कोरोना वायरस के प्रकोप में, हम औरतें कैसे, इस मुश्किल का सामना करते हुए भी, एक दूसरे का समर्थन कर सकती हैं?  जानने के लिए चेक करें हमारी स्पेशल फीड!

माँ, भाभी भी तो एक इंसान है…

कला सुबह से ही रसोई में लगी थी इतने कम समय में उसने ढेरों पकवान बना दिए थे। कोई कुकिंग काम्पिटीशन होता तो उसे पहला स्थान मिलता।

कला सुबह से ही रसोई में लगी थी इतने कम समय में उसने ढेरों पकवान बना दिए थे। कोई कुकिंग काम्पिटीशन होता तो उसे पहला स्थान मिलता।

“कला! आज याद है ना दामाद जी खाने पर आ रहे हैं।”

कला को तो ये सुनते ही हाथ पैर कांपने लगे। तभी सरला जी रसोई में आ धमकीं, “देख कला दामाद जी पहली बार आ रहे कोई गलती ना हो और हां खाना भी उनकी पसंद का बनाना।” कला ने बस हां में सिर हिला दिया।

ये कोई पहली बार नहीं था जब कला को घबराहट हो रही थी। वह जबसे ससुराल आई थी, सरला जी के कड़े स्वभाव से डरी सहमी रहती थी। कई बार आरती और विनय (सरला जी के बच्चे) ने समझाया भी पर वो अपनी आदत से मजबूर थीं।

“अरे सरला जी! चाय तो दे देती कि हर काम बहू से ही कराएंगी?” सरला के पति मृदुल जी बोले।

“हां…हां…सब तो वही करती है मैं तो जैसे बस सोफे पर बैठी रहती हूं।”

“बात तो सही कही आपने सरला जी।”

“क्या बोला आपने?”

Never miss real stories from India's women.

Register Now

“मतलब मैं कह रहा मैंने कब कहा आप कुछ नहीं करतीं। बस आपके हाथों वाली चाय चाहिए।”

कला सुबह से ही रसोई में लगी थी इतने कम समय में उसने ढेरों पकवान बना दिए थे। पनीर की सब्जी, मिक्स सब्जी, रायता, कचौड़ी, पूरी, रायता, खीर, ढोकला, प्याज़ कचौरी और ना जाने क्या-क्या। कोई कुकिंग काम्पिटीशन होता तो उसे पहला स्थान मिलता।

पर यहां तो ईनाम क्या प्यार के दो शब्द भी नहीं सुनने को मिलते।

“बहू! बस इतना सा नाश्ता? कम से कम मिठाई में और कुछ भी बना लेती। पता है ना दामाद जी को बाहर का खाना पसंद नहीं। हां तुम्हें क्या? सुनना तो मेरी बेटी को होगा। तुम तो खुश होगी अपनी ननद का अपमान देखकर।”

“ऐसी बात नहीं है मां जी, दीदी का अपमान मतलब मेरा अपमान। वो हमसे अलग थोड़े ही हैं। आप मुझे बता दो तो और कुछ भी तैयारी कर लूं।”

“रहने दे तू वरना अपनी दीदी से सारी बातें लगा देगी कि मां ने इतना काम करवा लिया।”

दोपहर को खाने में रौनक (सरला जी का दामाद) और आरती आए। आरती ने हाथों में चूड़ा और सुंदर सी गुलाबी रंग की बनारसी साड़ी पहन रखी थी। एकदम गुड़िया लग रही थी आरती नई दुल्हन बनकर। सरला जी ने दामाद और बेटी की आरती की और नज़र उतारी।

आरती अपनी मां, पिता और भाई से मिलकर भावुक हो गई।

“मां, भाभी कहां है दिख नहीं रही?”

“कहां होगी? बनने संवरने से फुर्सत मिले तब ना आएगी वो,उसे क्या रिश्तों की समझ है।”

आरती समझ गई और तुरंत कला के कमरे में पहुंच गई।

“अरे दीदी! आप आ गईं? मुझे माफ़ करना वो मैं तैयार…”

कला की बातों को बीच में काटती आरती बोली, “मुझे पता है भाभी सारा काम निपटा अब फुर्सत मिली होगी आपको।”

“मैं सब जानती हूं। आखिरी समय तक मां ने आपको काम पर लगाया रहा होगा। खैर! आप तैयार होकर नीचे आइए मैं इंतज़ार कर रही हूँ।” गले मिलकर आरती नीचे चली गई।

खाने की टेबल पर कला ने कई तरह के नाश्ते लगा रखे थे।

“अरे भाभी! आज तो कमाल हो गया। इतना सारा नाश्ता जैसे बारात आने वाली हो। आप कमाल हो भाभी। आप ही इतना काम इतने कम समय में कर सकती हो।” आरती की बात सुनकर सरला जी का मुंह बन गया।

“अरे क्या अब अपनी तारीफ ही सुनती रहोगी या चाय भी बनाओगी?”

जब तक नाश्ता चलता रहा सरला जी, कला को एक टांग पर दौड़ाती रहीं। विनय सब कुछ देख रहा था, तभी आरती बोली,” भाई भाभी को भी बोलो साथ नाश्ता करें। क्या वो सिर्फ नाश्ता परोसने के लिए है क्या?” विनय चुप था उसे पता था कुछ भी बोलना मतलब घर में बखेड़ा खड़ा करना।

किसी तरह नाश्ता खत्म हुआ और सभी आपस में बातें करते रहे। इधर कला बस रसोई में ही लगी रही। आरती को बहुत बुरा लग रहा था वो बार-बार कला को आवाज़ दे रही थी।

खाने के समय भी वही हुआ कला बस दौड़-दौड़कर आवभगत करने में लगी हुई थी। सरला जी जैसे चाबुक लिए फरमान हाजिर कर रहीं थीं। कला के घबराहट में हाथ-पांव फूलने लगे नतीजा वही हुआ। आखिर में खीर का कटोरा कला के हाथ से छूट गया।

अब तो सरला जी ने आंव देखा ना ताव बस बरस पड़ीं कला पर। कला का तो रो-रोकर बुरा हाल। तभी आरती उठी और उसने प्यार से भाभी को गले लगाकर बैठाया।

उसने गुस्से में फिर सरला जी को बोला, “मां भाभी भी एक इंसान हैं। वो कभी आपके लिए एक शब्द नहीं बोलती। जैसा आप बोलते जाते हैं वैसा वो करती रहती है। उससे अच्छा तो ये प्रेशर कुकर है जो दबाव आते ही बोल पड़ता है। पर भाभी तो कभी कुछ नहीं कहती।

आपको आज खुद चाहिए था कि भाभी की सहायता करतीं। मैं और भाई ने आपको कितना समझाया था कि किसी की चुप्पी का इतना फायदा मत उठाओ। लेकिन आप कहां अपने आगे किसी की सुनती हैं।”

सरला जी चुपचाप सब कुछ सुन रहीं थीं। उन्हें अपनी गलतियों का एहसास हो रहा था। जाते-जाते आरती को उन्होंने वचन दिया कि जब अगली बार तुम आओगी तो तुम्हें अपने घर में बदलाव देखने को ज़रूर मिलेगा। आरती ने अपनी भाभी को गले लगाकर अपने मायके से बिदाई ली।

दोस्तों कैसी लगी मेरी कहानी अपने विचार ज़रूर व्यक्त करें और साथ ही मुझे फाॅलो करना ना भूलें।

मूल चित्र : Still from TVC Episode E7S46, YouTube

टिप्पणी

About the Author

62 Posts | 357,568 Views
All Categories