कोरोना वायरस के प्रकोप में, हम औरतें कैसे, इस मुश्किल का सामना करते हुए भी, एक दूसरे का समर्थन कर सकती हैं?  जानने के लिए चेक करें हमारी स्पेशल फीड!

शायद पैदा ही पुरखिन होती हैं हमारी बेटियां…

मायके से विदा होते, माँ के गले लग उनकी आँख पोंछते, जब पीठ पर हल्की सी धौल जमा रुखाई से खुद को अलग करती हैं, तब पुरखिन होती हैं बेटियाँ!

मायके से विदा होते, माँ के गले लग उनकी आँख पोंछते, जब पीठ पर हल्की सी धौल जमा रुखाई से खुद को अलग करती हैं, तब पुरखिन होती हैं बेटियाँ!

सर्दियों की शाम घर लौटकर,
मुंह हाथ धोते पिता का
हाथ पकड़ जब
आस्तीन जरा सी ऊपर कर
कहती हैं “भिगो मत लेना!”
तब पुरखिन होती हैं बेटियां।

बुखार में बेसुध पड़ी माँ के,
माथे को हाथ से सहलाती,
देह के ताप का अँदाजा लगा
अचानक उठ खड़ी हो,
तेलबत्ती कर,
होंठों से मंत्र बुदबुदाती
माँ की जब नजर उतारती हैं,
तब पुरखिन होती हैं बेटियाँ।

छोटे भाई की नाक पोंछ,
ज़रा सा नमक-अदरक चटा,
जब सर्दी को धमका दूर भगाती हैं,
तब पुरखिन होती हैं बेटियाँ।

मायके से विदा होते,
माँ के गले लग
उनकी आँख पोंछते,
जब पीठ पर हल्की सी धौल जमा
रुखाई से खुद को अलग करती हैं,
तब पुरखिन होती हैं बेटियाँ!

भाई-भतीजियों के शुभ को
किवाड़ पर सतिए काढ़ती,
देहरी पर मंतर-तंतर करती
जब धागे बाँध मनौती करती हैं,
तब पुरखिन होती हैं बेटियाँ!

मूल चित्र : Sharath Kumar via Pexels

पसंद आया यह लेख?

पाइये विमेन्सवेब के सारे दिलचस्प हिंदी लेख अपने ईमेल इनबॉक्स मे!

Never miss real stories from India's women.

Register Now

विमेन्सवेब एक खुला मंच है, जो विविध विचारों को प्रकाशित करता है। इस लेख में प्रकट किये गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं जो ज़रुरी नहीं की इस मंच की सोच को प्रतिबिम्बित करते हो।यदि आपके संपूरक या भिन्न विचार हों  तो आप भी विमेन्स वेब के लिए लिख सकते हैं।

टिप्पणी

About the Author

98 Posts | 280,933 Views
All Categories