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गीता यथार्थ की ये तस्वीर 1000 शब्दों से ज़्यादा प्रभावशाली है…

Posted: मार्च 5, 2021

गीता यथार्थ ने इस तस्वीर को शेयर किया और कहा, “वॉशरूम का लास्ट टाइम गेट कब क्लोज किया था, याद नहीं!” उनका इतना करते ही सोशल मीडिया पर बवाल हो गया। 

सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है। उस तस्वीर में गीता यथार्थ ने उन समस्याओं के  बारे में बात की है जिसका सामना एक अकेली माँ को करना पड़ता है? किस प्रकार एक महिला, एक सिंगल मॉम को छोटे बच्चे की देखभाल में इतना कष्ट उठाना पड़ता है कि टॉयलेट का दरवाज़ा आधा खुला छोड़ना पड़ता है?

यह तस्वीर जितनी वायरल हो रही है उतना ही नैतिकता के ठेकेदारों को संस्कृत्ति का अपमान, सार्वजनिक अंग प्रदर्शन, अटेंशन सीकिंग और पता नहीं क्या-क्या नज़र आ रहा है। इतना तो तय है जो कुछ भी कहा जा रहा है वह हमारे समाज की नैतिकता की अश्लीलता ज़रूर है।

एक ऐसी तस्वीर जिसमें एक मां की पीड़ा और बेबसी उसकी आंखों में उतर गई, दिखती है। वह टायलेट की सीट पर बैठकर भी बच्चे के खैरियत को लेकर परेशान भी है बैचेन भी है।

पर पितृसत्ता के जकड़न में कैद पुरुषवादी मन भी क्या करे? समाज ने उसे कभी भी संवेदनशील बनाया ही नहीं। उसने तो हमेशा मां को देवी के महान रूप में देखा, जो विवश तो कभी हो ही नहीं सकती है।

जिस बाजारी संस्कृत्ति में इंसान इन संस्कारी मूल्यों के साथ रोज़मर्रा का जीवन जीना सीख रहा है, वह मानता है कि उसकी मां एक सुपर विमन है, जो दो मिनट में मैंगी-पास्ता बना देती है और ढ़ेर सारे मेहमानों के आने पर झट से चटपटे-कुरकुरे स्नैक्स और डिजर्ट। वह तो अब डिजिटली स्मार्ट भी हो गई है इसलिए अपने बच्चे की मां नहीं, मां से पार्टनर बन गई है।

सच्चाई यह है कि देवी, सुपर विमन, स्मार्ट और डिजिटल बन गई मां का लाडला इतना भी ज़हीन नहीं बना कि वह किसी भी महिला की बयां की गई तकलीफ पर मानवीय व्यवहार कर सके।

कुछ तो यहां तक कहने से नहीं चूक रहे कि अगर सिंगल मदर के बस में अकेले बच्चे की परवरिश नहीं तो वह बच्चा पैदा ही क्यों रही है? हमारी दादी-नानी और मांओं ने बच्चा नहीं पाला है क्या? गोया हर पुरुष जैसे बच्चा पैदा करने से पहले अपनी जीवनसाथी से सहमति ही लेता हो। नैतिकता का पाठ बाचने वाले कहीं नहीं अपनी मां से ही इसके बारे में पूछ लेते तो उनकी मां के आंखो का एक पोर भीग गया होता।

बहरहाल, यह कोई नई बात नहीं है। मौजूदा समय में हमारे समाज का यह चेहरा कई बार सामने आता रहता है। संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार तो सार्वजनिक जगहों पर एक मां जब बच्चे को स्तनपान करा रही होती है तो वह उस पर भी दुहाई और तोहमत बाचते हैं।

अपने देश में न जाने कितनी ही मां होगी जो सार्वजनिक जगहों या बसों, ट्रेन और मेट्रों में अपने बच्चे को दूध इसलिए नहीं पिला पाती होंगी क्योंकि सामाजिक नैतिकता उनको चरित्रहीन का प्रमाणपत्र दे देगी। खासकर तब जब कोई महिला उन दायरों को तोड़कर, अपने लिए कुछ नया रचना चाहती है। वह कुछ बोलती है, लिखती है या कुछ भी नया करती है तो कई लोग बिलबिला जाते हैं।

गीता यथार्थ की वायरल तस्वीर पर हो रहे कमेंट्स को बड़े गम्भीरता से पढ़ा जाना चाहिए। यह सारे कमेंट्स भारतीय समाज के उस मानसिकता का सच्चा चेहरा है। खासकर उस भारतीय समाज का जो महिलाओं को देवी के समान पूजने का दावा भी करता है पर उसके पीछे अपनी एक घटिया-फूहड़ मानसिकता को कभी छिपाता है तो कभी उसका भद्दा प्रदर्शन करता है। इसी प्रदर्शन से वह महिलाओं को वास्तव में नियंत्रित करना चाहता है और कुछ हद तक सफल भी रहता है।

मौज़ूदा समय में विपरीत लिंग के प्रति सहानभूति रखने की अक्षमता इस हद तक व्याप्त हो गई है कि तकलीफ पहुंचाने वाला यह मानकर चलता है कि दर्द या तकलीफ वास्तव में पीड़िता का अपना भाग्य है। पीड़िता, स्वयं के अस्मित के सवाल से इतना घबरा जाएगी कि वह इस तकलीफ को जब्त करके वह सब स्वीकार कर लेगी जो उसके आत्मसम्मान को तार-तार भी कर दे फिर भी उसे कोई तकलीफ नहीं होगी।

वास्तव में यह वह तय फार्मूला है जिसका सहारा लेकर “मर्दागनी” समाज की हर महिला पर अपना नियंत्रण थोपना चाहती है, बहुत हद तक थोपती भी है। इसका कारण यह है कि इसके लिए समाज का एक बड़ा तबका इस मर्दागनी को पुरस्कृत करता है। वह यह मानता है कि महिलाओं को नियंत्रित करने के लिए यह आवश्यक है।

जब तक हम-आप, हमसे-आपसे से बनता परिवार, समाज, राज्य, देश और राष्ट्र अपने अंदर के पुरुष प्रधानता का अंत न कर दे जिसने लैंगिकता को हिंसा और आक्रामणकता के समान बनाया है, हमारे जीवन में इस तरह की घटनाएं स्वयं को दोहराती रहेंगी, हमारे समाजिक जीवन में इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी और हमारे अंदर की संवेदना-प्रेम धीरे-धीरे खत्म होता रहेगा

अब आप भी ये ना कहें कि यह कोई नई बात नहीं है। इस अनुभव से केवल सिंगल मदर नहीं हर माँ गुज़रती है। ये हर माँ की कहानी है! लेकिन अब आप ये सोचिये क्यों?

मूल चित्र : Facebook

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