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अरे! तुम दलित हो? लगती तो नहीं!

जो भी मुझे देखता, वो एक ही बात कहता कि 'तुम तो इतनी अच्छी हो, हमें तो पता ही नहीं चलता कि तुम दलित हो, तुम दलित नहीं लगतीं!'

जो भी मुझे देखता, वो एक ही बात कहता कि ‘तुम तो इतनी अच्छी हो, हमें तो पता ही नहीं चलता कि तुम दलित हो, तुम दलित नहीं लगतीं!’

स्कूली शिक्षा प्राप्त करते वक्त न मुझे पता था कि जातियवाद क्या होता है, न यह पता था कि व्यक्ति उसके गुणों से कितना भी अच्छा क्यों न हो, कितना ही विश्वास क्यों न हो, आखिर उसको उसकी जात से ही पहचाना जाता है।

उच्च माध्यमिक शिक्षा के बाद जब मैंने डिग्री के लिया एडमिशन लिया तो बहुत उत्साही थी। सोचा था नए लोग, नया पड़ाव, कुछ उल्लासजनक होगा। लेकिन वह कहते हैं ‘ना सावन के अंधे को हरियाली ही दिखती है’, वैसे ही कुछ मेरे साथ हुआ।

कॉलेज के पहले दिन जब कुछ लड़कियों से मुलाकात हुई तो तब उन्होंने मुझे अपनी जाति के बारे में पूछा। वैसे उनका ये सवाल मुझे कुछ अजीब लगा, ‘अरे भाई जाति कौन पूछता है आजकल?’ लेकिन मैंने फटाक से उत्तर दिया कि मैं एस सी कैटेगिरी से हूं।’

तुम दलित नहीं लगतीं – दलित लगने के लिए क्या करना होता है?

तब आसपास खड़ी सारी लड़कियों के हाव-भाव देखने लायक थे। जैसे मैंने कुछ गलत कहा हो।फिर उन में से एक लड़की ने कहा, ‘अरे! तुम दलित हो? लगती तो नहीं!’

मैं तब कुछ विचलित हो गई, मुझे कुछ समझ ही नहीं आया। आखिर यह क्या था? क्यों? किस लिए? बहुत सारे प्रश्न मुझे अचंभित कर रहे थे। लेकिन वो तो सिर्फ शुरुआत थी। मुझे क्या पता था कि इसकी आगे अनेक कड़ियाँ रहने वाली हैं।

मेरी पहचान सिर्फ मेरी जाति से होने लगी

बस वहीं से सब शुरू हुआ। कॉलेज में हर कोई मुझे अपनी जाति से जानने लगा था न कि मेरे नाम से। आए दिन मुझे सवाल पूछा जाता था कि ‘तुम तो इतनी अच्छी हो कि लगता नहीं, एस सी कैटेगरी से हो।’

लड़के भी जब प्रपोज करने आते थे तो कहते थे, ‘अरे ये तो एस सी कैटेगरी से हैं।’

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हर कोई कुछ ना कुछ सवाल लेकर आता था। जैसे हम किसी को उसका नाम पूछते हैं वैसे ही मुझसे मेरी जाति पूछी जाती थी। मैं इस विषय के इतने निकट आ गई थी कि मुझे लगने लगा कि यह सब नॉर्मल है और मुझे इसकी साथ ही जीना पड़ेगा। लेकिन बाद में समझ गया कि जातियता एक ऐसी बीमारी है, जिसका जड़ से इलाज करवाना पड़ेगा।

नदी अपने उगम स्थल पर पूरी तरह से पवित्र होती है। लेकिन जब वह अनेक पड़ाव पार करती है तो अपवित्र हो जाती है। वैसे ही कुछ अपना जीवन रहता है। बचपन तो निर्मल और पवित्र होता है, जो मन में  हैं वही जुबान पे। लेकिन जब हम बड़े होते हैं, अनेक पड़ाव आते हैं, तब हमे हम पर लादे गए विचार और संस्कार दूषित करते हैं।

हमारे माता-पिता का बड़ा हाथ है इसमें

इन सब में अपने माता-पिता का बहुत बड़ा योगदान रहता है। हम उनके नक्श कदम पर चलते हैं।  क्या सही, क्या गलत सब उनसे ही सिखने को मिलता है। वहीं से ही जातियवाद का जन्म होता है।अलग से कोई यह नहीं सिखाता।

यह पीढ़ियों से चलती आ रही एक बेबुनियाद और कुप्रथा है। इसको मिटाने में परिवार ही मदद कर सकता है। अगर वह बचपन से ही अपने बच्चे को बताएंगे कि ऐसा कुछ होता ही नहीं या फिर समझाएंगे कि यह ऐसे विचार हैं जो बिना मतलब बढ़ते ही जा रहा हैं, तो इसका नामोनिशान ही मिट जायेगा। यह बात सोचनी और जाननी बहुत ज़रूरी है क्यूंकि राष्ट्र की वृद्धि इसी की वजह से भी घटती जा रही है।

एक दलित स्त्री को बाकी स्त्रियों से ज़्यादा सहना पड़ता है

गौर रहे कि एक दलित स्त्री चाहे कितना भी उच्च शिकर गाठ ले उसे दूसरी स्त्रियों से ज्यादा सहना पड़ता है। क्यों यह माना जाता है कि दलित स्त्री खूबसूरत नहीं हो सकती और अगर वह खूबसूरत है तो वह दलित नहीं?

समाज ने इन सब बातों से खुद को इतना अंधा कर लिया है कि समाज कुछ स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो रहा है। हर रोज़ इन महिलाओं को कुछ नई आपत्ति का सामना करना पड़ता है।

अगर यूपीएससी में कोई दलित महिला टॉप करती हैं तो कहते हैं कि ‘अरे इनको तो रिजर्वेशन मिलता है।’

दलित महिला पर अत्याचार हुए तो कहते हैं, ‘ये तो होती ही ऐसी हैं’

युवाओं को इस अंधकार से बाहर निकालना होगा। यह एक ऐसी बीमारी है जो राष्ट्र को खोखला करती जा रही है। जैसे स्कूल, कॉलेज, सरकारी दफ्तर, कंपनी में सेक्स एजुकेशन, फिटनेस, ड्रग्स और अलग अलग मुद्दों पर अभियान चलाए जाते हैं, तो क्यों इस ज्वलंत विषय पर कोई अभियान नहीं चलाता?

सरकार अलग-अलग अभियान चलाती है, लेकिन क्यों इस विषय पर ठोस कदम नहीं उठाती?

हम सब महिला सशक्तिकरण की बातें करते हैं लेकिन कभी यह नहीं सोचते महिला जाातियता की वजह से कितनी दलित महिलााएं काल के पर्दे के पीछे ही रह गई हैं।

तुम दलित नहीं लगतीं!

दलित महिला को किसी से प्यार करने से पहले सोचना पड़ता है। अगर वह दूसरी जाति में शादी कर ले, तो माता-पिता को यह चिंता रहती है कि कहीं उसे अपनी जाति की वजह से कुछ सहना न पड़े।

आज भी दलित स्त्री को अपनी जाति छुपानी पड़ती है। उन्हें यह खौफ रहता है कि अगर सबको समझ आ गया कि वह दलित है तो न जाने उसको दूर कर देंगे, उससे घृणा करने लगेंगे।

भारत जैसे राष्ट्र में जहां संविधान के आर्टिकल १५ में सब को एक जैसा माना गया है, वहाँ क्यों महिला को हर पड़ाव पर कष्ट झेलने पड़ते हैं?

स्त्री एक ऐसी आग है, जिसकी गर्मी आपको कड़कड़ाती ठंड में सेंक देती है और अगर उसके साथ खेलो तो क्षण भर में भस्म कर सकती है। इसलिए महिला महिला होती हैं। उसे, या किसी भी अन्य इंसान को, जाति धर्म की पहचान की ज़रूरत नहीं होती। सब खुद में ही परिपूर्ण हैं!

मूल चित्र : intellisudies from Getty Images Signature, Canva Pro (for representational purpose only)

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