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अपनी किस्मत के साथ ऐसा समझौता मुझे मंज़ूर था…

पिता का भी अभी पंद्रह दिन पहले देहांत हुआ था, कार एक्सीडेंट में। जिस कार से एक्सीडेंट हुआ वो सेठ रत्नदास की थी जो कि आज निशा के ससुर थे। 

पिता का भी अभी पंद्रह दिन पहले देहांत हुआ था, कार एक्सीडेंट में। जिस कार से एक्सीडेंट हुआ वो सेठ रत्नदास की थी जो कि आज निशा के ससुर थे। 

निशा को आज भी याद है वो दिन जब वो बहू बन इस घर में आयी थी।

इतना विशाल घर, घर के बाहर एक बगीचा था जिसमे आम और जामुन के पेड़ थे किनारो पर और बीच में गुलाब, चमेली और कनेर के फूलों से भरी बगिया। संगमरमर की बनी पूरी ईमारत थी और अंदर घर में प्रवेश करते ही जगमगता हुआ बड़ा सा झूमर।

ज्यों ही घर की दहलीज़ पर निशा आयी उसकी सास ने नये जोड़े की आरती उतारी और घर के अंदर दोनों को ख़ुशी ख़ुशी ले गई। निशा को तो अपनी किस्मत पर विश्वास ही ना हुआ, कहा वो एक अनाथ गरीब लड़की और आज यहाँ महल में बहू बनकर आयी थी।

निशा की माँ उसके बचपन में ही चल बसी थी, पिता का भी अभी पंद्रह दिन पहले देहांत हुआ था, कार एक्सीडेंट में। जिस कार से एक्सीडेंट हुआ वो किसी और की नहीं बल्कि सेठ रत्नदास की थी जोकि आज निशा के ससुर थे।

निशा के घायल पिता को सेठ रत्नदास हॉस्पिटल ले गये, पर बचा ना सके। मरने से पहले निशा के पिता ने उसकी जिम्मेदारी सेठजी को दे दी। सेठजी ने कुछ सोचा और निशा से अपने छोटे बेटे की शादी तय कर दी। निशा के पास सहमति के अलावा कोई और रास्ता भी नहीं था।

निशा की ससुराल में उसके सास, ससुर, एक बड़े जेठ, जो कि कुंवारे थे और निशा के पति अजय थे। घर में बहुत सारे नौकर थे तो निशा को कुछ खास काम भी नहीं था।

निशा अपनी किस्मत की रोज़ तारीफ करती और अपने ससुराल में धीरे धीरे घुलने मिलने लगी।
पूरा घर उसे छोटी बहू कह पुकारता। सब अच्छा था बस कभी कभी निशा के मन में सवाल आता कि उसके ससुरजी ने उनके बड़े बेटे उमेश के विवाह से भी पहले छोटे बेटे अजय का विवाह क्यूँ कर लिया?

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आज तीन महीने बाद निशा ने घर के दो नौकरो को बात करते सुना, “भला हो सेठजी का जो उन्हें ये अनाथ लड़की मिल गई वरना ऐसे बीमार लड़के से भला कौन शादी करता जिसके जीवन में मात्र दो या तीन साल ही बचे हो?”

निशा के पैरो तले ज़मीन खिसक गई, उसकी किस्मत पर ग्रहण लग चुका था। उसको शायद आज अपने सवाल का भी जवाब मिल गया था क़ि छोटे लड़के की शादी पहले क्यूँ की उसके ससुर जी ने?

पूरे दिन निशा ने अपने आवेश को संभाला और खुद को समझाया की अगर उसके ससुर इतनी मदद ना करते तो उसका क्या होता, वो आज यहाँ सुरक्षित है और ज़माने की सभी सुख सुविधाएं उसके पास है। कहीं ना कहीं निशा ने अपनी किस्मत से समझौता कर लिया।

शाम को अपने कमरे की खिड़की से देखा तो उसके ससुर नीचे बगीचे में टहल रहे थे। बस निशा ने सोचा यहीं सही समय है इस बात की पुख्ता जानकारी जुटाने के लिये।

बगीचे में पहुंचकर निशा ने अपने ससुर से कहा, “प्रणाम, पिताजी। आज मुझे अजय जी की बीमारी के बारे में कुछ पता चला है, क्या ये सच है?”

आज पहली बार निशा ने अपने ससुरजी से बात की थी। सेठजी समझ गये सब बात, उनको उम्मीद थी कि पता तो निशा को एक दिन लगना ही था पर इतना जल्दी, उम्मीद ना थी। खैर, स्तिथि को सँभालते हुए सेठजी बोले, “हां, निशा जो तुम्हे आज अजय के बारे में पता चला है वो सच है। अजय के पास बस दो साल शेष हैं। मैंने अपने स्वार्थ के चलते ही तुम्हारी शादी अजय से करवाई थी। एक पिता होने के नाते मै चाहता था कि मेरा बेटा इस दुनिया से जाने से पहले अपनी ग्रहस्थी बसा ले।

शायद तुम्हारे साथ धोखा हुआ है बहू, पर मुझे क्षमा कर दो। अजय नहीं रहेगा, पर उसकी निशानी के रूप में जो भी बच्चा होगा उसके सहारे मै अपना जीवन बिता लूंगा। बहू, बस मुझे एक बच्चा दे दो और फिर तुम हमें छोड़ कर भी जाना चाहो तो चली जाना। मैं तुम्हारी दूसरी शादी करवा दूंगा और बहुत सारी आर्थिक मदद भी करूँगा।”

इतना बोल सेठजी रुआंसू हो गये।

निशा ने कुछ देर सोचा और बोली, “शायद एक पिता होने के नाते आपने जो किया वो सही ही किया है। मेरे जैसी अनाथ, गरीब लड़की का ऐसे बड़े घर में रहना ही बहुत सौभाग्य की बात है। मैं कोशिश करुँगी कि मै आपको जल्द ही इस घर का चिराग, अजय की निशानी दे पाऊँ और मुझे कोई दूसरी शादी की तमन्ना नहीं है। मैं, इस घर की छोटी बहू के रूप में आपकी और माँ जी की सेवा करना चाहूंगी।”

निशा भी अपने आँसू रोक ना पायी।

आज निशा ने सेठजी का दिल जीत लिया और उन्हें लगा कि निशा जैसी लड़की को इस घर की बहू बना उन्होंने कोई गलती नहीं की, सेठजी अपनी किस्मत पर खुश हो रहे थे।

मूल चित्र : Still from Short Film The Wedding Saree, YouTube

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