "बाक़ी रिश्तों की तरह मैं दोस्ती का ये रिश्ता भी सहेज कर रखूंगी। यही तो एक ऐसा रिश्ता है, जिसे मैंने अपने लिए खुद चुना है।’’

उसने सोचा, “बाक़ी रिश्तों की तरह मैं दोस्ती का ये रिश्ता भी सहेज कर रखूंगी। यही तो एक ऐसा रिश्ता है, जिसे मैंने अपने लिए खुद चुना है।’’

सिया बार-बार घड़ी की ओर देखती फिर कुछ लिखने की कोशिश करने लगती। सुबह से ऐसा ही चल रहा था। आज घर का माहौल कुछ बदला-बदला-सा था। पूरे घर में सिर्फ सिया की लैपटॉप पर टाइपिंग की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

पति और बेटे ने बिना देर लगाए सिया का मूड भांप लिया और दोनों चुपचाप अपने-अपने काम में लग गए।और वे ऐसा करें भी क्यों न? आख़िर घायल शेरनी के सामने जाने की हिम्मत किसमें होती है? एक अप्रत्याशित खबर से आहत सिया का मूड बहुत ख़तरनाक दिख रहा था। 

सिया के ख़राब मूड का कारण था, कल सवेरे उसकी जिगरी दोस्त माही का शहर से बाहर चले जाना। कोविड की तीसरी लहर आने की आशंका देख, माही के ससुराल वालों ने उसके परिवार को कुछ महीनों के लिए वापस बुला लिया था।

एक ही बिल्डिंग में रहने के कारण दोनों सहेलियों का आपस में रोज़ मिलना-जुलना हुआ करता था। बिल्डिंग के बाकी लोग उन दोनों को शोले के जय-वीरू कहा करते थे, जिस पर माही हमेशा कहती कि हम दोनों शोले के जय-वीरू नहीं, बल्कि “क्वीन” मूवी की रानी और विजयलक्ष्मी हैं। फिर दोनों खूब हंसा करती थीं। दोनों की दोस्ती में वो चमक थी, जो हमें अक्सर प्यारे शरारती बच्चों की आँखों में दिखाई देती है। भीड़ में भी सबसे अलग हाव-भाव के साथ दिख जाए, ऐसी थी सिया और माही की दोस्ती।

दोनों ने मिल कर बिल्डिंग टावर का एक “फ्रेंड्स ग्रुप” भी बनाया था। धीरे-धीरे काफ़ी महिलाएं उस ग्रुप से जुड़ गयी थीं। कभी मिल कर, तो कभी व्हाट्सएप मैसेज से अपने सुख दुःख साझा किया करती थीं। बिल्डिंग की महिलाओं केलिए यह बेहद ज़रूरी है कि वे अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए ख़ुद के लिए भी समय निकाल लें । यह गुरु मंत्र सिया का ही था। इसलिए महीने में एक बार सभी महिलाएँ, घर और बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ अपने-अपने परिवारवालों पर छोड़, पूरा दिन “फ्रेंडशिप डे” की तरह मनातीं। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था कि अचानक दुनिया को कोविड नाम के ग्रहण ने ग्रसित कर लिया।  

इस आपातकाल में सभी महिलाएँ अपने घर-परिवार की ज़िम्मेदारियाँ उठाने में व्यस्त होती चली गयीं। व्हाट्सएप ग्रुप पर भी उनका एक-दूसरे से संपर्क कम हो गया । पहले लॉकडाउन के बाद ही  “बिल्डिंग फ्रेंडस ग्रुप” कहीं खो-सा गया। पर, माही और सिया अपने-अपने  घरों में रह कर भी एकदूजे  का सहारा बनी रहीं। व्यस्तता के बावजूद फ़ोन पर ही हालचल पूछ लेना उनकी आदत-सी हो गयी थी। इसी तरह दोनों ने दो लॉकडाउन निकाल दिए। पर, अब माही शहर से जाने वाली थी, जिसका दुःख सिया से सहा नहीं जा रहा था। 

ख्यालों से बाहर निकल सिया ने एक बार फिर घड़ी की ओर देखा और फिर लैपटॉप ज़ोर से बंद कर दिया। सुबह से वो कुछ लिखने का प्रयास कर रही थी लेकिन, क्या मजाल कि एक शब्द भी वह लिख पाए! फिर कुछ समय बीता, और जो अभी-अभी उसने दुबारा काम करना शुरू किया है, वह माही द्वारा लगातार हिम्मत और दबाव दिये जाने के बाद ही। माही ने भी वापस से अपना पुराना ऑफिस ज्वाइन कर लिया था। 

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दोनों ने, माँ बनने के बाद जो काम छोड़े थे, उन्हें फिर से शुरू कर दिया। हालाँकि कोविड ने दोनों सहेलियों को मानसिक रूप से काफी आहत किया था, इसलिए पहले जैसा उत्साह उनमें पैदा ही नहीं हो पा रहा था। हमेशा हंसने बोलने वाली दोनों लड़कियां घर, परिवार, ससुराल और कई तरह की दूसरी समस्याओं के कारण परेशान रहने लगी थीं। दोनों आपस में  जब भी बातें करतीं,  तो कोई-न-कोई दुःख या गुस्से की बातें ही होती थीं।

 एक दिन दोनों ने तय किया कि वो अब अपनी ऊर्जा ऐसी बातों में ज़ाया नहीं करेंगी। वो जानती थीं कि ऐसा तभी होगा, जब उनका ध्यान इन सब बातों से हट कर किसी दूसरे प्रोडक्टिव या पॉज़िटिव काम में लगेगा। इसके लिए उन्हें वापस से अपने करियर की ओर ध्यान देंना होगा। रास्ता आसान नहीं था,  क्योंकि इतने लम्बे ब्रेक के बाद काम मिलना और काम को अच्छे से करना कठिन था। पर, दोनों एक-दूसरे की हिम्मत बन कर फिर से साथ खड़ी रहने की कोशिश में जुटी थीं।

 उन्हें कई बार ऐसा भी लगा कि अब पहले जैसा कुछ नहीं हो पाएगा। घर-परिवार और जॉब हंट के बीच सब कुछ बिखरता जा रहा था, ऐसे में कभी सिया ने, तो कभी माही ने, अच्छे दोस्त की तरह एक-दूसरे को प्रेरित कर आगे बढ़ते रहने की चाहत जगायी। ये तो है, कि जब खुद का भरोसा डगमगाने लगे, तो सच्चे दोस्त ही काम आते हैं। दोनों सहेलियों को वापस करियर की ओर लौटने में बहुत कठिनायों का सामना करना पड़ा।

 सिया अक्सर माही से पूछती, “क्या अपने बच्चे की अच्छी परवरिश करने के लिए काम से ब्रेक लेना गुनाह है ?” टैलेंट होते हुए भी मदरहुड ब्रेक के कारण कंपनीज़ काम नहीं दे रही हैं। यह बात दोनों को परेशान कर रही थी। तब माही ने सिया को उसके टैलेंट का एक छोटा-सा नमूना दिखाने को कहा। सिया माही का इशारा झट से समझ गयी। उसने ट्विटर पर एक ट्वीट लिख डाला और कई लोगों को उसपर टैग कर दिया। कई दिनों तक ट्वीट का सिलसिला ऐसे ही  चलता रहा।

आखिरकार, दोनों दोस्तों की मेहनत रंग लाई। माही को उसकी पुरानी कंपनी में और सिया को एक वेबसाइट में कंटेंट राइटर की जॉब मिल गयी। दोनों ने दिल खोल कर “क्वीन” की रानी और विजयलक्षमी जैसी पार्टी की। 

गुज़ारे हुए कल के ख़्यालों से वर्त्तमान में लौटते ही सिया थोड़ी ठहर-सी गई। कल सुबह माही जा रही है। जाने कब वापस आए! हो सकता है, वापस आए भी न! स्कूल-कॉलेज के कई दोस्त जीवन की आपाधापी में पीछे छूट गए।

“पर अब नहीं!” उसने सोचा, “बाक़ी रिश्तों की तरह मैं दोस्ती का ये रिश्ता भी सहेज कर रखूंगी। यही तो एक ऐसा रिश्ता है, जिसे मैंने अपने लिए खुद चुना है।’’  इसी उधेड़बुन में सिया ने माही को फोनकॉल करके मिलने का प्लान बनाया। रात को सारे काम ख़त्म कर सोसाइटी लॉन में मिलना तय हुआ। 

रात के लगभग १० बज रहे होंगे, जब माही का सिया को कॉल आया। “ कहाँ हो? मैं टावर के नीचे तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ। जल्दी आओ!” कह कर कॉल कट कर दिया।

सिया, “बस आ रही हूँ” कह कर अपने घर से लिफ्ट की ओर बढ़ चली। नीचे पहुँच लिफ्ट का दरवाज़ा जैसे ही खुला, माही सिया की ओर बढ़ी। तभी उसने सिया के हाथों में दो कॉफ़ी-मग देखे। फ़िल्टर कॉफ़ी की खुशबू महसूस करते ही माही ऐसे खुश हो गयी, जैसे सावन में बादल देख मोरनी। एक-दूसरे को देख कर उनकी आँखे रात में चमकते जुगनू की तरह चमकने लगी थीं।

हाथों में कॉफ़ी-मग लिए ही दोनों सोसाइटी लॉन की तरफ बढ़ी। बिछड़ने का ग़म न जाने कहाँ पीछे रह गया और दोनों ने जी भर एक-दूसरे से बातें कीं।

“हमें हमेशा पास-पास रह कर रिश्ते निभाने की जगह रिश्तों को ऐसे मिलते-बिछड़ते हुए भी भरपूर जीने जैसे मौक़े मिलते रहें, तो फिर क्या ग़म है?” कह कर माही हंसने लगीं।

सिया ने माही के साथ हँसते हुए एक सेल्फ़ी ली और वापस अपने-अपने घर चलने की बात कही। यानी दूर रह कर भी एक-दूसरे के दुख-सुख बाँटते रहने का अनकहा वादा लिए दोनों अपने-अपने रास्ते चलने का मन बना चुकी थी।

माही अपने घर आ कर भविष्य में भी सिया के साथ ऐसी कई शामों के सपने बुनने लगी और उधर सिया भी सहज होने की कोशिश में अपनी नयी कहानी का प्लॉट सोचने लगी। तभी सिया के एक पसंदीदा गाने के बोल उसकी यादों में उभर आए…

“कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते, कहीं से निकल आए जन्मों के नाते….’’  सिया को लगा जैसे जीवन का यह सच उसे सुकून दे रहा है।

मूल चित्र : Still from The Married Woman, Zee5 (for representational purpose only)

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Ashlesha Thakur

Ashlesha Thakur started her foray into the world of media at the age of 7 as a child artist on All India Radio. After finishing read more...

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