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विक्टिम ब्लेमिंग : सर्वाइवर सवालों के कटघरे में हाज़िर हो…

सबसे पहले सर्वाइवर सवालों के कटघरे में हाज़िर हो...और शुरू होता है हमारे समाज का विक्टिम ब्लेमिंग का खेल जिसमें परिवार वाले भी शामिल हैं...

सबसे पहले सर्वाइवर सवालों के कटघरे में हाज़िर हो…और शुरू होता है हमारे समाज का विक्टिम ब्लेमिंग का खेल जिसमें परिवार वाले भी शामिल हैं…

कभी कभी आपके आसपास कुछ ऐसी घटनाएं घटित होती हैं जो आपको अंदर तक हिलाकर रख देती हैं और आपको सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि क्या सच मे हम एक आधुनिक सभ्य समाज का हिस्सा हैं?

जो सोचने पर मजबूर करती है कि कोई इतनी अमानवीय हरकतें कैसे कर सकता है? और क्यों एक सरवाइवर को ही हर तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है? क्यों समाज उसके बेगुनाह होने पर भी उसके साथ गुनहगारों की तरह व्यवहार करता है? 

एक ऐसी ही घटना का जिक्र मैं इस कहानी के माध्यम से कर के बताना चाहूँगी।

एक बीस साल की लड़की पर कॉलेज जाते समय उसके ही गली में रहने वाले कुछ मनचले लड़के हर रोज अभद्र टिप्पणी करते थे।

एक दिन जब लड़की ने इसका विरोध किया तो उन लड़कों ने उसको धमकी दी कि अगर उसने उन लड़कों की बात नहीं मानी तो अंजाम बहुत बुरा होगा।

लड़की ने ये बात अपने घर वालो को बतायी, तो परिवार ने उसका कॉलेज जाना ही बंद करा दिया।और जब इस बात की शिकायत लड़के के घरवालों से की गई तो उन्होंने लड़की को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया।

परिवार ने भी सामाजिक लोक लाज के चलते कोई लिखित शिकायत दर्ज नहीं करायी।

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विक्टिम ब्लेमिंग यही है 

“अब आप साबित करें कि आपने दोषी को अपने साथ गलत करने के लिए उकसाया नहीं…”

इस कहानी में लड़की के साथ किया गया व्यवहार कोई पहला या आखिरी नहीं है, बल्कि अधिकतर मामलों में विक्टिम के साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाता है। जब भी किसी लड़की का रेप होता है, या किसी महिला का तलाक होता है, या कोई अन्य अपराध तो समाज उसका पहला दोष महिला पर ही लगता है। हर बार उंगली उस महिला पर ही उठाई जाती है।

ना जाने क्या क्या हर रोज ताने सुनने पड़ते हैं एक सरवाइवर को

घर के अंदर परिवार या रिश्तेदारी के कुछ सदस्य या समाज के लोग महिला के चरित्र पर तुरंत उंगली उठाते हुए कहते है, “अरे! ये तो होना ही था कपड़े देखे कितने टाइट पहनती है। आधी रात को अकेली घूमने की क्या जरूरत थी? बड़ा मॉडर्न बन रही थी ये तो होना ही था। पहले तो छोटे कपड़े पहनकर घर से निकलेंगी फिर कहेंगी लड़कों ने ऐसा कह दिया या कर दिया, अरे भई छोटे कपड़े पहनोगी तो यही होगा ना।”

“क्या हुआ जो पति ने दो थप्पड़ लगा दिए तो, खिलाता भी तो वही है ना। गाली ही तो दी थी मारा तो नहीं था ना, इतना क्या जरूरत थी बात का बतंगड़ बनाने की? आजकल औरतों का दिमाग कुछ ज्यादा ही खराब रहता है।” और भी ना जाने क्या क्या हर रोज ताने सुनने पड़ते है एक सरवाइवर को।

दोष बस और बस सर्वाइवर का ही क्यों 

समाज का ये कैसा दोहरचरित्र है, जिसमें अपने घर की महिला को लोग इज्जत देते हैं और दूसरे घर की महिला को लोग आइटम और माल कहकर पुकारते हैं। क्यों किसी की बेटी को दहेज के लालच में जला दिया जाता है, उसके साथ पति और ससुराल के बाकी सदस्यों द्वारा मारपीट की जाती है। लेकिन जब महिला इसका विरोध करती हैं तो उसको कुलटा और चरित्रहीन कहा जाता है।

गुनहगार ना होते हुए भी महिला के साथ जीते जी गुनहगारों जैसा बर्ताव किया जाता है। और अगर इस तरह की दुर्घटनाओं से उसकी मृत्यु हो जाती है तो कैंडल मार्च निकाला जाता है, धरने दिए जाते आखिर क्यों? क्यों नही उसकी बात को सच स्वीकार कर सम्मानित तरीके से समाज मे जीने का हक दिया जाता।

औरत या बंधुआ मज़दूर? 

सवाल कई हैं लेकिन जवाब सिर्फ एक, और वो है की इस पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के प्रति पुरुषों की बनाई गई सोच और रूपरेखा। महिला के दोषी ना होते हुए भी उसे ही सबकी बातें सुननी पड़ती है।

क्यों समाज एक महिला को स्वतंत्र रूप से उसको पसंद के खाने, पहनने और जीने का अधिकार नही देता। क्यों उसको बंधुआ मजदूर जैसे जीवन यापन के लिए मजबूर किया जाता है?

समाज तो समाज, घर के लोग भी कम नहीं 

सर्वाइवर महिला को ये बातें सिर्फ समाज से ही नहीं कभी कभी घर के लोगों से भी सुनने को मिलती हैं। और इन्ही सब कारणों से कई बार महिला हर जुल्म सह कर भी चुप रहती है। और किसी से कुछ भी नहीं कहती। यानि विक्टिम ब्लेमिंग आम है। 

दूसरी हमारी न्यायिक व्यवस्था, जिसमें इतने नियम और क़ानून  महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए तो गए लेकिन उनको सुचारू रूप से लागू नहीं किया जाता और कुछ कानूनी अधिकार तो आज भी महिलायें जानती ही नहीं। कभी कभी ये प्रक्रिया इतनी लंबी और जुझारू हो जाती है कि सरवाइवर ज़िंदा ही नही रह पाती उस न्याय को देखने के लिए।

अरे! ये बातें पुराने ज़माने की हैं 

आजकल समान्यतः कुछ लोग बड़ी आसानी से कह देते है कि अब ऐसा कहाँ होता है? अब कोई महिला बेचारी नहीं, किसी महिला पर जुल्म नहीं होता, ये सब सिर्फ मनगढ़ंत बातें हैं, लोग फेमिनिज्म के नाम पर कुछ भी लिखते बोलते हैं।

लेकिन क्या वाकई कुछ बदला है? क्या सच में महिलाओं के साथ होने वाले जुर्म बंद हो गए हैं? तो जवाब है नहीं।

आज के आधुनिक युग मे भी महिलाओं के साथ जुर्म कम नहीं हुए, आज भी एक दो साल की बच्ची से लेकर अस्सी साल तक कि बुजुर्ग महिला के साथ रेप और मारपीट जैसे अपराध होते है। कुछ मामले कानूनी दस्तावेजों में दर्ज होते है, कुछ लोक-लाज के डर से दर्ज ही नहीं कराए जाते।

सबसे आसान है विक्टिम ब्लेमिंग 

मैं पूछना चाहती हूँ उन लोगों से जो विक्टिम ब्लेमिंग करते हैं और सरवाइवर को ही दोष देते हैं, क्या दोष होता है उन बच्चियों का जो खिलौनों से खेलने की उम्र में रेप जैसे भयावह अपराध का शिकार हो जाती है? या उस उम्रदराज महिला का जिसके साथ ये सब अपराध होते हैं? क्या ये दोष उनके कपड़ों, चाल-ढाल का है?

ये दोष उन अपराधियों का है जो ऐसे अपराध करते हैं

अधिकतर लोगों को कहते हुए सुना है कि “अरे बेचारी महिला की इज्ज़त लूट गयी…” तो मैं यहाँ एक बात कहना चाहूंगी, कि अब समाज को अपना नजरिया और सोच बदलने की जरूरत है।महिलाओं की इज्ज़त को उसके वजाइना से ना जोड़ा जाए। 

इज्जत उसकी नहीं लुटती जिसके साथ रेप हुआ है, इज्जत तो उस अपराधी व्यक्ति की लुटती है जो इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते हैं। वो इज्जत लुटाते हैं, सरेआम अपने माता-पिता द्वारा किये गए परवरिश और संस्कारो की, अपने परिवार के परिवेश और सभ्यता की। जो अपनी घृणित सोच से समाज को ये दिखाते हैं कि उन्हें कभी महिलाओं की इज्ज़त करना सिखाया ही नहीं गया।

कहावत है कि, “एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है।” ठीक ऐसे ही, ऐसे अपराध करने वाला व्यक्ति पूरे समाज में गंदगी फैला देता है, जिससे प्रभावित लोगो को पूरे समाज को उसी नजरिये से देखने लगते हैं।

अब जरूरत है विक्टिम ब्लेमिंग करने की अपराध साबित होने पर ऐसे अपराधियों का सामाजिक और पारिवारिक बहिष्कार किया जाए। 

 

मूल चित्र: Still from Movie Pink

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