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मैं आपके बच्चे के बारे में गलत नहीं बोल रही हूँ…

Posted: मई 4, 2021

लेकिन निशा की बात सुनते ही शिवानी उल्टा निशा को ही बातें सुनाने लगी, “मेरी बच्ची तुम्हारे घर खेलने क्या गई तुमने तो उसे चोर ही बना दिया।”

नये अपार्टमेंट में आये निशा को दो ही दिन हुए थे। घर अभी पुरे तरीके से सेट भी नहीं हुआ था। निशा के पति अश्विन की बैंक की जॉब थी हर दो तीन सालों में तबादला होता रहता था।

ये पहली बार था जब उन्हें क्वाटर नहीं मिल पाया था और मजबूरन अपार्टमेंट में फ्लैट किराये पे लेना पड़ा था।

निशा के परिवार में पति अश्विन और एक दस साल की बेटी सृष्टि थी। घर को सजाने सँवारे में व्यस्त एक दोपहर को दरवाज़े की घंटी बजी निशा ने देखा तो एक महिला और एक चौदह पंद्रह साल की बच्ची खड़ी थी। 

मुस्कुरा कर नमस्ते करती उस महिला ने कहा, “नमस्कार मेरा नाम शिवानी है और ये मेरी बेटी सौम्या है।” 

निशा ने भी मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया। औपचारिक बातों के बाद शिवानी और सौम्या चले गए।अब जब सौम्या का दिल करता सृष्टि के साथ खेलने चली आती। नई जगह के कारण सृष्टि के भी दोस्त नहीं थे, बच्ची बोर ना हो इसलिए निशा को भी सौम्या का आना अच्छा लगता। 

कभी कभी शिवानी भी साथ आ जाती और निशा को भी एक सहेली का साथ मिल जाता।

“निशा ये पांच हजार रुपए है तुमने सृष्टि के स्कूल प्रोजेक्ट और स्टेशनरी के लिये चाहिये थे ना आज जा कर लेती आना।”

“ठीक है अश्विन आप मेरे पर्स में डाल दीजिये।”

निशा के कहने पे आश्विन पैसे पर्स में डाल दिये और ऑफिस चले गए। निशा की तबियत थोड़ी ठीक नहीं थी, तो निशा ने उस दिन बाज़ार जाने का प्लान कैंसिल कर दिया। उस दिन भी शाम को हमेशा की तरह सौम्या आयी और सृष्टि के साथ खेल कर अपने घर चली गई। 

अगले दिन सृष्टि और आश्विन के जाने के बाद निशा भी सृष्टि के नये स्कूल की स्टेशनरी और कुछ प्रोजेक्ट की चीज़ें खरीदने के लिये बाज़ार चली गई। वही पे कुछ अच्छी किताबें भी थी। पढ़ने की शौकीन निशा ने कुछ किताबें भी ले ली। सब लेने के बाद जब पैसे देने के लिये पर्स खोला तो उसमें सिर्फ तीन ही हजार रुपए थे। 

“ये क्या अश्विन ने तो पांच हजार देने की बात कहीं थी ये तो सिर्फ तीन ही हजार है, अभी तो किचन की भी कुछ चीज़ें लेनी थी हो सकता है मुझसे सुनने में कुछ भूल हुई हो।” ये सोच निशा बुक स्टोर से ही वापस घर आ गई। 

शाम को जब अश्विन आये तो बातों बातों में निशा पूछ बैठी, “अश्विन अपने तो सिर्फ तीन हजार दिये थे, मुझे पांच सुनाई दिया इसलिए मैंने आपसे ज्यादा पैसे भी नहीं लिये।” 

“लेकिन मैंने तो पांच हजार ही दिये थे”, आश्विन ने कहा तो निशा चौंक उठी। तुरंत पर्स चेक किया तो सिर्फ पांच सौ ही थे क्यूंकि ढ़ाई हजार बुक स्टोर में खर्च हो चुके थे। 

“ऐसा कैसे हो सकता है अश्विन जरूर आपसे भूल हुई है।”

“बिलकुल नहीं निशा मुझे अच्छे से याद है मैंने दस हजार निकाले थे। पांच तुम्हारे पर्स में डाले और पांच अपने पास रखे थे।” 

दोनों पति पत्नी सोच पे पड़ गए। पैसे गए तो कहाँ गए कहाँ? अगर गिरते तो एक साथ गिरते और उनके घर की कामवाली भी पिछले तीन चार दिन से आयी नहीं थी।

“सोचो निशा कोई आया था घर?”

“नहीं आश्विन कोई नहीं आया था। सिर्फ सौम्या आयी थी लेकिन वो भी कल से नहीं आयी।” 

“मतलब साफ है निशा पैसे सौम्या ने ही लिये है।” 

“नहीं नहीं अश्विन बच्ची है वो, यूं देखे बिना कुछ कहना सही नहीं होगा।” 

“एक बार सृष्टि से पूछ कर देख लो निशा कहीं उसे कुछ पता हो।”

आश्विन के कहने पे निशा ने सृष्टि को बुला कर पूछा, “बेटा मेरा पर्स सेंटर टेबल पे रखा था क्या अपने उसे छुआ था?” 

“नहीं मम्मा मै तो कभी भी आपका पर्स नहीं छूती। लेकिन हां उस दिन सौम्या दीदी ने मुझे पानी लाने भेजा, जब मैं वापस आयी तो आपके पर्स को उनके हाथों में देखा था। मुझे देखते पर्स वापस रख दिया और घर चली गई।” 

“ठीक है बेटा आप होमवर्क करने जाओ।” 

निशा ने सृष्टि को तो भेज दिया लेकिन खुद सोच में पड़ गई। 

अश्विन और निशा ने आपस में विचार कर शिवानी को सारी बातें बता दी ।

लेकिन निशा की बात सुनते ही शिवानी नाराज़ हो गई और उल्टा निशा को ही बातें सुनाने लगी।

“मेरी बच्ची तुम्हारे घर खेलने क्या गई तुमने तो उसे चोर ही बना दिया।”

“बिलकुल नहीं शिवानी, मेरे लिये जैसी सृष्टि वैसी सौम्या है। मैं सौम्या को चोर नहीं कह रही मैं तो बस ये कह रही हूँ की सौम्या अभी किशोरावस्था में है, हो सकता है उससे नासमझी हुई हो और मैं कोई शिकायत ले कर नहीं आयी मैं तो तुम्हें सौम्या से बात कर उसे सही गलत समझाने को बोलने आयी थी। लेकिन अफ़सोस तुम्हारे आँखों पे तो ममता की पट्टी बँधी है जो सच देख कर भी अनदेखा कर रही हो।” 

“एक सहेली होने के नाते मैंने तुम्हें आगाह कर दिया है आगे तुम्हारी मर्जी शिवानी।” इतना कह भारी मन से निशा लौट आयी। इस घटना के बाद दोनों सहेलियों में बातचीत बंद हो गई।

निशा और शिवानी के फ्लैट एक ही फ्लोर पे होने के कारण लिफ्ट पे आते जाते कभी टकरा भी जाते तो शिवानी अपना मुँह फ़ेर लेती, निशा भी चुप्पी लगाये रखती।

उस दिन वाली घटना के लगभग एक महीने बाद एक दोपहर कुछ आवाजे सुन निशा बाहर आयी देखा तो दो औरतें शिवानी को खुब बातें सुना रही थी पास ही मैं सौम्या खड़ी रो रही थी और उस दिन निशा पे शेरनी की तरह दहाड़ने वाली शिवानी हाथ जोड़े उनसे माफ़ी माँग रही थी।

बातों से साफ जाहिर था की सौम्या और उस महिला की बेटी एक क्लास में थी। कोई नोट्स के लिये सौम्या उनके घर जाती थी और आदतन वहाँ भी उसने चोरी करने की कोशिश की लेकिन दुर्भाग्य से पकड़ी गई और उस महिला ने पुरे फ्लोर के सामने शिवानी की इज़्ज़त की धज्जिया उड़ा के रख दी। 

थोड़ी देर तमाशा देख सब चले गए निशा भी अपने घर आ गई। अगले दिन शिवानी आयी और निशा को पकड़ के रोने लगी। 

“मुझे माफ़ कर दो निशा तुमने मुझे उस दिन बताया था लेकिन मैं नासमझ तुमसे ही लड़ पड़ी और जाने क्या क्या सुना दिया तुम्हें। सौम्या ने ही वो पैसे तुम्हारे पर्स से लिये थे। कल जब सौम्या से कड़क हो पूछा तब सब बताये उसने। स्कूल में लड़कियों को पार्टी देना और अपने आप को रईस बताने में सौम्या ने ये गलत रास्ता पकड़ा था।”

रोती हुई शिवानी ने कहा तो निशा भी भावुक हो गई। 

“शिवानी अब भी देर नहीं हुई। जो होना था सो हो गया। शिवानी की उम्र अभी बेहद नाजुक है इस उम्र में बच्चे अपना भला बुरा नहीं सोच पाते। साथ ही आज का माहौल बच्चों को उम्र से बड़ा बना रहा है। तुम उसे प्यार से समझाओ वो जरूर समझेंगी।” 

“शिवानी बच्चों से प्रेम तो सभी माता पिता करते है और करना भी चाहिये लेकिन ये कैसा प्रेम है जो अपने बच्चों को गलती करता देख कर भी चुप रह जाता है।” 

“तुम सही कह रही हो निशा प्रेम के साथ अनुशासन भी जरुरी होता है जो शायद मैं ना लगा पाई लेकिन अब अपनी भूल जरूर सुधारने का प्रयास करुँगी।” 

शिवानी तो माफ़ी मांग के चली गई लेकिन निशा सोच में पर गई। क्यों लोगो को अपने बच्चों की गलती दिख के भी नहीं दिखती? क्यों जब कोई बच्चों के विषय में सचेत करने आता है तो उस व्यक्ति पे विश्वास ना कर उसे ही बातें सुना दी जाती है?

ये बहुत जरुरी है कि आप अपने बच्चों से प्यार करे उस पे विश्वास करें उसकी बातों को सुनें लेकिन बच्चों पे ऑंखें बंद कर प्रेम करना भी सिर्फ और सिर्फ बच्चों के भविष्य से एक खिलवाड़ ही होती है जैसा शिवानी ने किया। अगर समय रहते वो निशा की बातों पे ग़ौर कर अपनी बेटी से पूछती उसे समझाती तो आज यूं सबके सामने बेइज़्ज़ती तो ना होती। 

इस छोटी सी कहानी के द्वारा मैं बस यही कहना चाहती हूँ की बच्चों पे प्रेम और विश्वास जरूर करें लेकिन अंधविश्वास ना करें ये सिर्फ बच्चों के भविष्य को ही हानि पहुचायेगा। 


मूल चित्र: still from movie Taare Zameen Par

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