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माँ तुम कितना झूठ बोलती हो…

अपने हिस्से का खाना भी बच्चों को खिलाकर, मेरी भूख मर गयी कहती हो। बच्चों को खाते देख कितनी तुम खुश होती हो, माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।

अपने हिस्से का खाना भी बच्चों को खिलाकर, मेरी भूख मर गयी कहती हो। बच्चों को खाते देख कितनी तुम खुश होती हो, माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।

माँ तुम कितना झूठ बोलती हो
हाँ माँ तुम कितना झूठ बोलती हो। 

बुखार में तपती भी होती हो, 
पर फिर भी काम करती रहती हो। 
कहाँ है बुखार कहके हमसे, 
माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।

परदे बंद करके रोशनी ढक के,
हमें आराम से सुला देती हो।
सो जा अभी सुबह नहीं हुई है कहके,
माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।

अपने हिस्से का खाना भी बच्चों को खिलाकर
मेरी भूख मर गयी कहती हो।
बच्चों को खाते देख कितनी तुम खुश होती हो,
माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।

कुछ नहीं रखा है बोल के मुझ से,
बैग में मेरी पसंद का सामान तुम रख देती हो।
कितनी भी मोटी हो जाऊ कमजोर ही तुम बोलती हो, 
माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।

मेरी हर बात पर खुश हो जाती हो,
फेल होने पर भी पास तुम बताती हो।
तारीफ़ ज़माने में मेरी कर के जो इतना तुम इतराती हो
माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।

मेरे लिए नए नए कपड़े ला कर,
मेरी अलमारियां तुम भर देती हो।
मेरे पास तो अभी चार नई साड़ी पड़ी हैं कहके,
अपने लिए कभी कहाँ कुछ तुम लेती हो।
माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।

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अपने कामों में भूल जाऊ फोन करना भी,
पर तुम मुझे कब भूलती हो ।
मेरी चिंता में दिन रात एक कर देती हो,
माँ तुम कितना झूठ बोलती हो

हम सब की फ़िक्र में उदास होकर,
सोच सोच अपनी तबियत खराब कर लेती हो।
मैं तो सही हूँ बिलकुल, मुझ से यही तुम कहती हो, 
माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।

अपने को होशियार तुम समझती हो,
पर माँ हिसाब में तुम कितनी कच्ची हो।
दिए को कभी याद नहीं रखती हो,
देकर सब मुझे तुम सब भूल जाती हो।

माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।
हाँ माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।

मूल चित्र: Eastern Condiments Via Youtube 

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About the Author

shalini verma

I am Shalini Verma ,first of all My identity is that I am a strong woman ,by profession I am a teacher and by hobbies I am a fashion designer,blogger ,poetess and Writer . मैं सोचती बहुत हूँ , विचारों का एक बवंडर सा मेरे दिमाग में हर समय चलता है और जैसे बादल पूरे भर जाते हैं तो फिर बरस जाते हैं मेरे साथ भी बिलकुल वैसा ही होता है ।अपने विचारों को ,उस अंतर्द्वंद्व को अपनी लेखनी से काग़ज़ पर उकेरने लगती हूँ । समाज के हर दबे तबके के बारे में लिखना चाहती हूँ ,फिर वह चाहे सदियों से दबे कुचले कोई भी वर्ग हों मेरी लेखनी के माध्यम से विचारधारा में परिवर्तन लाना चाहती हूँ l दिखाई देते या अनदेखे भेदभाव हों ,महिलाओं के साथ होते अन्याय न कहीं मेरे मन में एक क्षुब्ध भाव भर देते हैं | read more...

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