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माँ न बन पाने पर क्या मेरे साथ ऐसा सलूक ठीक था?

Posted: मार्च 1, 2021

दो हफ्ते बाद मुरझायी माया घर आई पर अब ये घर वो नहीं था। अब सब बदल गए थे। कल जो पलकों पे थी आज आँखों को चुभ रही थी।

आज शांति निवास में रौनक लगी थी। मौका था घर के लाडले बेटे राजीव की शादी की, मेहरून और गोल्डन शेरवानी में सजा दूल्हा राजीव अपनी दुल्हन माया के साथ सात फेरे लेने निकल रहा था। माँ और दादी अपने लाडले की बलैया लेती नहीं थक रही थी तो वहीं राजीव के पापा अपने बेटे को गर्व से देखे जा रहे थे। ढ़ोल के धुन पे भाई बहन की टोली नाचने में लगी थी। हसीं खुशी के माहौल में राजीव और माया ने सात फेरे लिये और माया दुल्हन बन अपने ससुराल आ गई।

सभी भाई-बहनों मे राजीव सबसे बड़े थे। जब माया दुल्हन बन के आयी तो सब ने पलकों पे रखा माया को। सास की लाडली, नन्द देवर की दुलारी भाभी, माया ने भी सबको उनके हिस्से का मान दुलार और प्यार दिया।

माया के हाथों में तो जैसे स्वयं माँ अन्नपूर्णा बसती थी। माया के हाथों का स्वादिष्ट खाना सब उंगलियां चाट कर खाते। देवर नंद अपनी लाडली भाभी से फरमाइश करते और माया झट बना हाजिर कर देती। अपनी रूपवती और गुणवती बहु की दादी सास दिन भर बलैया लेती ना थकती। सब कुछ सपनों जैसा सुन्दर था। राजीव की तो जैसे पूरी दुनिया बस माया मे ही समा गई थी।

दो महीने बीतते -बीतते माया की तरफ सी खुशखबरी भी आ गई। सब बहुत ख़ुश थे। माया को कोई सुई भी ना उठाने देता। सासूमाँ और दादी की मीठी हिदायतें सुन माया मुस्कुरा देती। प्रेगनेंसी भी नार्मल थी तो सब के मन भी निश्चिंत से थे।

एक रात बहुत बेचैनी सी हो रही थी माया को, घबरा कर नींद खुल गई थी शायद कोई डरावना सपना देखा लिया था। बैचेनी और घबराहट से पसीने पसीने हो बैठ गई गला सूखा जा रहा था और बहुत जोर की प्यास लगी थी।

राजीव को गहरी नींद में सोया देख माया ने उन्हें जगाना उचित नहीं समझा और खुद ही किचन की तरफ बढ़ गई। कमरे से बाहर निकल सीढ़ियों पे पैर रखा ही था कि जाने कैसे माया का पैर फ़िसल गया। चीख़ती हुए माया सीधे लुढ़कते हुई नीचे आ गिरी और बेहोश हो गई। माया की दर्दनाक चीखों को सुन सबके दिल दहल गए। भाग के सब कमरे से बाहर आये सीढ़ियों के नीचे गिरी माया को उठा रात को ही हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया।

पूरा परिवार बेचैनी से हॉस्पिटल के कॉरिडोर मे बैठा माया और बच्चे की सलामती की दुआ मांग रहा था। तभी डॉक्टर आती दिखी, “डॉक्टर साहिबा माया कैसी है? मेरा बच्चा वो तो ठीक है ना?” परेशान राजीव रो पड़ा डॉक्टर के आगे।

“देखिये माया तो ठीक है। चोट है पर घबराने की बात नहीं है पर माफ़ करें हम आपके बच्चे को नहीं बचा पाये। अंदरूनी चोटों के कारण शायद अब माया कभी माँ ना बन पाये।”

डॉक्टर की बातें सुनते ही सबने अपने सिर थाम लिये। माया की सासूमाँ बेहोश हो वहीं गिर पड़ी। राजीव को तो जैसे होश ही नहीं रहा, क्या क्या सोचा था और ये क्या हो गया था? किसी को कुछ नहीं सूझ रहा था सब बस रोये जा रहे थे।

दो हफ्ते बाद मुरझायी माया घर आई पर अब ये घर वो नहीं था अब सब बदल गए थे। कल जो पलकों पे थी आज आँखों को चुभ रही थी। माया का दिल, शरीर, आत्मा सब घायल थे। अपने बच्चे को खोने का दुख पागलों वाली हालत हो गई। माया के मम्मी-पापा ले जाना चाहते थे अपने साथ पर राजीव ने ये कह कर रोक लिया कि अब माया मेरी जिम्मेदारी है।

दादी सास ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पायी और छः महीने के अंदर स्वर्ग सिधार गई। माया की सासूमाँ की जैसे सोचने समझने की हिम्मत ख़त्म हो गयी। वह राजीव की दूसरी शादी की ज़िद पकड़ कर बैठ गई लेकिन दूसरी शादी की बात को राजीव ने साफ-साफ माना कर दिया। राजीव के अटल निर्णय को देख कुछ समय बाद राजीव के छोटे भाई की शादी कर दी गई और देखते-देखते देवरानी दो जुड़वाँ बच्चों की माँ भी बन गई। बच्चे होते ही देवरानी का मान और स्थान परिवार में ऊंचा हो गया, कुलदीपक जो दिया था उसने और माया उसका तो कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया था।

राजीव के कारण कोई माया को कुछ बोलता नहीं लेकिन बच्चा ना होने की कमी बता ही देता। माया की ना जाने कितनी रातें आँखों में कट जाती। सबके बदले चेहरे देख उसका कोमल मन टूट सा जाता। राजीव के प्यार की मरहम बच्चा खोने की टिस को थोड़ी ठंडक तो देता लेकिन ये एक ऐसे घाव था जो भरता नहीं था। देवरानी के गोलमटोल बच्चों को देख माँ की ममता उमड़ उठती माया का दिल करता दोनों बच्चों को खूब प्यार करें पर देवरानी उन्हें पास भी नहीं आने देती।

बच्चा गोद लेने की बात पे माया की सासूमाँ बवाल मचा देती, घर का माहौल बिगाड़ जाता जिसे देख माया और राजीव ने इस बात की जिक्र करना भी छोड़ दिया।

“राजीव, क्या मैं कभी माँ नहीं बनूँगी?” जब सब्र टूटता तो राजीव के कंधे पे सिर रख रो देती माया और मौन सांतवना देता राजीव अपने आंसुओं को चुपके से पोंछ लेता। कहीं ना कहीं दोनों ने एक समझौता सा कर लिया था अपने जीवन के साथ।

“अरे माया, शाम हो गई लाइट भी नहीं जलाई। क्या बात हो गई तबियत तो ठीक है ना?” माया को इस तरह अँधेरे मे लेटा देख ऑफिस से लौटे राजीव चौंक गए।

“कुछ नहीं, जी बस ऐसे ही आंख लग गई थी आप हाथ मुँह धो लो मैं चाय बना रही हूँ।” चाय पीते हुए राजीव एकटक माया को देख रहे थी माया के दर्द को उनसे ज्यादा कौन समझ पाता आखिर वो भी तो बाप नहीं बन पाया था।

कुछ दिन बाद माया जब सुबह उठी तो हल्का बुखार सा लग रहा था, थोड़ी कमजोरी भी थी।

“क्या हुआ माया तबियत ठीक नहीं क्या?”

“नहीं राजीव, थोड़ा बुखार सा है आप परेशान मत हो, गोली ले लूंगी शाम तक ठीक हो जायगा।” 

“अभी बहुत डेंगू के केस आ रहे है माया एक बार डॉक्टर को दिखा देते हैं। आज मैं ऑफिस मे छुट्टी का बोल देता हूँ, तुम रेडी हो जाओ। अभी चलते है डॉक्टर के पास।”

डॉक्टर ने चेक कर कुछ सवाल पूछे और मुस्कुराते हुए कहा, “राजीव आपकी पत्नी को कोई बीमारी नहीं है बस एक जिम्मेदारी आने वाली है तैयारी रहें।” माया और राजीव ने एक दूसरे को देखा उन्हें कुछ समझ नहीं आया।

“आप क्या बात कर रहे है डॉक्टर साहब हम समझे नहीं।”

“डॉक्टर ने हंसते हुए कहाँ, आप माँ बाप बनने वाले हैं।” 

“आप क्या कह रहे हैं डॉक्टर साहब, ऐसे कैसे हो सकता है? माया के एक्सीडेंट के बाद तो डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि अब ये कभी…”

“जी बिलकुल ठीक सुना है आपने राजीव, कभी-कभी एक स्त्री की माँ बनने की चाहत और उपर वाले के चमत्कार के सामने मेडिकल साइंस भी गलत हो जाती है आप बस इनका ख्याल रखें।” 

दोनों पति-पत्नी क्लिनिक से निकल एक दूसरे के गले लग जी भर रोये। इंतजार का लम्बा वक़्त काटा था दोनों ने लेकिन अब उनकी तपस्या पूरी होने वाली थी।

एक ऐसा चमत्कार हुआ था जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। घर में एक बार फिर से खुशी की लहर दौड़ गई। नौ महीने बाद दो गोल मटोल प्यारे प्यारे बच्चों का जन्म हुआ। इन बच्चों ने माया राजीव के जीवन मे फिर खुशियों के रंग भर दिये।

लेकिन सवाल एक तब भी माया के दिमाग में घूमता रहा…

मूल चित्र : Bhupi from Getty Images Signature via Canva Pro

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