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काश मैं अपने बच्चों को ज़िम्मेदार बना पाती…

अब हर आती जाती सांस के साथ विमला जी खुद के फैसले पे पछतावा महसूस करती। अपने पति की चेतावनी ना मानने का अंजाम ही था यह। कुछ फैसले जिंदगी पे बहुत भारी पड़ते है, जिसके लिये इंसान चाहे जितना भी पछता लें लेकिन समय का पहिया उल्टा नहीं घूमता। पछतावे के सिवा कुछ भी […]

अब हर आती जाती सांस के साथ विमला जी खुद के फैसले पे पछतावा महसूस करती। अपने पति की चेतावनी ना मानने का अंजाम ही था यह।

कुछ फैसले जिंदगी पे बहुत भारी पड़ते है, जिसके लिये इंसान चाहे जितना भी पछता लें लेकिन समय का पहिया उल्टा नहीं घूमता। पछतावे के सिवा कुछ भी हासिल नहीं होता। 

ऐसा ही कुछ विमला जी के साथ भी हुआ था। विमला जी की शादी अतुल जी से हुई थी। अतुल के पिताजी की पुश्तैनी साड़ियों की दुकान थी, जिसे अतुल ने बहुत मेहनत कर कम उम्र में ही शहर की सबसे बड़ी साड़ियों की शोरूम में बदल दिया। 

अपने पिताजी की इकलौती औलाद थे अतुल। बहुत ही धूमधाम से अतुल की शादी विमला से हुई। पैसा और सभी सुख सुविधा से भरा पूरा ससुराल मिला विमला जी को और जल्दी ही विमला जी की गोद में बिटिया खेलने लगी। सब बहुत दुलार करते बच्ची को लेकिन जब दूसरी और तीसरी भी बेटी हो गई, तो विमला जी की सासूमाँ परेशान हो उठी।

“एक के बाद एक बेटियां हो रही है। ऐसे तो नामलेवा ही खत्म हो जायेगा मेरे बेटे का। कौन देखेगा ये लाखों का कारोबार ये पुश्तैनी हवेली? सुन लो बहु इस बार बिना जाँच करवाये नहीं मानूंगी मैं।” 

हर तरह का पूजा पाठ, सब करवा लिया विमला की सासूमाँ ने। यहाँ तक की डॉक्टर से जाँच भी करवा लिया। जब पता चला लड़का है, विमला जी की सासूमाँ बहुत ख़ुश हुई। नौ महीने खूब खातिरदारी हुई विमला जी की और चौथी संतान के रूप में बेटे का जन्म हुआ। 

घर में सब बहुत ख़ुश थे, कुल दीपक आया था। दस दिन तक जश्न मनता रहा। बड़े प्यार से बच्चे का नाम दीपक रखा गया। धन दौलत की कोई कमी तो थी नहीं, भाई आने से बेटियों को भी मान दुलार मिलने लगा।

दीपक अपने दादा, दादी और माँ का खुब दुलारा था। अतुल भी सभी बच्चों से बहुत स्नेह करते लेकिन वो बच्चों को अनुशासन में रखना चाहते थे। जैसे उन्होंने मेहनत की थी वैसे ही अपने बच्चों को भी आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। लेकिन विमला जी अपने पति की एक ना सुनती। धीरे धीरे विमला के सास ससुर भी स्वर्ग सिधार गए। 

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बच्चे बड़े हो रहे थे, लेकिन किसी में भी जिम्मेदारी ना मात्र की थी। जब भी अतुल जी कहते, “बेटियों को काम भी सिखाओ।” 

विमला कहती, “राजकुमारियाँ है मेरी बेटियां, फिर अपने घर तो काम करना ही है इन्हें।” 

यही हाल बेटे का था। जब जितने पैसे मांगता विमला जी झट से हाथ में दे देती, कभी ना पूछती इतने पैसे का करता क्या था दीपक। स्कूल से शिकायत आती तो खुद ही कोई बहाना बना बेटे को बचा लेती। 

अति हर चीज की बुरी होती है। वही हुआ विमला जी के बच्चों के साथ। अपनी माँ का अत्यधिक प्यार पा बच्चों में जिम्मेदारी बिलकुल ना आयी, सिर्फ पैसे उड़ाने से ही उन्हें मतलब रहता। बेटियों को पार्लर और सहेलियों से फुर्सत नहीं मिलती और बेटे को अपने आवारा दोस्तों से। 

एक दिन यूंही दुकान पे बैठे बैठे अतुल जी को ब्रेन स्ट्रोक आ गया। आनन-फानन में अस्पताल में भर्ती करवाया गया। रुपये पैसे की कमी तो थी नहीं, पानी की तरह पैसा विमला जी ने बहाया। जान तो बच गई लेकिन आधा शरीर को लकवा मार गया। 

पुरे एक महीने अस्पताल में रह अतुल जी घर लौट गए। शोरूम नौकरों के भरोसे चल रहा था। अब विमला जी का माथा ठनका।

“दीपक अब कल से तू शोरूम संभाल। तेरे पापा इतने जल्दी तो ठीक होने से रहे, इतने दिन व्यापार नौकरों के भरोसे छोड़ना उचित नहीं।” 

माँ की बात सुन दीपक उखड़ गया, “क्या चाहती है आप, की पूरा दिन शोरूम में औरतों को साड़ियां बेचू मैं? इन सब कामों के लिये नौकर है ना और इतने पैसे है हमारे पास की साथ पीढ़ियां बैठ कर खायेंगी फिर भी खत्म ना होंगी। फिर मैं क्यों साड़ियां बेचने में अपना जीवन ख़राब करू?”

बेटे की बात सुन विमला जी को काठ मार गया। कुछ ऐसा ही तो वो अतुल जी को कहती थी जब वह कहते, “बेटे को शोरूम में भेजो तभी तो काम सीखेगा। दीपक की उम्र में तो मैंने अपने पिताजी का आधा भार अपने कंधे पे ले लिया था।” 

“ठीक है आपने किया तो क्या मेरा बेटा भी वही करेगा? अपनी जवानी तो आपने काम करने में गवा दी, लेकिन मेरा बेटा अपनी जिंदगी खुल कर जियेगा।”

“तुम पछताओगी एक दिन विमला।” 

“पछताना कैसा? एक ही तो बेटा है और इतने पैसे कमाये है आपने की पीढ़ियां बैठ कर खायेंगी।” 

पहले पिता का थोड़ा डर था दीपक को लेकिन जब से अतुल जी ने बिस्तर पकड़ा वो भी खत्म हो गया था। अब तो देर रात पिये हुए घर आता दीपक। घर के कुलदीपक को नशे में झूमता देखा विमला जी सर पटक पटक रोती खुद को कोसती की क्यों नहीं मानी पति की बात और क्यों बच्चों को खुद अपनी जिंदगी इतनी गैर ज़िम्मेदारी से जीने का फैसला लेने दिया। 

नौकरों के भरोसे कितने दिन शोरूम चलता जल्दी ही वहाँ ताला लटक गया। एक दिन पता चला दोनों बड़ी बेटियां माँ के गहने चुरा घर से भाग गईं। रोती कलपती विमला जी बेटे को जगाती रह गई की जा कर थाने में रिपोर्ट लिखवा आ। लेकिन बेटा तो नशे में इस क़दर डूबा था की उसे कहाँ भान भी था की उसकी बहनें कहाँ गई। 

अतुल जी ये सदमा सह ना सके और अंतिम सांस लें ली। पिता की अर्थी आँगन में सजी थी और ऊपर कमरे में बेटा शराब पी रहा था। जिस कुलदीपक के जन्म में हवेली में जश्न मना था, आज वो रो रही थी अपने कुलदीपक के हश्र पे। समाज में कुछ विशिष्ट लोगों ने सलाह कर छोटी बेटी से अतुल जी को मुखाग्नि दिलवा दी। 

शराब में डूबे दीपक को भी कुछ ही महीनों में शराब ले डूबी और वो भी चला गया। 

जिस हवेली में पहले रौनक और रौशनी खेलती थी आज वहाँ मरघट सा सन्नटा फैला रहता था। अब हर आती जाती सांस के साथ विमला जी खुद के फैसले पे पछताती रहती। अपने पति की चेतावनी ना मानने का अंजाम ही था की उनकी बगिया हमेशा के लिये उजड़ चुकी थी। 


मूल चित्र: Still from Movie Pagglait

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