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“अरे यह फटी हुई जींस क्यूँ पहन रखी है?”

रिप्पड यानि फटी हुई जींस कहने को तो एक फ़ैशन ट्रेंड है पर जब भी लड़कियाँ इससे पहनती हैं तो कुछ ना कुछ ताने सुनने को ज़रूर मिलते हैं। “रिप्ड जींस बच्चों के लिए “बुरी मिसाल” के समान है, जिसके कारण मादक द्रव्यों का सेवन भी होता है”, मंगलवार को सब्स्टन्स अब्यूस पर एक वर्क्शाप […]

रिप्पड यानि फटी हुई जींस कहने को तो एक फ़ैशन ट्रेंड है पर जब भी लड़कियाँ इससे पहनती हैं तो कुछ ना कुछ ताने सुनने को ज़रूर मिलते हैं।

“रिप्ड जींस बच्चों के लिए “बुरी मिसाल” के समान है, जिसके कारण मादक द्रव्यों का सेवन भी होता है”, मंगलवार को सब्स्टन्स अब्यूस पर एक वर्क्शाप में उत्तराखंड के चीफ मिनिस्टर तीरथ सिंह रावत ने कहा। 

औरत के कपड़ों पर टिप्पणियाँ सुनना कोई नयी बात नहीं है। हमेशा से औरतों को उनके कपड़े पहने के ढंग पर समाज में टोका गया है। समाज के अनुसार औरत को अपने आपको ढक के चलना चाहिए- तौबा अगर ज़रा सा भी उनकी त्वचा दिख गयी, तो जैसे कि कोई गहरा राज हो जिसे छुपाना ज़रूरी है। 

रिप्पड जींस कहने को तो एक फ़ैशन ट्रेंड है पर जब भी लड़कियाँ इससे पहनती है तो कुछ कुछ ना कुछ ताने सुनने ज़रूर मिलते हैं- “अच्छे घर की लड़कियाँ ऐसे कपड़े नहीं पहनतीं”, “ढंग के कपड़े पहनने चाहिएं।” 

यहाँ तक कि मज़ाक़ के नाम पर हर बार एक लाइन ज़रूर आपको भी सुनने मिली होगी, “अरे यह फटी हुई जींस क्यूँ पहनी है?” मज़ाक़ के मुखौटे के पीछे ये होते ताने ही हैं। 

कपड़े क्या संस्कार का प्रतीक हैं? 

“कैंची से संस्कार- नंगे घुटने दिखाना, रिप्ड डेनिम पहना और अमीर बच्चों की तरह दिखना, यह संस्कार दिए जा रहे हैं? यह कहाँ से आ रहा है अगर घर से नहीं? शिक्षकों या स्कूलों की गलती क्या है? अपने बेटे को कहाँ ले जा रहा हूँ, घुटना दिखते हुए और फटी हुई जींस में? लड़कियां भी कम नहीं हैं, अपने घुटने दिखा रही हैं। क्या यह अच्छा है? यह सब, पश्चिमीकरण का पागलपन है। जबकि पश्चिमी दुनिया हमारा अनुसरण करती है, योगा करती है… अपने शरीर को उचित रूप से ढक रही है, और हम नग्नता की ओर दौड़ रहे हैं?” नवनियुक्त मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड राज्य आयोग बाल संरक्षण अधिकार के लिए आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र पर कुछ ऐसा कहा।

क्या कपड़े संस्कार दर्शाते है? औरत को अपने मन स्वरूप कपड़े पहनने देना क्या उन्हें बिगाड़ना होता है? हर इंसान को हक़ है अपने हिसाब से जीने और कम से कम अपने मन के कपड़े पहनने का। लेकिन यही हक की बात जब औरत पे आती है तो क्यूँ इसपे सवाल उठाए जाते हैं? 

एक महिला के काम का उसके कपड़ों से क्या लेना देना? 

कपड़ों के नए विकल्पों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि वह एक महिला से मिलने पर हैरान थे- जो एक एनजीओ चलाती थी लेकिन रिप्ड जीन्स पहन कर। अगर इस तरह की महिला बाहर समाज में जाके लोगों से मिलती है और उनकी समस्याएं हल करती है, तो हम किस तरह का संदेश दे रहे है समाज में, अपने बच्चों को। यह सब घर पर शुरू होता है। हम क्या करते हैं, हमारे बच्चे वही सीखते हैं।

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क्या कभी आपने सुना है की एक आदमी के कपड़ों से तुलना कर उसके काम को मापा गया हो? कपड़े किसी के काम की योग्यता कबसे दर्शाने लगे? कपड़े सिर्फ़ इंसान का खुद को व्यक्त करने का एक तरीका है। वह आपने काम में कैसी है और कितनी सक्षम है वह सिर्फ़ उनकी योग्यता और कुशलता द्वारा अनुमानित किया जा सकता है। 

कपड़ों के तानों के पीछे छुपे वही टकसाली सोच 

आगे उन्होंने ने संस्कारों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि एक बच्चा जिसे घर पर सही संस्कृति सिखाई जाती है, वह कितना भी मॉडर्न हो जाए, कभी ज़िंदगी में हारेगा नहीं। 

सुनने में तो यह बात कुछ ख़राब या ग़लत नहीं लग रही। अच्छे संस्कार, नैतिकता,आदर यह सब एक इंसान के व्यक्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है। पर इनके अच्छे संस्कारो का मतलब क्या सिर्फ ढके हुए कपड़े पहना है? क्यूँकि एक जींस के ज़रा से रिप से आपके संस्कार में आयी दरारें दिख जाती हैं, है ना? 

प्रगतिशील समाज में आज भी क्यूँ औरत का मुख्य भूमिका घर सम्भालना ही मानी जाती है

नवनियुक्त कैबिनेट मिनिस्टर गणेश जोशी ने भी ऐसी ही बात करते हुए कुछ समय पहले कहा था कि औरतों को बच्चों को अच्छे से पालने पर ध्यान देना चाहिए- “औरत बातें करती है कि उन्हें जीवन में क्या क्या करना है, पर सबसे ज़रूरी चीज़ उनके लिए है अपने परिवार और बच्चों को संभालना।” 

शाब्दिक अर्थ से तो समाज ने प्रगति की है, लेकिन आज भी कहीं ना कहीं, बात घूमके के यही आ जाती है कि औरत का मुख्य काम है अपना घर संभालना। कैबिनेट मिनिस्टर का यह कहना कि औरत को यह नहीं सोचना चाहिए कि जीवन में उन्हें क्या क्या करना है, बल्कि अपने परिवार और बच्चों को संभालना चाहिए, वही रूढ़िवादी स्त्री द्वेषी मानसिकता दर्शाता है। 

औरत का अस्तित्व सिर्फ़ उसके घर परिवार तक सीमित नहीं है। उसके अपने सपने हैं, अपने लक्ष्य है। यह कहना कि उन्हें इसके बारे में बात ना कर अपने परिवार को संभालना चाहिए उन्हें वही पित्तंत्रात्‍मक बंदिशों में बांधना होता है। और क्या परिवार और बच्चे संभालना उसके अकेले की जिम्मेदारी है? उसके जीवन साथी का क्या, जिसने हर चीज़ में भागीदार होने के वादे किए थे? 

आज की औरत सब कर सकती है। वह अपना घर, परिवार, बच्चे, काम, अपने सपने लक्ष्य सब साथ में संभाल सकती है, और वो भी अपने मन चाहे कपड़ों में। जो वह नहीं कर सकती वह सिर्फ़ मर्दों की उनके जीवन और उनकी जिम्मेदारियों पर टिप्पणीयाँ सुनना। क्या यही लोग जो आज औरत को बता रहे हैं कि उन्हें क्या पहना चाहिए और उनकी जिम्मेदारियां क्या हैं, यही चीज़ पुरुषों को भी कहेंगे? 

मूल चित्र: Daniela Davila via Unsplash

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