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एक साथ कई सवालों का जवाब है शेरनी फ़िल्म की यह तस्वीर

स्त्री विमर्श में जिसको सिस्टरहुड, एक महिला का दूसरी महिला पर भरोसा, कहा जाता है, उसकी सहज अभिव्यक्ति है शेरनी फ़िल्म की यह तस्वीर।

स्त्री विमर्श में जिसको सिस्टरहुड, एक महिला का दूसरी महिला पर भरोसा, कहा जाता है, उसकी सहज अभिव्यक्ति है शेरनी फ़िल्म की यह तस्वीर।

नागेश कूकनूर के फिल्म डोर और उससे पहले चंदप्रकाश द्विवेदी की  पिंजर के बहुत दिनों के बाद अमित मसुरकर ने अपनी फिल्म शेरनी में दो महिलायें आपस में एक-दूसरे हाथ केवल उन्मुक्त भाव से पकड़ते हुई ही नहीं दिखी, बल्कि एक-दूसरे को बांहों में भी भर लिया।

एक महिला का दूसरी महिला पर भरोसा, दोनों महिलाओं का मानवीय संवेदना के एक ही धरातल पर खड़ा होना, जबकि दोनों का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक इसके बदले दूसरे शब्द का सहारा लूं तो वर्गीय चरित्र एक-दूसरे से अलग है।

एक सकून सा दे गई यह तस्वीर जो हिंदी फिल्मों के कहानी में आज कल कहीं खो गई है। एक-साथ कई सवालों का जवाब देती हुई नज़र आती है ये तस्वीर, जिसकी तलाश आधी-आबादी के दुनियों को लंबे समय से रही है।

क्यों खास है यह तस्वीर

फिल्मों में ही नहीं, हमारे सामाजिक जीवन में भी एक महिला दूसरी महिला से मिलकर एक-दूसरे से लिपटकर रोती हुई अक्सर दिख जाती है, भले ही उनके बीच का वर्गीय धरातल अलग-अलग हो, पर संवेदनाओं का धरातल एक हो जाता है। एक-दूसरे के करीब आती हुई दो महिलाएं भी दिख जाती है जो अलग-अलग तरीके से एक-दूसरे के प्रति हमदर्दी रखती है।

संवेदना के एक ही धरातल पर दो महिलाओं के लिए एक ही साझी जमीन तैयार कर दोनों का एक-दूसरे के प्रति विश्वास भाव का निमार्ण अमित मसुरकर ने अपनी फिल्म शेरनी में जो किया है, जो हिंदी फिल्मों में लंबे समय तक गायब रहा है।

गोया, इस शब्द के निहितार्थ को सर के बल बराबर खड़ा किया जाता रहा है कि औरतें ही औरतों की दुश्मन होती हैं…

एक साथ कई सवालों का जवाब है शेरनी फ़िल्म की यह तस्वीर

शेरनी फ़िल्म में वन विभाग अधिकारी विद्या (विद्या बालन) और मध्यप्रदेश के एक गाँव की समिति की सदस्य ज्योति (सम्पा मंडल) का एक-दूसरे का हाथ पकड़ना और एक-दूसरे को गले लगाने का दृश्य उन दर्जनों हिंदी फिल्मों और सैकड़ों टीवी सीरियलों को जवाब है जिसको महिलाओं के विरुद्ध दशकों से गढा जा रहा है।

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जहां दो स्त्री के बीच छल-कपट, एक-दूसरे के मर्द को हथिया लेने, संपत्ति हड़प लेने, जादू-टोना करके, घर-परिवार तोड़ देनेवाली के रूप में दिखाई जाती है। यह दृश्य वह है जहां एक महिला सृजनशीलता के संकट और सौन्दर्य, सहेजे जाने की जरूरत और चुनौतियों के बीच बिना किसी भारी-भरकम लफ्ज़ाजी के मजबूती से खड़ी होती है, जैसे उसकी प्रकृत्ति इसलिए ही बनी हो।

क्यों महत्वपूर्ण बन गई है यह तस्वीर

सिनेमा से अलग हमारी वास्तविक दुनिया में हम सभी जानते है कि आधी-आबादी की पूरी दुनिया स्त्री-पुरुष के लैंगिक विभाजन के साथ-साथ कई तरह के अस्मिताओं और पहचान की राजनीति के बीच बंटी हुई है। आधी-आबादी की पूरी दुनिया का कई तरह का वर्गीय विभाजन के जरूरत को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि वह बेवज़ह नहीं है।

परंतु, कई तरह के अपने अधिकारों से वंचित आधी-आबादी के समाज को संवेदना के एक धरातल पर खड़ा करके, उनकी समस्या को सुलझाने का प्रयास तो किया जा सकता है। अमित मसुरकर ने अपनी फिल्म शेरनी में यह करके दिखाया है जो इस कहानी का सबसे खूबसूरत पक्ष है।

निर्देशक अमित मसुरकर ने आधी आबादी के बीच मौजूद वर्गीय असमानता के खाई या उसके विभाजन को एक दृश्य के माध्यम से पाटने की कोशिश करते है, और उसमें कामयाब भी हो जाते है।

शेरनी फ़िल्म में वन विभाग अधिकारी विद्या (विद्या बालन) और मध्यप्रदेश के एक गांव की समिति की सदस्य ज्योति (सम्पा मंडल) की यह तस्वीर आने वाले समय में इस बात के लिए याद की जानी चाहिए कि महिलाओं के बीच भले कई बातों को लेकर मतभिन्नता है। परंतु, उनके बीच स्त्री संवेदना का एक मजबूत धरातल भी मौजूद है जहां वह एक है।

विद्या एक तेजतरार्र आत्मनिर्भर महिला है। उसकी सास और मां की विद्या के संतान प्राप्त करने की कामना उसे वही लाकर खड़ा कर देती है जिसको आधी-आबादी के हर महिला की नियति मान लिया गया है। पूरी दुनिया महिलाओं में बस बच्चेदानी खोजती ही नहीं रहती है अगर महिला बच्चे पैदा करती है या नहीं करती है उसकी एक अलग ही बायनरी भी तैयार करती है।

विद्या के ऊपर शेरनी और उसके बच्चे को बचाने की कोशिश और वात्सल्य इतना भारी पड़ता है कि वह बहुत साफ शब्दों में कहती है कि, “मुझे नहीं करना है बच्चे..”

दूसरी तरफ दिनभर अपनी घर-गृहस्थी में फंसी ज्योति जब हाथ खींचकर वन विभाग अधिकारी विद्या को चढ़ाई पार कराते हुए शेरनी के दोनों बच्चों के आगे खड़ा करती हैं तो एक साथ महिलाओं से जुड़े कई सवालों का जवाब भी तैयार कर देती है।

साथ ही साथ हजारों लोगों का भ्रम एक झटके में टूट जाता है जो ये मानते है कि चूल्हा फूंकनेवाली स्त्री को देश-दुनिया, समाज से कुछ भी लेना-देना नहीं है। खासकर तब जब एक दृश्य में ज्योंति, विद्या को यह भरोसा देती है…हम शेर और उसके बच्चे को मारने का इल्जाम अपने ऊपर नहीं आने देगी।

स्त्री विमर्श के शब्दावली मे जिसको सिस्टरहुड कहा जाता है उसकी सहज अभिव्यक्ति है शेरनी फ़िल्म की यह तस्वीर।

मूल चित्र: Still from movie Sherni 

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