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क्या मैं बिना सजे संवरे सुंदर नहीं लग सकती?

आखिर ज़रूरत ही क्या है इतना सजने संवरने की? क्या हम सामान्य रहकर सुन्दर नहीं लग सकते, ज़रूरी है इतना कुछ करना?

आखिर ज़रूरत ही क्या है इतना सजने संवरने की? क्या हम सामान्य रहकर सुन्दर नहीं लग सकते, ज़रूरी है इतना कुछ करना?

जब भी कोई व्रत-त्यौहार होते हैं, ज़्यादातर घरों में महिलाएं व्रत करेंगीं, सजेंगी, संवरेंगी, सोलह शृंगार करेंगी। बहुत ही मनभावन दृश्य होता है जब घरों में इस तरह की रौनक होती है तो।

पर मैं आज व्रत त्यौहार की बात नहीं करने वाली हूँ। मैं बात करने वाली हूँ समान्य दिनों की जब कोई त्योहार नहीं होता और हम औरतें सीधे सादे तरीके से रहतीं हैं, बिल्कुल सादे तरीके से।

हममें से बहुत सारी महिलाएं तो नयी माएँ होंगी और वो शायद ये बात ज्यादा अच्छे से समझें कि कितना मुश्किल होता है साजो शृंगार करके बैठना।

वैसे इस बारे मे सोचते-सोचते ये बात भी दिमाग में आती है कि आखिर ज़रूरत ही क्या है इतना सजने संवरने की? क्या हम सामन्य रहकर सुन्दर नहीं लग सकते, जैसे छोटे बच्चे दिखते हैं?

क्या जरूरत है इतने रंग रोगन की? अब ये बात बहस का मुद्दा हो सकती है। पर किसी की सुंदरता को इस बात से आंकना की वो कितने अच्छे से तैयार हुआ है क्या ये गलत नहीं है?

कई जगह तो यह भी कहा जाता है कि पति को वश में रखने के लिए सजना संवरना चाहिए, तैयार होकर रहना चाहिए। नहीं तो वो बाहर वही खूबसूरती ढूँढना शुरू कर देगा।

ये बात कितनी सही और कितनी गलत इसपर ज्यादा बहस ना करते हुए ये जानना ज्यादा जरूरी है कि क्या बाहरी सुंदरता ही सब कुछ होती है? वो भी सच्ची नहीं बनावटी, जो इंसान सच में अपनी जीवन संगिनी को प्यार करेगा उसके लिए बाहरी सुंदरता क्या सचमुच मायने रखती है या नहीं?

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नहीं नहीं मैं सजने, तैयार होने के बिल्कुल खिलाफ नहीं हूँ। मुझे भी अच्छा लगता है तैयार होना सुन्दर लगना, पर इसलिए नहीं कि किसी और को प्रभावित करना है बल्कि अपने लिए अपनी खुशी के लिए।

पति को प्रभावित करने की जरूरत नहीं होगी, तब शायद जब आप खुद को प्राथमिकता देना शुरू कर दें तो। क्यूँकि जब हम खुद को प्यार करने लगते हैं तो लोग अपने आप हमारी ओर आकर्षित होने लगते हैं।

मूल चित्र: Still from Blue Heaven Ad, YouTube

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Shivangi Srivastava

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