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वेब सीरीज़ रामयुग रामायण को एक नई रोशनी में पेश करती है!

Posted: मई 11, 2021

रामयुग की सीता कहीं भी कभी भी अश्रु नहीं बहातीं। वे अपने पति श्री राम चन्द्र जी को नाम लेकर सम्बोधित करती हैं, स्वामी या आर्यपुत्र कहकर नहीं।

भारतीय समाज में प्रत्येक व्यक्ति रामकथा से भली भाँति परिचित है क्योंकि उसे बचपन से ही श्री राम और सीता की कहानी घुट्टी की तरह पिलाई गई है। इस समाज में प्रत्येक पुरुष को  मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा  प्रत्येक स्त्री को माँ सीता के चरित्र को अपने जीवन में उतारने की शिक्षा दी जाती है।

श्री राम युगों युगों से हमारी आस्था का केन्द्र रहे हैं। रामकथा के ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते क्योंकि श्री राम इतिहास से परे हैं और श्री राम व सीता जैसे पौराणिक पात्रों को हमने उतना ही समझा है अथवा उतना ही जाना है जितना कि महर्षि वाल्मीकि की रामायण तथा गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस में लिख गया।

कल एक मित्र की सलाह पर मैक्स प्लेयर पर उपलब्ध वेब सिरीज़ “रामयुग” देखी। आठ कड़ियों की इस सिरीज़ में रामकथा को लघु रूप में में समेटा गया है।

रामयुग : रामकथा को आज के संदर्भ में कहने  का एक प्रयास

रामयुग में केवल रामकथा के महत्वपूर्ण पड़ावों को ही दिखाया गया है।

वेब सिरीज़ का आरम्भ होता है सीता हरण से और अंत श्री राम के राज्याभिषेक से। फ़्लैशबैक में सीता हरण से पूर्व की कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ समेटी गई हैं।

निर्देशक कुणाल कोहली ने रामकथा को आज के संदर्भ में प्रदर्शित करने का प्रयास किया है। इसके लिए उन्होंने लीक से हटकर कई परिवर्तन किये हैं।

लीक से हटकर कई परिवर्तन किये हैं

यहाँ वनवास काट रहे राम और लक्ष्मण लम्बे बालों वाले जटाधारी नहीं हैं अपितु अच्छी सुन्दर हेयरस्टाइल वाले नवयुवक हैं जिन्होंने विराट कोहली स्टाइल की दाढ़ी भी बढ़ा रखी है। जिन्हें श्री राम के रूप में मुस्कुराहट चिपकाए अरुण गोविल पसंद हैं उन्हें घोर निराशा हो सकती है।

श्री हनुमान, सुग्रीव या वानर सेना किसी का भी कपि मुख नहीं है। उनके चेहरे साधारण पुरुषों जैसे ही रखे गये हैं

यहाँ की मंथरा कुरूप कुबड़ी दासी नहीं अपितु एक अत्यन्त सुन्दर महिला है। जिन्हें रामानन्द सागर वाली रामायण की मंथरा(ललिता पवार जी) याद होंगी उन्हें तो रामयुग की मंथरा पर विश्वास कर पाना बहुत कठिन होगा।

हाँ, रावण सेना के राक्षस भी साधारण मनुष्यों जैसे ही दिखते हैं काले, मोटे या सींगधारी नहीं।

रामयुग में कहीं भी महलों के राज प्रासादों के भव्य सेट्स नहीं हैं। यहाँ तक कि तीनों लोकों के स्वामी लंकेश रावण का सिंहासन भी एक पत्थर के चबूतरे पर बना हुआ ही दिखाया गया है।

पूरी आठ कड़ियों की श्रृंखला में कहीं भी शत्रुघ्न, सुमित्रा, जामवन्त व ऐसे ही अनेक पात्रों को नहीं दिखाया गया है।

सीता जी का चरित्र अधिक सशक्त

रामयुग में सीता जी का चरित्र अधिक स्ट्रांग दिखाया गया है, वैसा नहीं जैसा हमने रामानन्द सागर वाली सीता जी (दीपिका चिखलिया) का देखा था।

रामयुग की सीता कहीं भी कभी भी अश्रु नहीं बहातीं। वे अपने पति श्री राम चन्द्र जी को नाम लेकर सम्बोधित करती हैं, स्वामी या आर्यपुत्र कहकर नहीं। यह निर्देशक की आधुनिक व सकारात्मक सोच को दर्शाता है।


रामयुग के ग़ज़ब के डायलॉग्स

एक और बात जो रामयुग में अत्यन्त प्रभावित करती है, वह है इसके डायलॉग्स। रामयुग के स्क्रीनप्ले और डायलॉग राइटर कमलेश पांडे ने ग़ज़ब के डायलॉग्स लिखे हैं हालाँकि एक दो स्थानों पर थोड़ी सी हिन्दी की त्रुटियाँ हैं परन्तु वे डायलॉग्स के प्रभाव को कम नहीं कर पातीं।

अंतिम कड़ी में राम और रावण के बीच का संवाद अत्यन्त प्रभावी बन पड़ा है। हाँ, सीता जी की अग्निपरीक्षा की व्याख्या करने में निर्देशक चूक गए हैं।

डायलॉग्स के अतिरिक्त एक और चीज़ जो अत्यन्त प्रभावित करती है वह है अमिताभ बच्चन द्वारा गाई गई हनुमान चालीसा और पार्श्व में बजता तबला। तबले की थाप के बीच हनुमान चालीसा मन में नई स्फूर्ति का संचार करती है।

राहुल शर्मा द्वारा दिया गया संगीत भी अत्यन्त प्रभावी है।

राम और रावण मानव विचार हैं

रामयुग के अनुसार राम और रावण दो पौराणिक पात्र नहीं अपितु मानव के विचार हैं। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर राम व रावण दोनों उपस्थित रहते हैं जिसमें रामत्व को जगाना उसका कर्तव्य होता है।

जिन्हें श्री राम की कथा को नये तरीक़े से और आज आधुनिक युग के संदर्भ में समझने में रुचि हो, भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों हैं? यह जानने में रुचि हो, वे रामयुग अवश्य देखें।

परन्तु जिन्हें युगों से चली आ रही पुरानी लकीर पीटने में, श्री राम को लेकर अपनी रूढ़िवादी सोच को ही पोषित करने में या रामभक्ति को राजनीतिक चश्में से देखने में रुचि हो उन्हें निराशा हाथ लग सकती है।

नोट : मैक्स प्लेयर की ऐप पर इसका प्रसारण नि:शुल्क है

मूल चित्र: Still from Ramyug, YouTube  

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